प्रधानमंत्री के नाम अन्ना की चिट्ठी

सेवा में,

श्रीमान् डॉ. मनमोहन सिंह जी,

प्रधानमंत्री, भारत सरकार, नई दिल्ली.

विषय : गैंगरेप-मानवता को कलंकित करने वाली शर्मनाक घटना घटी और देश की जनता का आक्रोश सड़कों पर उतर आया. ऐसे हालात में आम जनता का क्या दोष है?

महोदय,

गैंगरेप की घटना से देशवासियों की गर्दन शर्म से झुक गई.

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हम तो ख़ुद अपने हाथों बेइज़्ज़त हो गए

जी न्यूज़ नेटवर्क के दो संपादक पुलिस द्वारा गिरफ्तार कर लिए गए. इस गिरफ्तारी को लेकर ज़ी न्यूज़ ने एक प्रेस कांफ्रेंस की. अगर वे प्रेस कांफ्रेंस न करते तो शायद ज़्यादा अच्छा रहता. इस प्रेस कांफ्रेंस के दो मुख्य बिंदु रहे. पहला यह कि जब अदालत में केस चल रहा है तो संपादकों को क्यों गिरफ्तार किया गया और दूसरा यह कि पुलिस ने धारा 385 क्यों लगाई, उसे 384 लगानी चाहिए थी. नवीन जिंदल देश के उन 500 लोगों में आते हैं, जिनके लिए सरकार, विपक्षी दल और पूरी संसद काम कर रही है.

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यह पत्रकारिता का अपमान है

मीडिया को उन तर्कों का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए, जिन तर्कों का इस्तेमाल अपराधी करते हैं. अगर तुमने बुरा किया तो मैं भी बुरा करूंगा. मैंने बुरा इसलिए किया, क्योंकि मैं इसकी तह में जाना चाहता था. यह पत्रकारिता नहीं है और अफसोस की बात यह है कि जितना ओछापन भारत की राजनीति में आ गया है, उतना ही ओछापन पत्रकारिता में आ गया है, लेकिन कुछ पेशे ऐसे हैं, जिनका ओछापन पूरे समाज को भुगतना पड़ता है. अगर न्यायाधीश ओछापन करें तो उससे देश की बुनियाद हिलती है.

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बिहारः आरटीआई कार्यकर्ता सुरक्षित नहीं

सूचना के अधिकार के सिपाही रामविलास सिंह अपनी जान की सुरक्षा की गुहार लगाते रहे, पर लखीसराय सहित बिहार का सारा पुलिस अमला आराम से सोता रहा. राज्य मानवाधिकार आयोग में भी उनकी फरियाद अनसुनी रह गई. अपराधी उन्हें जान से मारने की धमकी दे रहे थे और प्रशासन ने आंखें मूंद लेने में भलाई समझी.

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जनता त्रस्‍त, अपराधी मस्‍त, सरकार पस्‍त

जिस प्रदेश में ग़रीबी चरम पर हो, बच्चे रोटी और कपड़े के मुफ्त वितरण में यूं झपट पड़े कि काल के ग्रास बन जाएं, उस प्रदेश के किस नेता को हम धन्यवाद दें और किस देवी-देवता को हम अपना नैवैद्य अर्पित करें, किस मज़ार पर जाएं हम चादर चढ़ाने? जहां भुखमरी, कंगाली और बदहाली बच्चों से उनका हंसता-खेलता बचपन छीन ले और बूढ़ों को फुटपाथ पर मरने के लिए छोड़ दे, हाड़ तोड़ मेहनत के बावजूद किसान भूखे सोएं, अपराधी सरेआम अबला की अस्मत लूटें और कॉलर चौड़ा कर खुलेआम घूमें.

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साधु-संत के वेश में खूंखार अपराधी

एक दौर ऐसा था कि धर्म क्षेत्र से जुड़े साधु-संत मायावी प्रलोभनों से दूर रहकर समाज को संस्कारित व धार्मिक बनाने में अपनी महती भूमिका निभाते हुए स्वयं सात्विक-सरल जीवन जीते थे. काम, क्रोध, मद लोभ को त्याग कर दूसरों को प्रेरणा देते हुए खुद का जीवन दूसरों के हितार्थ होम कर देते थे.

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पुस्‍तक अंशः मुन्‍नी मोबाइल – 55

साहिबाबाद गांव में इन दिनों कुछ अलग सी हलचल देखने में आ रही है. अपराधियों का निवास तो यहां पहले से ही था, अब कुछ लड़कियां समूह में यहां रहने लगी हैं. दिन में सोती हैं और रात को सज-धज कर निकल जाती हैं. इनमें कुछ बंगाल की हैं तो कुछ गुजरात और नेपाल की.

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आ़खिर क्यों मानें क़ानून?

वैसे तो कहा जाता है कि क़ानून अंधा होता है, जिसका तात्पर्य यह है कि क़ानून का उल्लंघन करने वालों के विरुद्ध न्यायिक प्रक्रिया बिना भेदभाव के चलनी चाहिए पर यह कथन केवल कथन मात्र ही है. वास्तविकता इससे अलग है. तुलसीदास जी की चौपाई समरथ को नहीं दोष गोसाईं इसी यथार्थ का सर्मथन करती है.

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जेल में मौज

क्‍या कभी आपने जेल में अपराधियों को पिज़्ज़ा खाते देखा है? नहीं न, मगर दिल्ली के एक जेल में आपको ऐसा शख्स मिल जाएगा. वैसे तो हर मुजरिम को जेल का खाना-खाना पड़ता है. मगर अब अपराधी ही हाई-फाई हो तो भला खाना भी तो उसके स्टैंडर्ड का होना चाहिए.

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कोई सुरक्षित नहीं

उत्तर प्रदेश में आम आदमी के साथ मंत्री, सांसद, विधायक और सरकारी अधिकारी-कर्मचारी भी सुरक्षित नहीं हैं. आपराधिक घटनाओं के सरकारी आंकड़े भी इस बात की गवाही देते हैं. एक जनवरी, 2010 से 30 सितंबर, 2010 के दौरान नौ माह में प्रदेश में 3123 लोगों की हत्या कर दी गई.

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अपराध की भेंट चढ़ता देश का बचपन

नेशनल क्राइम रिकॉड्‌र्स ब्यूरो के नवीनतम आंकड़े देश के भविष्य की ख़ौ़फनाक तस्वीर पेश करते हैं. उनके मुताबिक़ पूरे देश में अपराधों की संख्या लगातार बढ़ रही है, लेकिन इससे भी ज़्यादा चिंता की बात यह है कि बाल अपराधों की संख्या में भी तेजी से वृद्धि हो रही है.

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अपराधियों की बल्‍ले-बल्‍ले

बिहार में विधानसभा चुनाव में अब कुछ ही महीने शेष हैं. बम और हथियार बनाने के साथ-साथ चुनावी अपराध करने वाले तत्व अपने-अपने तौर-तरीके दुरुस्त करने में लग गए हैं. ऐसा हो भी क्यों नहीं, सभी के अपने-अपने रेट हैं और अपराध करने का तरीका भी अलग-अलग है.

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सियासत की फांस में फांसी

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि फांसी की सज़ा दुर्लभ से दुर्लभ मामलों में ही दी जाए. ऐसे में जब किसी अपराधी को फांसी की सज़ा दी जाती है तो इसका सीधा मक़सद इंसानियत के दुश्मनों में भय पैदा करके उन्हें हतोत्साहित करना होता है, ताकि फिर से कोई किसी निर्दोष का ख़ून न बहा सके.

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बसपा का ऑपरेशन क्‍लीनः सुधार की कवायद है या राजनीतिक ड्रामा

बसपा प्रमुख मायावती ने वायदे के अनुसार पार्टी से क़रीब पांच सौ दागियों को बाहर का रास्ता दिखा दिया. बीते 30 अप्रैल को उन्होंने स्वयं इस बात की घोषणा की. यह सिलसिला यहीं नहीं थमा है. अभी दागी नेताओं की एक और सूची तैयार की जाएगी. बसपा द्वारा दागियों को पार्टी से बाहर करने का फैसला राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बना हुआ है.

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ग़ैर-जमानती वारंट के बाद भी अधिकारी बहाल

राज्य में भ्रष्टाचार और घोटालों पर लगाम लगाना वैसे ही मुश्किल हो रहा है. उस पर जो मामले अदालत में चल रहे हैं, उनके दोषियों पर कोई कार्रवाई न कर प्रशासन अप्रत्यक्ष रूप से अपराधियों को संदेश दे रहा है कि क़ानून से डरने की कोई ज़रूरत नहीं है.

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बेंत तस्करी से अधिकारी अंजान

बेंत का सोफा हो या कुर्सी, डायनिंग टेबल हो या टोकरी, अगर आपको ये सारी चीज़ें खरीदनी हैं तो इसके लिए महज़ छह से सात हज़ार रुपये खर्च करने होंगे और संपर्क करना होगा नेपाल के किसी कारीगर से. वजह, नेपाल के रानीगंज, रत्नगंज एवं त्रिवेणी आदि इलाक़ों में बेंत तो नहीं उपजता है, लेकिन बड़े पैमाने पर इसका कारखाना ज़रूर चलता है.

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सार-संक्षेप

मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के निर्वाचन क्षेत्र बुदनी के वनग्राम खटपुरा के 200 वनवासी परिवारों को एक भाजपा नेता के इशारे पर वन विभाग के अफसर प्रताड़ित कर रहे हैं. 25 वर्षों से वनभूमि पर रहने वाले वनवासियों का आरोप हैं कि उन्हें खेती के लिए पट्टे देना तो दूर, वन अधिकारी उनकी फसल चौपट कर उनके खिला़फ झूठे मुकदमे दर्ज करा रहे हैं.

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