आतंक का चक्रव्यूह

दो मई की सुबह दुनिया के सबसे खूंखार आतंकवादी ओसामा बिन लादेन को पाकिस्तान में मार गिराए जाने के बाद यह बात साफ हो गई कि पाकिस्तान में आतंकियों को लंबे समय से पनाह मिल रही है. लादेन की मौत के साथ ही आतंक का पाकिस्तान कनेक्शन एक बार फिर दुनिया के सामने उजागर हो गया. यह भी साफ हो गया कि लादेन एबटाबाद में पिछले पांच सालों से सिर छुपाकर रह रहा था और पाकिस्तान दुनिया के सामने आतंक के ख़िला़फ बयानबाज़ी कर रहा था.

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सार-संक्षेपः ब्याज़ मा़फिया का आतंक

पिछले दिनों आगरा में आईजी रेंज पी.के. तिवारी की पहल पर छह ब्याज़ माफिया के खिला़फ मुक़दमे ज़रूर लिखे गए किंतु ब्याज़ माफियाओं पर इसका कोई असर नहीं दिखाई दे रहा. उनके सर पर राजनीतिक पहुंच वाले लोगों का हाथ है, इसलिए उनके आका मामलों को खत्म करने की जुगत में लगे हुए हैं और ब्याज़ मा़फिया शान से खुले घूम रहे हैं.

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बंदरों का आतंक

उत्तर प्रदेश के हरदोई जनपद में थाना बेनीगंज अंतर्गत ग्राम सिकंदरपुर के निकट एक खेत में एक साथ नौ बंदर मृत पाए गए. बंदरों की मौत की ख़बर लगते ही सैकड़ों लोगों की भीड़ एकत्र हो गई. अयोध्या फैसले को लेकर चौकन्नी पुलिस ने किसी अनहोनी से पहले मामला रफा-दफा कर दिया, लेकिन बंदरों की लगातार बढ़ती संख्या शहर के लोगों के लिए सिरदर्द बन गई है.

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आतंक के लिए पैसा

पाकिस्तान-अ़फग़ानिस्तान की सीमा पर आतंकवाद के ख़िला़फ चल रही लड़ाई की तस्वीर लगातार बदसूरत होती जा रही है. आतंकवाद के ख़ात्मे के बजाय यह कट्टरवादी शब्दाडंबरों, साजिशों और अलग-अलग समूहों की स्वार्थ सिद्धि का माध्यम बनती जा रही है.

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चुनाव में खून बहेगा

चुनावी शंखनाद के साथ ही शांतिपूर्ण मतदान पर नक्सली आतंक का साया मंडराने लगा है. ऑपरेशन ग्रीन हंट और अपने नेताओं की गिरफ्तारी से बौखलाए नक्सली चुनावी स़फर को रक्तरंजित करने की तैयारी में जुट गए हैं. आधुनिक हथियारों से लैस नक्सलियों के मारक दस्तों ने चुनावी हिंसा की रणनीति को अंतिम रूप दे दिया है.

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हिंदू आतंकवाद शब्द अनुचित

जब से प्रज्ञा सिंह ठाकुर एवं दयानंद पांडे आदि द्वारा आतंकी हमलों की साजिश रचने और उन्हें अंजाम देने की ख़बरें सामने आई हैं, तबसे हिंदू आतंकवाद शब्द आम प्रचलन में आ गया है. विभिन्न एजेंसियों द्वारा की गई जांच से यह पता लगा है कि हिंदू राष्ट्र एवं हिंदुत्व की विचारधारा से प्रेरित उक्त संगठन मालेगांव, मक्का मस्जिद, अजमेर, गोवा एवं समझौता एक्सप्रेस धमाकों के पीछे हो सकते हैं.

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यह पाकिस्तान की मजबूरी है

एक महीने पहले जब मैंने यह लिखा था कि पाकिस्तान में सेना दस्तक दे रही है तो कई लोगों ने आश्चर्य जताया. दरअसल सारे संकेत इस ओर इशारा कर रहे थे कि सितंबर महीने तक सेना सत्ता पर क़ाबिज़ हो जाएगी.

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भारत-पाक वार्ताः बातचीत का यह कैसा तरीका है

यह अजीबोग़रीब स्थिति है कि एक आतंकी की वजह से न्यूक्लियर शक्ति से लैस दो देश आपस में अपने रिश्ते ख़राब करने पर आमादा हैं. यह किस तरह की डिप्लोमेसी है कि दोनों देश के महान राजनयिक उसी निर्णय पर पहुंच जाते हैं, जो दोनों देशों में आतंक फैलाने वाले आतंकी चाहते हैं.

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प्रधानमंत्री जी, ये सफलता है या विफलता

भारत में सरकारें तो पांच साल के लिए ही चुनी जाती हैं. पहला साल किसी भी सरकार का लक्ष्य और दिशा तय करता है, लेकिन इस सरकार की विवेचना करना थोड़ा अलग है. डॉ. मनमोहन सिंह ने 1991 में देश को एक सपना दिखाया था, वित्तमंत्री के रूप में उन्होंने भारत की आर्थिक नीति पूरी तरह से बदल दी.

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आतंकवाद का रास्ता

फैसल शहजाद धनी है, ग्रेजुएट तक शिक्षा प्राप्त शहजाद दो बच्चों का बाप है और उसका पारिवारिक जीवन भी ख़ुशहाल है. उसके अपनी ज़िंदगी से दुखी होने का कोई कारण नज़र नहीं आता. फिर वह कौन सा कारण था, जिसके चलते फैसल टाइम्स स्न्वायर में बम रखने के लिए तैयार हुआ?

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दाढ़ी और बुर्क़ा आतंक की निशानी नहीं

गंगा-जमनी तहज़ीब से सजा यह मेरा चमन हिंदुस्तान है, जहां धर्म और जाति के नाम पर कोई भेदभाव नहीं किया जाता, लेकिन जैसे-जैसे आतंकवाद का काला साया दुनिया के सभी देशों में फैलता जा रहा है, वैसे-वैसे हिंदुस्तान जैसे धर्म निरपेक्ष देश में भी मुसलमानों को संदेह की दृष्टि से देखा जाने लगा है. दो चीज़ें जो मुसलमानों की विशेष पहचान हैं, दाढ़ी और बुर्क़ा, को ही आतंकवाद का लक्षण समझ लिया गया है.

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आतंक के साए में जी रहा है कटनी

कटनी ज़िला इन दिनों विभिन्न आपराधिक वारदातों का केंद्र बनता जा रहा है. इस क्षेत्र में जुए, सट्टे और नशीली दवाओं से संबंधित अपराधों का खूब बोलबाला है. पुलिस की निष्क्रियता के वज़ह से यहां अवैध शस्त्रों का आवागमन और व्यापार भी आम है. पिछले दिनों राज्य के गृहमंत्री उमाशंकर गुप्ता के प्रवास के दौरान भी इन समस्याओं से निपटने की दिशा में कोई विशेष कदम नहीं उठाया गया.

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बीहड़ों में तब्‍दील होती उपजाऊ भूमि

कहने को तो भारत कृषि प्रधान देशों की श्रेणी में आता है, इसके बावजूद हम गेहूं से लेकर अन्य खाद्य पदार्थों का आयात करने पर मजबूर हैं. ऐसा नहीं है कि हमारे पास अन्न पैदा करने के लिए उपजाऊ भूमि और अन्य साधनों की कमी है. यहां तो 800 एकड़ कृषि योग्य भूमि ही बीहड़ों में तब्दील होकर बर्बाद हो रही है.

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आंखों देखा नक्‍सलवाद

विदेशी हथियारों से लैस नक्सलवादी समूहों के पास सरकार से अधिक मज़बूत सूचनातंत्र है. गहराई तक जानें तो, इन नक्सलवादी समूहों के पास पैसा, हथियार, योजना सभी कुछ उम्मीदों से कहीं ज़्यादा है. लेकिन, ये समूह जन विश्वास और जन आस्था धीरे-धीरे खोते जा रहे हैं. उड़ीसा, आंध्र प्रदेश और छत्तीसगढ़ जैसे राज्य के मध्य पड़ने वाले कुछ ऐसे भूभाग हैं जहां से नक्सलवादियों को लगातार गुज़रना पड़ता है.

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हेडली से 26 नवंबर की पूरी सूची मांगें

डेविड कोलमैन हेडली उर्फ दाऊद गिलानी उर्फ जाने क्या-क्या. अलग-अलग पहचान और विश्वासों के साथ केवल एक चीज के प्रति ही हेडली प्रतिबद्ध रहा है, धोखा और अविश्वास के आधुनिकतम सिद्धांतों के प्रति. यह सही है कि आप उसे विश्व के सर्वश्रेष्ठ अपराधियों की श्रेणी में नहीं रख सकते.

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ऑपरेशन ग्रीन हंट सफलता पर सवालिया निशान

काफी जद्दोजहद के बाद झारखंड में ऑपरेशन ग्रीन हंट शुरू हुआ. केंद्र सरकार के दिशानिर्देश पर सूबे में उग्रवादी गतिविधियों पर अंकुश लगाने और नक्सलियों पर नकेल कसने के उद्देश्य से यह अभियान जारी है.

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कुछ और इनामी डकैतों से छुटकारा मिला

तराई क्षेत्र में आतंक का पर्याय रहे ददुआ और ठोकिया गिरोह की तरह ही छोटे-छोटे गिरोह द्वारा प्रदेश में आतंक फैलाने की होड़ मची हुई है. लेकिन पिछले कुछ समय से पुलिस कई ऑपरेशन के जरिए का़फी हद तक इनका खात्मा करने में कामयाब रही है. इसी क़डी में सतना पुलिस ने कई घंटे चली मुठभेड़ के बाद चार इनामी डकैतों को ढेर करने में सफलता हासिल की है.

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पुस्‍तक अंश: मुन्‍नी मोबाइल – 10

गुजरात में दंगे जारी थे. नए-नए इलाक़े दंगों की आग में शामिल होते जा रहे थे. जंगलों में रहने वाले आदिवासियों को भी इसकी आग ने नहीं बख्शा. अंबाजी से लेकर बलसाड तक की आदिवासी पट्टी भी झुलस गई. इस पट्टी में संघ परिवार का संगठन वनवासी कल्याण आश्रम आदिवासियों को हिंदू बनाने के लिए लंबे समय से सक्रिय था.

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नक्सली राजधानी तक आ गए हैं

छत्तीसगढ़ राज्य में नक्सलियों के हौंसले बुलंद हैं. तमाम कोशिशों के बाद भी प्रशासन और पुलिस उन पर नकेल लगाने में सफल नहीं हुई है. राज्य सरकार ही नहीं, बल्कि भारत सरकार भी नक्सलवादी गतिविधियों पर नियंत्रण पाने के लिए पूरी कोशिश कर रही है लेकिन फिर भी छोटे-छोटे दलों में बंटे नक्सली अपने प्रभाव क्षेत्र को बढ़ाने में सफल हो रहे हैं.

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मोसाद का मोहरा या ग़ुनहगार!

1972 के म्यूनिख ओलंपिक की कड़वी यादें अभी भी लोगों की जेहन में ताजा है. इसकी ख़ौफनाक दास्तां भला कोई भूल भी कैसे सकता है? इस आतंकी वारदात में इज़रायल ने अपने 11 खिलाड़ियों को खो जो दिया था.

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