अन्ना के सामने लोकसभा चुनाव की चुनौती है

अन्ना को अरविंद केजरीवाल कैसे समाप्त कर सकते हैं, यह मेरी समझ में नहीं आया, पर उन्हीं मित्र ने यह

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न थकेंगे, न झुकेंगे

आखिर अन्ना हज़ारे क्या हैं, मानवीय शुचिता के एक प्रतीक, बदलाव लाने वाले एक आंदोलनकारी या भारतीय राजनीति से हताश लोगों की जनाकांक्षा? शायद अन्ना यह सब कुछ हैं. तभी तो इस देश के किसी भी हिस्से में अन्ना चले जाएं, लोग उन्हें देखने-सुनने दौड़े चले आते हैं? उनकी सभाओं में उमड़ने वाली भीड़ को देखकर कई राजनेताओं को रश्क होता होगा.

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अब अन्ना की नहीं, आपकी परीक्षा है

अन्ना हज़ारे और जनरल वी के सिंह ने बनारस में छात्रों की एक बड़ी सभा को संबोधित किया. मोटे अनुमान के हिसाब से 40 से 60 हज़ार के बीच छात्र वहां उपस्थित थे. छात्रों ने जिस तन्मयता एवं उत्साह से जनरल वी के सिंह और अन्ना हज़ारे को सुना, उसने कई संभावनाओं के दरवाज़े खोल दिए. पर सबसे पहले यह देखना होगा कि आख़िर इतनी बड़ी संख्या में छात्र अन्ना हज़ारे और वी के सिंह को सुनने के लिए क्यों इकट्ठा हुए, क्या छात्रों को विभिन्न विचारों को सुनने में मज़ा आता है, क्या वे नेताओं के भाषणों को मनोरंजन मानते हैं, क्या छात्रों में जनरल वी के सिंह और अन्ना हज़ारे को लेकर ग्लैमरस क्रेज़ दिखाई दे रहा है या फिर छात्र किसी नई खोज में हैं?

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इंडिया अगेंस्‍ट करप्‍शनः अन्ना चर्चा समूह सरकारी लोकपाल कैसे धोखा है

सरकार ने जान बूझ कर लोगों में यह ग़लत़फहमी पैदा की है. पहली बात तो यह है कि लोकपाल बिल अभी संसद में पारित नहीं हुआ है. अभी केवल लोकसभा में पारित हुआ है, राज्य सभा में अभी भी विचाराधीन है.

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लोकपाल बिलः यह जनता के साथ धोखा है

सरकार ने लोकपाल बिल का मसौदा तैयार कर लिया है. इस मसौदे की एक रोचक जानकारी-अगर कोई व्यक्ति किसी अधिकारी के खिला़फ शिकायत करता है और वह झूठा निकला तो उसे 2 साल की सज़ा और अगर सही साबित होता है तो भ्रष्ट अधिकारी को मात्र 6 महीने की सज़ा. मतलब यह कि भ्रष्टाचार करने वाले की सज़ा कम और उसे उजागर करने वाले की सज़ा ज़्यादा.

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अन्‍ना की दस गलतियां

अन्ना का आंदोलन एक अच्छे लोकपाल के गठन को लेकर हुआ था. पांच दिनों तक जंतर-मंतर पर अन्ना का अनशन चला, लेकिन हैरानी की बात यह थी कि अपार जन समर्थन मिलने के बाद भी अन्ना और उनकी टीम ने सरकार से समझौते के व़क्त जो मांगें रखीं, वे ठीक उस कहावत की तरह थीं कि खोदा पहाड़, निकली चुहिया.

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अब लोकपाल नहीं बनेगा

हमारे देश में सरकारी तंत्र के साथ साथ भ्रष्टाचार का तंत्र भी मौजूद है. यह भ्रष्ट तंत्र देश की जनता को तो नज़र आता है, लेकिन सरकार अंधी हो चुकी है. इसलिए सरकारी तंत्र और भ्रष्ट तंत्र दोनों एक दूसरे के पूरक बन गए हैं. ड्राइविंग लाइसेंस चाहिए तो सरकार के नियम क़ानून हैं, जिसके ज़रिए आपको लाइसेंस नहीं मिल सकता.

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सरकार इस खतरे को पहचाने

सिर्फ भारत सरकार ही नहीं, सभी सरकारों के जागने का व़क्त आ गया है. जागने का व़क्त इसलिए कि अगर कोई सरकार सुशासन करते हुए नहीं दिखाई देती या कोई सरकार लोगों के लिए काम करते नहीं दिखाई देती तो अब लोगों का ग़ुस्सा जल्दी फूटता दिख रहा है. अन्ना हज़ारे के आंदोलन ने यह दिखाया कि लोग सड़कों पर आ सकते हैं.

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भ्रष्टाचार के खिला़फ जनता को आगे आना होगा

हिंदुस्तान सबसे बड़ा प्रजातंत्र होने के बावजूद दुनिया का 72 वां सबसे भ्रष्ट देश है. दुनिया में 86 ऐसे देश हैं, जहां भारत से कम भ्रष्टाचार है. आज़ादी के बाद से ही हम भ्रष्टाचार के साथ जूझ रहे हैं. भ्रष्टाचार के खिला़फ कारगर क़ानून बनाने की योजना इंदिरा गांधी के समय से चल रही है. 42 साल गुज़र गए, फिर भी हमारी संसद लोकपाल क़ानून बना नहीं सकी.

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