भारत : एक बाज़ार या एक राष्ट्र?

पिछली सरकार ने कॉरपोरेट को बाज़ार आधारित अर्थव्यवस्था में कार्य करने की अनुमति दे दी और सोचा कि ग़रीबों की

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आर्थिक सर्वे ने फिर निराश किया

इसी फ़रेब में हमने सदियां ग़ुजार दीं, गुज़िश्ता साल से शायद ये साल बेहतर हो. उक्त पक्तियां ताजा आर्थिक सर्वेक्षण

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जनलोकपाल का वादा सरकार को पूरा करना चाहिए

अन्ना ने अपने पत्र में प्रधानमंत्री को लिखा कि संसद में कई अन्य विषयों से जु़डे बिल पास हुए, लेकिन

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परिवर्तन की शताब्दी

एक सौ दो साल पहले दिल्ली में ब्रिटिश शासक को ताज पहनाया गया था. उस समय ब्रिटिश साम्राज्य में सूर्यास्त

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अमीर लोगों से ज्यादा टैक्स लेना ज़रूरी

वित्त मंत्री ने बहुप्रतिक्षित वार्षिक बजट की घोषणा कर दी. वर्ष 1991 के बाद बजट ने अपने महत्व खो दिए,

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Fake Currency in India

नकली नोट – सबसे बडा ख़ुलासा Fake Currency in India Reserve Bank of India Market fake notes Real Cricket Truth

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किसकी मिलीभगत से चल रहा है नकली नोट का खेल

आरबीआई के मुताबिक़, पिछले 6 सालों में ही क़रीब 76 करोड़ रुपये मूल्य के नक़ली नोट ज़ब्त किए गए हैं. ध्यान दीजिए, स़िर्फ ज़ब्त किए गए हैं. दूसरी ओर संसद की एक समिति की रिपोर्ट कहती है कि देश में क़रीब एक लाख 69 हज़ार करोड़ रुपये के नक़ली नोट बाज़ार में हैं. अब वास्तव में कितनी मात्रा में यह नक़ली नोट बाज़ार में इस्तेमाल किए जा रहे हैं, इसका कोई सही-सही आंकड़ा शायद ही किसी को पता हो.

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अंतराष्ट्रीय सहकारिता वर्ष 2012 सशक्‍त कृषि नीति बनाने की जरूरत

संसद द्वारा सहकारिता समितियों के सशक्तिकरण के लिए संविधान संशोधन (111) विधेयक 2009 को मंज़ूरी मिलने के बाद भारत की सहकारी संस्थाएं पहले से ज़्यादा स्वतंत्र और मज़बूत हो जाएंगी. विधेयक पारित होने के बाद निश्चित तौर पर देश की लाखों सहकारी समितियों को भी पंचायतीराज की तरह स्वायत्त अधिकार मिल जाएगा. हालांकि इस मामले में केंद्र एवं राज्य सरकारों को अभी कुछ और पहल करने की ज़रूरत है, ख़ासकर वित्तीय अधिकारों और राज्यों की सहकारी समितियों में एक समान क़ानून को लेकर.

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असफल वित्त मंत्री सक्रिय राष्‍ट्रपति

वर्ष 2008 में ग्लोबल इकोनॉमी स्लो डाउन (वैश्विक मंदी) आया. उस समय वित्त मंत्री पी चिदंबरम थे. हिंदुस्तान में सेंसेक्स टूट गया था, लेकिन आम भावना यह थी कि इस मंदी का हिंदुस्तान में कोई असर नहीं होने वाला है. उन दिनों टाटा वग़ैरह का प्रदर्शन बहुत अच्छा रहा था और एक धारणा यह बनी कि भारतीय अर्थव्यवस्था को विश्व की अर्थव्यवस्था की ज़रूरत नहीं है.

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बिगड़े रिश्‍ते, बिगड़ी अर्थव्‍यवस्‍था

अब प्रणब मुखर्जी के दूसरे मंत्रियों और प्रधानमंत्री से रिश्ते की बात करें. वित्त मंत्री माना जाता है कि आम तौर पर कैबिनेट में दूसरे नंबर की पोजीशन रखता है. वित्त मंत्रालय इन दिनों मुख्य मंत्रालय (की मिनिस्ट्री) हो गया है, क्योंकि हर पहलू का महत्वपूर्ण पहलू वित्त होता है, इसलिए बिना वित्त के क्लीयरेंस के कोई भी फैसला हो ही नहीं सकता.

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ओमिता पॉल महान सलाहकार

प्रणब मुखर्जी राष्ट्रपति बनने जा रहे हैं. ऐसे में उनके चार दशक पुराने राजनीतिक करियर की समीक्षा की जा रही है. देश की वर्तमान खराब आर्थिक हालत और उसमें प्रणब बाबू की भूमिका पर भी खूब चर्चा हो रही है, लेकिन इस सबके बीच एक और अहम मसला है, जिस पर ज़्यादा बात नहीं हो रही है. खासकर ऐसे समय में, जबकि बिगड़ी आर्थिक स्थिति को न सुधार पाने के लिए प्रणब मुखर्जी को ज़िम्मेदार ठहराया जा रहा हो. यह सवाल सीधे-सीधे वित्त मंत्री के सलाहकार से जुड़ा हुआ है.

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ब्रिक्स सम्मेलन 2012 : चुनौतियां और संभावनाएं

नई दिल्ली में चौथे ब्रिक्स (ब्राजील, रूस, चीन, भारत और दक्षिण अफ्रीका) सम्मेलन का आयोजन किया गया. सम्मेलन में चीन के राष्ट्रपति हू जिंताओ, रूस के राष्ट्रपति देमित्री मेदवेदेव, ब्राजील के राष्ट्रपति डिल्मा रोसेफ, दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति जैकब जूमा तथा भारत के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भाग लिया. सम्मेलन का मुख्य विषय वैश्विक स्थायित्व, सुरक्षा एवं समृद्धि के लिए ब्रिक्स की भागीदारी थी.

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कॉरपोरेट्स की सामाजिक ज़िम्मेदारी तय हो

यह आलेख कॉरपोरेट मामलों के मंत्री वीरप्पा मोइली द्वारा दिए गए एक भाषण और नए कंपनी बिल-2011 पर आधारित है. वीरप्पा मोइली ने बंगलुरु में हुए एक सम्मेलन, जिसका विषय था-भारत में कॉरपोरेट्‌स का भविष्य, में बोलते हुए नए कंपनी बिल-2011 और कॉरपोरेट्‌स की सामाजिक ज़िम्मेदारी यानी सीएसआर पर अपने विचार रखे थे.

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इंडिया इन ट्रांजिशनः भारत और दक्षिण एशिया संतुलन से लेकर आपसी सहयोग तक

क्या अतीत की पिछली घटनाओं और उनके तर्क से यह संकेत नहीं मिलता कि अपने पड़ोसियों को लेकर हमारी नीति में परिवर्तन की शुरुआत होने जा रही है, जिसमें भारत को संतुलित करने के प्रयास से लेकर लंबे समय तक इसके साथ आपसी सहयोग भी शामिल है? क्या कारण है कि हमारे पड़ोसी देश, ख़ास तौर पर पाकिस्तान और किसी हद तक बांग्लादेश, श्रीलंका एवं नेपाल अपने ही हित में क्षेत्र की सबसे बड़ी और सबसे तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्था के साथ मिलकर सहयोग नहीं करते?

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मनुष्य का यंत्रीकरण

पूंजीवादी अर्थव्यवस्था ने आदमी को एक तरह से मशीन बना दिया है. उदाहरण के लिए घर में काम आने वाली सुइयां या कीलें आज से 200 वर्ष पहले ग्राम का कोई लोहार बनाता था. उसके बनाने में जो साजो-सामान लगता था, उसको प्राप्त करने से लेकर तैयार सुई या कील घर- घर जाकर बेचकर पैसा इकट्ठा करने तक का सारा काम वह स्वयं या उसका परिवार कर लेता था.

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सहकारी अर्थव्यवस्था की प्राचीन परंपरा

एक और आवाज़ आजकल जोरों से उठाई जा रही है, वह है सहकारिता आंदोलन की. सहकारिता आंदोलन देश के लिए, राष्ट्र के हर व्यक्ति के लिए उपादेय है, बशर्ते कि इस पद्धति का ईमानदारी से अनुसरण किया जाए.

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पूंजी की निर्धारित सीमा

पूंजी संपत्ति पूंजीवाद का मूल स्तंभ है. इसे मिटाना ही होगा. इस श्रेणी में प्रधानत: दो ही संपत्तियों का समावेश होता है- (1) ज़मीन जायदाद, (2) पूंजी. भारत सरकार ने जबसे समाजवादी अर्थव्यवस्था को अपना ध्येय घोषित किया है, प्रथम कक्षा के लिए कई संशोधन हुए हैं, नए क़ानून बने हैं.

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सरकार को जनता के बीच जाना चाहिए

यह बड़ी राहत की बात है कि सरकार ने खुदरा क्षेत्र में विदेशी कंपनियों को लाने (एफडीआई) के अपने निर्णय को फिलहाल स्थगित कर दिया है. इस पर कॉरपोरेट सेक्टर और शेयर बाज़ार की प्रतिक्रिया प्रतिकूल रही.

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मनरेगा : सरकारी धन की बंदरबाट

नक्सलवाद, भौगोलिक स्थिति और पिछड़ापन आदि वे कारण हैं, जो विंध्याचल मंडल को प्रदेश के विकसित हिस्सों से अलग करते हैं. मंडल के तीन ज़िलों में से एक भदोही को विकसित कहा जा सकता है, किंतु कालीन उद्योग में आई मंदी ने जनपद की अर्थव्यवस्था को काफी प्रभावित किया.

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क्या बड़े खुदरा व्यापारी भारत के लिए फायदेमंद साबित होंगे?

घरेलू खुदरा बाज़ार के क्षेत्र में अचानक बड़े विदेशी खिलाड़ियों को आमंत्रित करने के सरकारी फैसले से विवाद का पिटारा खुल गया है. इन बड़े-बड़े खुदरा व्यापारियों (विदेशी रिटेलर्स) के नफे-नुक़सान पर एक विस्तृत चर्चा होनी चाहिए.

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राष्ट्रीय शहरी सड़क विक्रेता नीति 2009 : सिर्फ़ क़ानून बनाने से काम नहीं चलेगा

पिछले कई वर्षों से फुटपाथों, पार्कों और सब-वे जैसे सार्वजनिक स्थलों पर सामान बेचने वाले विक्रेताओं की पहुंच सही उपभोक्ताओं तक न हो पाने का मामला दुनिया भर के बड़े शहरों में विवादग्रस्त बन गया है.

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सर्वोदय अर्थव्यवस्था

राष्ट्र पिता महात्मा गांधी ने अपनी अर्थव्यवस्था का जो स्वरूप बतलाया था, उसे सर्वोदय अर्थव्यवस्था की संज्ञा मिली है. शायद यह व्यवस्था भारत की दयनीय दशा को देखते हुए इस देश के लिए उपयुक्त और आदर्श मान भी ली जाए.

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यूरोप का लोकतंत्र खतरे में

लोकतंत्र की जन्मभूमि ग्रीस में पिछले दिनों इसके साथ मज़ाक़ हुआ. लोकतांत्रिक तरीक़े से चुने गए प्रधानमंत्री जॉर्ज पापेंद्रु को इस्ती़फा देने के लिए मजबूर किया गया. पापेंद्रु ग्रीस की समाजवादी पार्टी पासोक के नेता हैं तथा उनके पिता और दादा ग्रीस के प्रधानमंत्री रह चुके हैं.

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व्यक्तिगत और निजी संपत्ति

समाजवादी अर्थव्यवस्था की प्रतिष्ठा से पहले इसे ठीक से समझना होगा. जब तक इसके विपरीत पक्ष पूंजीवाद को हम सही मायनों में समझ नहीं लेते, तब तक समाजवाद का तात्विक अर्थ समझना कठिन है.

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वर्तमान अर्थव्यवस्था से संत्रस्त सृष्टि

अब आपको ज्ञात हो गया होगा कि समान वित्त वितरण में कोई कठिनाई नहीं है. यह योजना शाश्वत चल सकने वाली और संभव है. आपने देख लिया होगा कि वर्तमान अर्थव्यवस्था से किसी को भी संतोष नहीं है. समाजवाद शब्द की व्याख्या किए बिना ही या मतलब समझे बिना ही आपको जंच गया होगा कि समान रूप से सबको धन का बंटवारा हो जाए तो वह ही अति उत्तम मार्ग है.

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राष्ट्रीय सुरक्षा प्रबंधन के मायने

राष्ट्रीय सुरक्षा एक ऐसा शब्द है, जिसका इस्तेमाल आजकल आम तौर पर किया जाता है. प्राय: यह शत्रु देश के आक्रमण से सुरक्षा से संबंधित होता है अथवा उन हथियारबंद आतंकवादियों से सुरक्षा से, जो राष्ट्र के प्रभुत्व को चुनौती देते हैं या राष्ट्रीय एकता-अखंडता को नुक़सान पहुंचाते हैं, लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा का अभिप्राय केवल इसी से नहीं है, बल्कि इसे और अधिक वृहद अर्थों में समझने की आवश्यकता है.

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पाकिस्तान : सामंतवादी तंत्र की हकीकत

फ्यूडलिज्म या सामंतवादी तंत्र एक सोच का नाम है. एक ऐसे व्यक्ति की सोच, जो दूसरों को अपने मुक़ाबले तुच्छ मानता हो और उनका हक़ छीनना जायज़ समझता हो. ऐसी नकारात्मक सोच और चिंता रखने वाले वर्ग सामंतवादी तंत्र को जन्म देते हैं. यह तंत्र अमीरों को कमज़ोरों के शोषण का गुण सिखाता है, नाजायज़ तरीक़े से दौलत जमा करता है, ग़रीब को और ग़रीब बनाता है, अमीर को और अमीर बनाता है.

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ब्रिक्स नई दुनिया का नायक बन सकता है

पिछले कुछ दशकों में अमेरिका को इसी तीसरे विश्व के देशों ने चुनौती देने का काम किया है. इन देशों की बड़ी आबादी इनका अभिशाप न रहकर इनकी शक्ति बन गई और उसी वैश्वीकरण ने, जिसने अमेरिका को चोटी पर पहुंचाया था, इन देशों को वह दिया, जिसकी तलाश पश्चिमी देशों को थी, मार्केट या बाज़ार. साथ ही आर्थिक विकास के चलते यह देश विश्व के कारखाने बनकर उभर गए और अपने अंतरराष्ट्रीय दोहन के विरुद्ध लामबंद होने लगे.

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अर्थव्यवस्था का केंद्र तीसरी दुनिया है

नेपोलियन एक बार विश्व का नक्शा देख रहा था. अचानक एक जगह उसकी नज़र ठिठकी. उसने कहा, ओह चीन, सोया हुआ एक विशाल दैत्य, इसे सोने ही दो. इस बात को दो शताब्दियां बीत चुकी हैं. हम एक बार फिर इसी बात को यूरोप के लिए दोहराने के रास्ते पर हैं.

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समाजवाद की पृष्ठभूमि

भारत को आज़ाद हुए एक युग बीत गया है. सरकार की आर्थिक नीति समाजवादी व्यवस्था पर आधारित है. कांग्रेस, सोशलिस्ट, प्रजा-समाजवादी पार्टी, कम्युनिस्ट पार्टी, यहां तक कि नवनिर्मित स्वतंत्र पार्टी और जनसंघ तक भी समाजवादी अर्थव्यवस्था की हिमायत करते हैं. हर पार्टी के नेता यह दावा करते हैं कि उनकी ही कल्पित समाजवादी व्यवस्था सही है, दूसरी पार्टियों की न

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