संविधान में राजनीतिक दल का ज़िक्र नहीं है : कब और कैसे बना हमारा संविधान

इस अंक से हम डॉ. बी आर अंबेडकर द्वारा 25 नवंबर, 1949 को संविधान सभा में दिए गए आख़िरी भाषण

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अन्याय का मूकदर्शक राज्य अल्पसंख्यक आयोग

बिहार का अल्पसंख्यक आयोग अपनी संवैधानिक शक्ति के बावजूद व्यवहारिक रूप से नि:शक्त और कमज़ोर हो चुका है. यह वही आयोग

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असम : क्‍यों भड़की नफरत की आग

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का संसदीय क्षेत्र असम एक के बाद एक, कई घटनाओं के चलते इन दिनों लगातार सुर्खियों में है. महिला विधायक की सरेआम पिटाई, एक लड़की के साथ छेड़खानी और अब दो समुदायों के बीच हिंसा. कई दिनों तक लोग मरते रहे, घर जलते रहे. राज्य के मुख्यमंत्री केंद्र सरकार का मुंह ताकते रहे और हिंसा की चपेट में आए लोग उनकी तऱफ, लेकिन सेना के हाथ बंधे थे.

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कब्रिस्तानों पर अवैध क़ब्ज़े : दफ़न के लिए दो गज़ ज़मीन भी मयस्सर नहीं

लोगों ने अपनी ज़मीन-जायदाद वक़्फ करते व़क्त यही तसव्वुर किया होगा कि आने वाली नस्लों को इससे फायदा पहुंचेगा, बेघरों को घर मिलेगा, ज़रूरतमंदों को मदद मिलेगी, लेकिन उनकी रूहों को यह देखकर कितनी तकली़फ पहुंचती होगी कि उनकी वक़्फ की गई ज़मीन-जायदाद चंद सिक्कों के लिए ज़रूरतमंदों और हक़दारों से छीनकर दौलतमंदों को बेची जा रही है.

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भारतीय समाज को बेहतर बनाने के लिए आईओएस का 25 वर्षों का प्रयास

भारत में मुसलमान अल्पसंख्यक बिरादरी का दर्जा रखता है. देश के संविधान ने दूसरे वर्गों के साथ-साथ इस देश के मुसलमानों को भी बराबर के अधिकार दिए हैं, लेकिन आज़ादी के 60 साल से भी ज़्यादा का वक़्त गुज़र जाने के बाद भी, आज मुसलमानों को अपना हक़ मांगना पड़ रहा है.

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कंपनी बिल-2011 : राजनीतिक दलों का दोहरा रवैया

14 दिसंबर, 2011 को लोकसभा में एक घटना घटी. डॉ. वीरप्पा मोइली ने दोपहर के बाद कंपनी बिल-2011 लोकसभा में पेश किया. इस बिल में राजनीतिक दलों को कंपनियों द्वारा दिए जाने वाले धन का प्रावधान है. इस बिल के पेश होने के एक घंटे के अंदर कांग्रेस के प्रवक्ता मनीष तिवारी बोलने के लिए खड़े हुए. उन्होंने कहा कि काला धन प्रमुख तौर पर हमारे चुनाव में मिलने वाले चंदे से जुड़ा हुआ है और इस चुनावी चंदे के स्वरूप में परिवर्तन करके काले धन की समस्या पर बहुत हद तक क़ाबू पाया जा सकता है.

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समय के साथ बदलते मुस्लिम चेहरे

उत्तर प्रदेश की राजनीति में तमाम मुस्लिम चेहरे मोर्चा संभाले हुए हैं. ये चेहरे सभी दलों में मौजूद हैं. कहीं ये शो पीस की तरह हैं तो कई जगह इनके कंधों पर वोट बैंक की ज़िम्मेदारी है. कोई भी दल ऐसा नहीं है, जो मुस्लिम चेहरों को आगे करके अल्पसंख्यकों को लुभाने के लिए दाना न डाल रहा हो.

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आत्मकथा के बहाने इतिहास

इंद्र कुमार गुजराल से मेरी पहली मुलाकात तब हुई थी, जब संसद के बालयोगी सभागार में संतोष भारतीय ने विश्वनाथ प्रताप सिंह की कविता पाठ का आयोजन किया था. वह एक तरह की अनूठी योजना थी, जिसमें चार पूर्व प्रधानमंत्रियों ने अपने साथी पूर्व प्रधानमंत्री के आयोजन के लिए एक साथ लोगों को आमंत्रित किया था.

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राजीव कपूर की डीओपीटी से विदाई

1983 बैच के आईएएस अधिकारी राजीव कपूर को उत्तर प्रदेश भेज दिया गया है. वह डीओपीटी में संयुक्त सचिव के पद पर काम कर रहे थे. डीओपीटी में संयुक्त सचिव बनाए जाने के लिए पैनल बनाए जा रहे हैं.

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क्या मुसलमानों को आरक्षण की ज़रूरत है

हिंदुस्तान में 160 मिलियन मुसलमान हैं, जो इंडोनेशिया के बाद दुनिया की दूसरी सबसे ब़डी मुस्लिम आबादी वाला देश है. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक़, यहां मुसलमानों की जनसंख्या 13.4 फीसदी है, लेकिन कई लोग यह मानते हैं कि मुसलमानों की संख्या 15 से 18 फीसदी के बीच है.

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दिल्‍ली का बाबूः राजनीति और बाबू

बाबुओं ने भी राजनीति करनी शुरू कर दी है. हिमाचल प्रदेश में एक वरिष्ठ आईएएस अधिकारी ने शिकायत की है कि राज्य के पुलिस प्रमुख उन्हें परेशान कर रहे हैं.

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अल्पसंख्यकों के संवैधानिक अधिकारों का हनन

उच्चतम न्यायालय की ग्यारह सदस्य खंडपीठ ने टी एम ए पाई एवं पी ए ईनामदार की याचिकाओं पर संविधान की धारा 30 (1) के तहत निर्णय देते हुए अल्पसंख्यकों को पांच अधिकार दिए, जिसमें शिक्षण संस्थाओं में नियुक्ति, शुल्क निर्धारण, सोसाइटी का गठन, प्रवेश और अनुशासनहीन कर्मचारी के विरुद्ध कार्यवाही आदि अधिकार शामिल हैं.

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जनता बदलाव चाहती है

सत्ता की राजनीति में आरोप-प्रत्यारोप एक आम बात है, लेकिन जब समय चुनाव का हो तो इनकी अहमियत भी बढ़ जाती है. यही आरोप चुनावी मुद्दे तक बन जाते हैं. मसलन, पश्चिम बंगाल में चुनाव का शंखनाद हो चुका है और विपक्ष यानी तृणमूल कांग्रेस वामपंथी शासन की जमकर बखिया उधेड़ने में जुटी हुई है.

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उत्तर प्रदेश अल्‍पसंख्‍यक आयोगः खर्चा रूपया, काम चवन्‍नी

अल्पसंख्यक, एक ऐसा शब्द, जिसका इस्तेमाल शायद राजनीति में सबसे ज़्यादा होता है. सत्ता में आने से पहले और सत्ता में आने के बाद बस इस शब्द और इस समुदाय का इस्तेमाल ही होता आया है. इसके अलावा जो कुछ भी होता है, वह स़िर्फ दिखावे के लिए होता है.

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सांप्रदायिकता विरोधी गर्जनाः केवल बातों से काम नहीं चलेगा

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना की 125वीं वर्षगांठ के अवसर पर आयोजित विशेष कांग्रेस अधिवेशन को संबोधित करते हुए पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी ने सांप्रदायिक ताक़तों पर कटु हमला किया. उन्होंने कहा कि वे सभी संगठन, विचारधाराएं एवं व्यक्ति, जो हमारे इतिहास को तोड़ते-मरोड़ते हैं, धार्मिक पूर्वाग्रहों को हवा देते हैं और धर्म के नाम पर आमजनों को हिंसा करने के लिए उकसाते हैं, देश के लिए विनाशकारी हैं.

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रंगनाथ मिश्र आयोग की रिपोर्टः सरकार, सुप्रीमकोर्ट और अल्‍पसंख्‍यक आरक्षण

सच्चर कमेटी और रंगनाथ मिश्र आयोग की रिपोर्ट से यह सच सबूत के साथ सामने आया कि देश के अल्पसंख्यकों की सामाजिक-आर्थिक और शैक्षणिक हालत क्या है. यह भी पता चला कि उनके इस बिगड़े हालात को कैसे सुधारा जा सकता है. लेकिन, इन रिपोर्टों पर सरकार के रु़ख से यह भी साबित हो गया कि अल्पसंख्यकों के लिए वर्तमान केंद्र सरकार कुछ ठोस करने के बजाए घड़ियाली आंसू ही बहाती रही है.

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अल्पसंख्यक आयोग के प्रति सरकारों की बेरुख़ी

मध्य प्रदेश राज्य अल्पसंख्यक आयोग के सभी काम अर्से से रुके पड़े हैं. शिक़ायतें और मामले दर्ज होना सभी कुछ बंद है. शिक़ायतें अगर दर्ज भी हो रही हैं तो उनका निराकरण व़क्त पर नहीं हो पा रहा है. शिक़ायती आवेदनपत्र तो किसी तरह जमा हो जाते हैं, लेकिन उनके निराकरण के लिए बेंच गठित करने और उन पर फैसला लेने का काम फिलवक्त बंद है.

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दलित, अल्पसंख्यक सशक्तीकरण का दस्तावेज़

एक जमाने में पत्रकारिता समाज के उन लोगों के साथ खड़ी होती थी, जो वंचित और शोषित कहे जाते थे और पत्रकार उनके हक़ के लिए खड़े हो जाते थे. पिछड़ों और दलितों को न्याय दिलाने की पत्रकारिता अब समाचार माध्यमों से विलुप्त होती दिख रही है. टेलीविज़न ने इस तरह की पत्रकारिता का बड़ा नुक़सान किया.

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