ट्राइबल सब प्लान, आदिवासी विकास नहीं विनाश की योजना

योजना आयोग द्वारा सुझाई गई और भारत सरकार द्वारा अपनाई गई एक योजना है, ट्राइबल सब प्लान. संक्षेप में, एक

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सतना लिंचिंग और लाचार शिवराज सरकार, गौ-रक्षा के नाम पर गौ-गुंडों का अत्याचार

2014 में मोदी सरकार के आने के बाद से गौरक्षा के नाम पर दलितों और अल्पसंख्यकों पर हमले और उन्हें

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सपा-बसपा का गठबंधन राजनीतिक वजूद बचाने की क़वायद है, जनता को तो फिर मिलना है झुनझुना

उत्तर प्रदेश के फूलपुर और गोरखपुर लोकसभा उप चुनावों से एकजुट हो रहीं विपक्षी पार्टियों के सामने भाजपा की हार

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फ्लैग-मध्यप्रदेश में बैतूल के जंगलों में हो रही यूरेनियम की खोज

आदिवासियों को सता रहा विस्थापन का डर मध्यप्रदेश में बैतूल क्षेत्र में कुछ महीनों से हेलिकॉप्टर आदिवासी क्षेत्रों और जंगलों

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जल, जंगल और ज़मीन बचाने में जुटे आदिवासी

आदिवासियों की पहचान जल, जंगल और ज़मीन से ज़रूर है, लेकिन प्राकृतिक संसाधनों के अत्यधिक दोहन के कारण उन्हें इन

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चांदन डैम पर किसका हक़- जल और ज़मीन की जंग लड़ रहे हैं किसान

किसानों और आदिवासियों को उनके जल, जंगल एवं ज़मीन से बेदख़ल करने के लिए राजनेता और पूंजीपति वर्ग जिस तरह

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आदिवासी छात्राओं के साथ दुष्कर्म : कांकेर कई सवालो को जन्म देता है

कांकेर कई सवालो को जन्म देता है क्या आदिवासी होना इस मुल्क में गुनाह है? शायद हां, क्योंकि अगर शासन

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मणिपुर जमीन की एक लड़ाई यहां भी

क्या पूर्वोत्तर को तभी याद किया जाएगा, जब कोई सांप्रदायिक हिंसा होगी, जब लोगों का खून पानी बनकर बहेगा? या तब भी उनके संघर्ष को वह जगह मिलेगी, उनकी आवाज़ सुनी-सुनाई जाएगी, जब वे अपने जल, जंगल एवं ज़मीन की लड़ाई के लिए शांतिपूर्ण तरीक़े से विरोध करेंगे? मणिपुर में तेल उत्खनन के मसले पर जारी जनसंघर्ष की धमक आखिर तथाकथित भारतीय मीडिया में क्यों नहीं सुनाई दे रही है? एस बिजेन सिंह की खास रिपोर्ट :-

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भूमि अधिग्रहण और पुनर्वास व पुनर्स्‍थापन अधिनियम (संशोधन) 2011 : नई हांडी में पुरानी खिचड़ी

नए भूमि अधिग्रहण क़ानून को लेकर देश भर की निगाहें संसद और केंद्र सरकार पर टिकी हुई हैं. जबरन भूमि अधिग्रहण के विरोध में आंदोलित कई राज्यों में सैकड़ों ग़रीब किसानों एवं आदिवासियों को पुलिस की गोलियों का शिकार होना पड़ा. उनका दोष स़िर्फ इतना था कि वे किसी भी क़ीमत पर अपनी पुश्तैनी ज़मीन देने के लिए तैयार नहीं थे. ब्रिटिश शासन के दौरान अंग्रेजों ने भूमि अधिग्रहण अधिनियम 1894 बनाया था.

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महाराष्ट्र : तीन लाख टन धान सड़ने की कगार पर

सरकार किसानों से बड़ी मात्रा में धान की खरीद तो करती है, लेकिन उसे व्यवस्थित ढंग से रखने के लिए कोई ध्यान नहीं दिया जाता. नतीजतन, वह खुले मैदान में पड़े-पड़े सड़ जाता है.

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सरकार आदिवासियों की सुध कब लेगी

छत्तीसगढ़ को क़ुदरत ने अपार संपदा से नवाज़ा है, जिसका उपयोग यदि सही ढंग से किया जाए तो यह क्षेत्र के विकास में का़फी सहायक सिद्ध हो सकता है. इस नक्सल प्रभावित क्षेत्र में नाममात्र विकास हो पा रहा है.

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सरकारी दमन के शिकार आदिवासी: नगड़ी को नंदीग्राम बनाने की तैयारी

नंदीग्राम और सिंगुर के जख्म अभी भरे नहीं हैं और देश में सैकड़ों ऐसे नंदीग्राम और सिंगुर की ज़मीन तैयार की जा रही है. मामला चाहे भट्टा पारसौल का हो या जैतापुर का या फिर कुडनकुलम का. इन सभी जगहों पर सरकार जबरन ज़मीन अधिग्रहण करने की ज़िद में किसानों-मज़दूरों की लाशें गिरा रही है.

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कुंभलगढ नेशनल पार्क : फ़िक्र जानवरों की, आदिवासियों की नहीं

राजस्थान में केंद्र सरकार और राज्य सरकार ने हज़ारों लोगों को विस्थापित करने की पूरी तैयारी कर ली है. इस बार विस्थापन का यह खेल किसी उद्योगपति को काऱखाना लगाने के नाम पर ज़मीन मुहैया कराने के लिए नहीं खेला जा रहा. दरअसल,एक उद्यान का दायरा बढ़ाकर उसे राष्ट्रीय उद्यान (नेशनल पार्क) बनाने की ख़ातिर आदिवासियों को उनके घरों से खदेड़ने का फरमान जारी कर दिया गया है.

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ये मुख़बिरों की बस्ती है

देश में आज भी धर्म और जाति के आधार पर बस्ती, पारा और मोहल्लों का बसना और इनकी पहचान न स़िर्फ मौजूद है, बल्कि स्वीकार्य भी है. परंतु इसी देश में मु़खबिरों की एक बस्ती भी है, यह सुनकर कोई भी चौंक सकता है.

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वनों में प्रकाश की किरण

भारत में वनों पर निर्भर 250 मिलियन लोग दमनकारी साम्राज्यवादी वन संबंधी क़ानूनों के जारी रहने के कारण ऐतिहासिक दृष्टि से भारी अन्याय के शिकार होते रहे हैं और ये लोग देश में सबसे अधिक ग़रीब भी हैं. वन्य समुदायों के सशक्तीकरण के लिए पिछले 15 वर्षों में भारत में दो ऐतिहासिक क़ानून पारित किए गए हैं.

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वनाधिकार कानून और महिलाएं

देश को आज़ादी मिलने के साठ साल बाद 2006 में वनाश्रित समुदाय के अधिकारों को मान्यता देने के लिए एक क़ानून पारित किया गया, अनुसूचित जनजाति एवं अन्य परंपरागत निवासी (वनाधिकारों को मान्यता) क़ानून. यह क़ानून बेहद है. यह केवल वनाश्रित समुदाय के अधिकारों को ही मान्यता देने का नहीं, बल्कि देश के जंगलों एवं पर्यावरण को बचाने के लिए वनाश्रित समुदाय के योगदान को भी मान्यता देने का क़ानून है.

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बांस बना रोजगार का साधन

पिछले दिनों केंद्र सरकार ने सभी राज्यों एवं केंद्र शासित प्रदेशों के मुख्यमंत्रियों को एक पत्र लिखकर यह सा़फ कर दिया कि बांस पेड़ नहीं, बल्कि घास की श्रेणी में आते हैं. अत: इन्हें काटने के लिए वन विभाग से विशेष अनुमति लेने की ज़रूरत नहीं होगी. सरकार की इस पहल से उन लोगों को राहत पहुंची है, जो बांस उत्पाद के माध्यम से रोज़गार हासिल कर रहे हैं.

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आदिवासी अल्पायु होते हैं

संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट कहती है कि दुनिया के कई देशों में रहने वाली आदिम प्रजातियों के लोगों की आयु शेष जनसंख्या से कहीं कम होती है यानी वे दूसरों की तुलना में कम जीते हैं. संयुक्त राष्ट्र ने अपने इतिहास में पहली बार आदिम प्रजातियों के बारे में विस्तृत रिपोर्ट प्रकाशित की है. ये ऐसी जातियां हैं, जो किसी भी देश के ज्ञात इतिहास में सबसे पुराने समय से रह रही हैं.

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किसान आंदोलन चौथी दुनिया और सुप्रीम कोर्ट

वर्तमान हालात में जन सरोकारों से जुड़ी पत्रकारिता का स्वरूप क्या हो सकता है? इसकी एक मिसाल चौथी दुनिया की उन रिपोर्टों में देखने को मिलती है, जो देश भर में चल रही जल, जंगल और ज़मीन की लड़ाई से संबंधित हैं. दरअसल, पिछले दो सालों के दौरान लिखी गईं उक्त रिपोट्‌र्स आने वाले समय में समस्याओं की चेतावनी दे रही थीं.

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कोस्का: खुद खोज ली जीवन की राह

देश भर के जंगली क्षेत्रों में स्व:शासन और वर्चस्व के सवाल पर वनवासियों और वन विभाग में छिड़ी जंग के बीच उड़ीसा में एक ऐसा गांव भी है, जिसने अपने हज़ारों हेक्टेयर जंगल को आबाद करके न स़िर्फ पर्यावरण और आजीविका को नई ज़िंदगी दी है, बल्कि वन विभाग और वन वैज्ञानिकों को चुनौती देकर सरकारों के सामने एक नज़ीर पेश की है.

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नक्सलियों की रोकने की कवायद

अभी कुछ दिनों पहले केंद्र सरकार की तऱफ से वनवासियों एवं आदिवासियों के कल्याण और उनके हितों का ध्यान रखने के लिए कई सकारात्मक क़दम उठाए गए हैं तथा अनेक पहल के संकेत भी मिले हैं. भ्रष्टाचार के आरोपों से चौतरफा घिरी और विपक्ष के हमलों से हलकान केंद्र सरकार को अब देश के जंगलों और पिछड़े इलाक़ों में रहने वाले आदिवासियों और जंगल आधारित उत्पादों के सहारे जीवन बसर करने वाले लोगों की याद आई है.

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वे आजादी के बावजूद आजाद नहीं थे

हिंदुस्तान की एक बड़ी आबादी के बीच एक तबक़ा ऐसा भी है, जिसे आज़ादी के अरसे बाद भी मुजरिमों की तरह पुलिस थानों में हाज़िरी लगानी पड़ती थी. आ़खिरकार 31 अगस्त, 1952 को उसे इससे निजात तो मिल गई, लेकिन उसे कोई खास तवज्जो नहीं दी गई. नतीजतन, उसकी हालत बद से बदतर होती चली गई.

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आदिवासियों की उपेक्षा कब तक?

आज देश का आदिवासी समुदाय राजनीति के केंद्र में आ गया है, लेकिन अपनी सांस्कृतिक और सामाजिक धरोहर के लिए नहीं, बल्कि इसलिए कि उसने देश की सरकार के ख़िला़फ संघर्ष का बिगुल बजा दिया है. आदिवासी एक ऐसे सामजिक समूह के सदस्य हैं, जो आज अपनी पहचान के लिए लड़ रहा है.

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आदिवासी महिलाओं ने बदली गांव की तस्‍वीर

आदिवासी समुदाय के हौसले को तो हमेशा ही सराहा जाता रहा है. एक बार फिर से उन्होंने कुछ ऐसा कर दिखाया है, जो काबिले तारी़फ है. हम बात कर रहे हैं मिर्जापुर ज़िले की आदिवासी महिलाओं की. जी हां मिर्जापुर ज़िले के लालगंज क्षेत्र की आदिवासी महिलाओं ने अपनी मेहनत और लगन से इस गांव की तस्वीर बदल दी है.

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सीएनटी एक्‍ट विवाद थमेगा नहीं

सीएनटी एक्ट को लेकर पिछले दिनों उठा विवाद फिलहाल थम गया है, लेकिन राख के नीचे चिंगारी दबी है. यह चिंगारी कभी भी भड़क सकती है. पिछले दिनों सीएनटी एक्ट के एक प्रावधान को लेकर नया विवाद खड़ा हो गया था.

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दस में से नौ भारतीय अप्रवासी हैं

भारत अप्रवासियों का देश है. यहां के मूल निवासी उनके पूर्वज थे, जिन्हें हम आज आदिवासी कहते हैं. इस समय आदिवासी भारत की आबादी का 8 प्रतिशत हैं अर्थात 92 प्रतिशत भारतवासी बाहर से आकर यहां बसे हैं. वे आज से लगभग 10 हज़ार वर्ष पहले उत्तर-पश्चिम और उत्तर-पूर्व से आए थे. औद्योगिक क्रांति के पहले पूरी दुनिया में कृषि मुख्य व्यवसाय था. उस समय भारत कृषकों का स्वर्ग था. यहां कृषि के लिए उपयुक्त वातावरण एवं संसाधन मौजूद थे. इसलिए चारों ओर से लोग भारत में बसने आए.

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अपने बूते जिंदा हैं आदिवासी

कैमूर पर्वत श्रृखंला भारत की प्राचीनतम पर्वतमालाओं में से है, जहां पर सोन, घाघरा, कर्मनाशा आदि नदियां बहती हैं. वनों से आच्छादित इस क्षेत्र में आदिवासियों का वास रहा है. लेकिन मुगलों व अंग्रेजों के दख़ल के बाद से इस इला़के के आदिवासियों का जीना दूभर हो गया.

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जीने का अधिकार अभियानः जन जागरण के नए प्रयोग की दस्तक

अपने हितों और अधिकारों के लिए आदिवासियों को जगाने और जुटाने का यह अनूठा सामाजिक प्रयोग है. नाम है जीने का अधिकार अभियान, जो मध्य प्रदेश के जबलपुर, कटनी एवं मंडला ज़िलों के ढाई दर्जन से अधिक आदिवासी गांवों में अपने पैर जमाने की तैयारी कर रहा है.

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सोनभद्रः फर्जी मुठभेड़- आदिवासी और दलित निशाने पर

उत्तर प्रदेश के सोनभद्र ज़िले में 6 वर्ष पूर्व हुई मुठभेड़ को स्थानीय फास्ट ट्रैक कोर्ट ने फर्ज़ी करार देते हुए, उसमें शामिल 14 पुलिस कर्मियों को आजीवन कारावास की सज़ा सुनाने का ऐतिहासिक फैसला दिया. सोनभद्र की अदालत द्वारा सुनाए गए इस फैसले ने स़िर्फ रनटोला मुठभेड़ ही नहीं बल्कि तमाम मुठभेड़ों पर सवालिया निशान खड़ा कर दिया है.

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यूनिक आइडेंटिफिकेशन: आधार पर आशंकाएं

यूपीए सरकार ने देश के सभी निवासियों को एक विशिष्ट पहचान नंबर यानी यूनिक आइडेंटिफिकेशन देने की प्रक्रिया शुरू कर दी है. हाल में पश्चिमी महाराष्ट्र के आदिवासी इलाक़े तेंभली में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने 10 आदिवासियों को 12 अंकों वाले विशिष्ट पहचान नंबर की योजना आधार सौंप कर इसकी शुरुआत की.

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