खुद को गोली मारी और लिखा की मै बेटी हूँ इसमें मेरी क्या गलती

मुंबई : पुणे से सटे बारामती में एक 17 साल की छात्रा ने सिर्फ इसलिए खुद को गोली मारकर ख़त्म

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स़िर्फ आरोपों से कोई कमजोर नहीं होता

मनमोहन सिंह ने परमाणु समझौते को लेकर जॉर्ज बुश को जब मना लिया, तो सभी लोग आश्‍चर्यचकित हो गए थे.

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वादे कौन पूरे करेगा?

भारतीय चुनाव काफी मजेदार होते हैं. इनमें स़िर्फ इतना ही मजेदार नहीं होता है कि अपने सबसे बेहतरीन रंगीन कपड़ों

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इंडियन एक्सप्रेस की पत्रकारिता – 1

भारतीय सेना की एक यूनिट है टेक्निकल सर्विस डिवीजन (टीडीएस), जो दूसरे देशों में कोवर्ट ऑपरेशन करती है. यह भारत की ऐसी अकेली यूनिट है, जिसके पास खुफिया तरीके से ऑपरेशन करने की क्षमता है. इसे रक्षा मंत्री की सहमति से बनाया गया था, क्योंकि रॉ और आईबी जैसे संगठनों की क्षमता कम हो गई थी. यह इतनी महत्वपूर्ण यूनिट है कि यहां क्या काम होता है, इसका दफ्तर कहां है, कौन-कौन लोग इसमें काम करते हैं आदि सारी जानकारियां गुप्त हैं, टॉप सीक्रेट हैं, लेकिन 16 अगस्त, 2012 को शाम छह बजे एक सफेद रंग की क्वॉलिस गाड़ी टेक्निकल सर्विस डिवीजन के दफ्तर के पास आकर रुकती है, जिससे दो व्यक्ति उतरते हैं. एक व्यक्ति क्वॉलिस के पास खड़े होकर इंतज़ार करने लगता है और दूसरा व्यक्ति यूनिट के अंदर घुस जाता है.

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जनरल वी के सिंह और अन्‍ना हजारे की चुनौतियां

भारत में लोकतंत्र की इतनी दुर्दशा आज़ादी के बाद कभी नहीं हुई थी. संसदीय लोकतंत्र में राजनीतिक दलों का बहुत महत्वपूर्ण स्थान है, लेकिन विडंबना यह है कि आज संसदीय लोकतंत्र को चलाने वाले सारे दलों का चरित्र लगभग एक जैसा हो गया है. चाहे कांग्रेस हो या भारतीय जनता पार्टी या अन्य राजनीतिक दल, जिनका प्रतिनिधित्व संसद में है या फिर वे सभी, जो किसी न किसी राज्य में सरकार में हैं, सभी का व्यवहार सरकारी दल जैसा हो गया है.

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फर्रुख़ाबाद को बदनाम मत कीजिए

मैं अभी तक पसोपेश में था कि सलमान खुर्शीद के खिला़फ कुछ लिखना चाहिए या नहीं. मेरे लिखे को सलमान खुर्शीद या सलमान खुर्शीद की जहनियत वाले कुछ और लोग उसके सही अर्थ में शायद नहीं लें. इसलिए भी लिखने से मैं बचता था कि मेरा और सलमान खुर्शीद का एक अजीब रिश्ता है. फर्रुख़ाबाद में हम दोनों पहली बार लोकसभा के चुनाव में आमने-सामने थे और चुनाव में सलमान खुर्शीद की हार और मेरी जीत हुई थी.

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बिना ब्‍याज का कर्ज और सस्‍ती जमीन: यह रिश्‍वत नहीं तो क्‍या है

नए-नए बने राजनीतिक दल (अरविंद केजरीवाल द्वारा घोषित) ने सोनिया गांधी के दामाद रॉबर्ट वाड्रा पर एक साथ कई आरोप लगाए हैं. इन तमाम आरोपों में कई चीजें शामिल हैं और इनमें कई तथ्य एवं आंकड़े बहुत ही बड़े हैं, लेकिन इस सबके बीच अगर सिद्धांत की बात की जाए तो दो चीजें एकदम स्पष्ट हैं. पहला यह कि रॉबर्ट वाड्रा की कुल पहचान यही है कि वह सोनिया गांधी के दामाद हैं.

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रॉबर्ट वाड्रा को आरोपों का सामना करना चाहिए

रॉबर्ट वाड्रा ने जो किया, वह अनोखा नहीं है. जो भी बिजनेस में होते हैं, उनमें ज़्यादातर लोग ऐसे ही तरीक़े अपनाते हैं और अपनी संपत्ति बढ़ाते हैं. फर्क़ स़िर्फ इतना है कि उनका जुड़ाव सत्ता से नहीं होता, जबकि रॉबर्ट वाड्रा का रिश्ता सीधे सत्ता से है और सत्ता से भी इतना नज़दीक का कि वह वर्तमान सरकार को नियंत्रित करने वाली सर्वशक्तिमान महिला श्रीमती सोनिया गांधी के दामाद हैं और भारत के भावी प्रधानमंत्री, यदि बने तो, राहुल गांधी के बहनोई हैं.

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तसलीमा सुर्खियों में रहना चाहती हैं

बांग्लादेश की विवादास्पद और निर्वासन का दंश झेल रही लेखिका तसलीमा नसरीन ने एक बार फिर से नए विवाद को जन्म दे दे दिया है. तसलीमा ने बंग्ला के मूर्धन्य लेखक और साहित्य अकादमी के अध्यक्ष सुनील गंगोपाध्याय पर यौन शोषण का बेहद संगीन इल्ज़ाम जड़ा है. तसलीमा ने सोशल नेटवर्किंग साइट ट्विटर पर लिखा- सुनील गंगोपाध्याय किताबों पर पाबंदी के पक्षधर रहे हैं.

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यह खामोशी देश के लिए खतरनाक है

कोयला घोटाला अब स़िर्फ संसद के बीच बहस का विषय नहीं रह गया है, बल्कि पूरे देश का विषय हो गया है. सारे देश के लोग कोयला घोटाले को लेकर चिंतित हैं, क्योंकि इसमें पहली बार देश के सबसे शक्तिशाली पद पर बैठे व्यक्ति का नाम सामने आया है. मनमोहन सिंह कोयला मंत्री थे और यह फैसला चाहे स्क्रीनिंग कमेटी का रहा हो या सेक्रेट्रीज का, मनमोहन सिंह के दस्तखत किए बिना यह अमल में आ ही नहीं सकता था.

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अन्ना और रामदेव की वजह से आशाएं जगी हैं

अन्ना हजारे और बाबा रामदेव जैसे लोगों को सावधान हो जाना चाहिए. इतने दिनों के बाद भी उन्हें यह समझ में नहीं आ रहा है कि कौन-सा सवाल उठाना चाहिए और कौन-सा नहीं. एक वक़्त आता है, जिसे अंग्रेजी में सेचुरेशन प्वाइंट कहते हैं. शायद जो नहीं होना चाहिए, वह हो रहा है, यानी लोकतंत्र सेचुरेशन प्वाइंट की तऱफ ब़ढ रहा है.

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नए सेनाध्‍यक्ष की नियुक्ति पर विवादः प्रधानमंत्री की अग्नि परीक्षा

चौथी दुनिया को कुछ ऐसे दस्तावेज़ हाथ लगे हैं, जिनसे हैरान करने वाली सच्चाई का पता चलता है. कुछ दिन पहले सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका की सुनवाई हुई, जिसमें लेफ्टिनेंट जनरल बिक्रम सिंह को अगले सेनाध्यक्ष के रूप में नियुक्ति पर सवाल खड़े किए गए.

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आप सांसद हैं, देवता नहीं

हमारे सांसद कुछ ज़्यादा ही सेंसेटिव हो गए हैं. उन्हें लगता है कि वे संसद के लिए चुन लिए गए हैं तो वे लोकतंत्र के देवता हो गए हैं. उन्हें कोई कुछ कह नहीं सकता है. अगर देश में भ्रष्टाचार की बात हो तो सांसदों को लगता है कि उन्हें ज़िम्मेदार ठहराया जा रहा है.

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आंदोलन जारी है…

कभी पास, कभी दूर. टीम अन्ना और रामदेव के बीच का रिश्ता कुछ ऐसा ही है. टीम अन्ना बार-बार रामदेव के साथ मिलकर आंदोलन चलाने की बात से इंकार करती रही है, लेकिन इस बार जब अन्ना हजारे ने यह घोषणा कर दी कि वह 3 जून को दिल्ली में बाबा रामदेव के साथ होंगे तो चाहकर भी टीम अन्ना के सदस्य इसका विरोध नहीं कर पाए.

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सेना के आंतरिक कार्यक्षेत्र में अनाधिकृत हस्‍तक्षेप

जिस तरह सेना के नेतृत्व में भ्रष्ट बैंकों, वित्तीय संस्थानों और उद्योगों की साझेदारी से ऊर्जा और अन्य कंपनियों के हितों के लिए अमेरिकी मीडिया व्यवसायिक घरानों का मुखपत्र बन गई थी, उसी तरह भारत में भी व्यवसायिक समूहों के स्वामित्व वाले टीवी चैनलों में नीरा राडिया टेप के केस के दौरान टीवी एंकर कॉर्पोरेट घरानों का रु़ख लोगों के सामने रख रहे थे.

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क्षेत्रीय दलों का गठबंधन एक विकल्प है

जब जवाहर लाल नेहरू सत्तर साल के हो गए तो उन्होंने सेवानिवृत होना चाहा. लेकिन उनकी पार्टी ने उन्हें ऐसा करने नहीं दिया. उनके अंतिम पांच साल का़फी कठिनाइयों भरे रहे. विशेष तौर पर चीन द्वारा भारत पर आक्रमण करने के मुद्दे और रक्षा मंत्री पर लगने वाले आरोपों के कारण. नेहरू की ताक़त खत्म होने के साथ ही क्षेत्रीय नेताओं के सिंडिकेट का उदय हुआ.

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बेवल पंचायतः ईमानदारी की कीमत चुकाता एक सरपंच

संजय ब्रह्मचारी उर्फ संजय स्वामी की आंखों में एक सपना था. वह सपना था, गांधी जी के सपनों को साकार करने का. दिल्ली एवं मुंबई में हमारी सरकार, लेकिन हमारे गांव में हम ही सरकार यानी हमारा गांव हमारी सरकार. 13 सितंबर, 2010 की रात हरियाणा के महेंद्रगढ़ ज़िले की बेवल पंचायत में इस सपने को साकार करने की एक शुरुआत हुई थी, जब संजय स्वामी ने ग्रामसभा की खुली बैठक में सरपंच पद का प्रभार काफी मशक्कत के बाद संभाला था.

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महाराष्‍ट्रः बेलगांव पर सियासत गर्म

कर्नाटक सरकार द्वारा मराठी बाहुल्य सीमावर्ती बेलगांव (बेलगाम) की महानगरपालिका बर्खास्त किए जाने को लेकर महाराष्ट्र के सियासी गलियारे में अचानक गर्मी आ गई है. सभी राजनीतिक दलों ने एक स्वर में इस निर्णय की आलोचना करते हुए कर्नाटक सरकार पर मराठीभाषियों का उत्पीड़न करने का आरोप लगाया. यह मुद्दा महाराष्ट्र विधानमंडल के शीतकालीन सत्र में भी उठा.

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महाराष्‍ट्रः राजनाथ का विदर्भ दौरा सवालों के घेरे में

भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता एवं पूर्व अध्यक्ष राजनाथ सिंह की विदर्भ यात्रा पर अब सवाल उठाए जा रहे हैं. उनकी इस यात्रा को कुछ संगठन व्यक्तिगत यात्रा तक क़रार दे रहे हैं और पार्टी की नीति पर भी प्रश्नचिन्ह लग रहे हैं. भाजपा नेताओं की औद्योगिक इकाइयों द्वारा भी किसानों की ज़मीन हड़पने का आरोप लगाया जा रहा है. इससे राजनाथ की विदर्भ यात्रा विफल होती लग रही है.

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बिहारः दागी अफसरों की भरमार

बिहार में दाग़ी अधिकारियों की भरमार है. निज़ाम बदलने से इनकी सेहत पर कोई फर्क़ नहीं पड़ा. के सेंथिल कुमार इस बात के ताज़ातरीन उदाहरण हैं. भ्रष्टाचार के मामले से घिरे भारतीय प्रशासनिक सेवा के इस वरिष्ठ अधिकारी के ज़िम्मे हाल तक बिहार में जनगणना का पूरा कार्यक्रम था. के सेंथिल कुमार ने पटना का निगमायुक्त रहते हुए जो गुल खिलाए, उनसे प्राय: सभी वाक़ि़फ हैं.

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आरोप लगाने से ज़्यादा कठिन है शासन करना

वर्ष 1970 की बात है. एडवर्ड हीथ प्रधानमंत्री पद की दौड़ में हैरल्ड विल्सन के ख़िला़फ खड़े थे और लोगों से यह वादा कर रहे थे कि मैं महंगाई कम कर दूंगा. जब वह जीत गए, प्रधानमंत्री बन गए, तब उन्हें पता चला कि विपक्ष में रहकर आरोप लगाने से ज़्यादा कठिन सत्ता में आने के बाद काम करना होता है, अपने वादों को पूरा करना होता है.

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भद्रजनों की अभद्रता

क्रिकेट को देश की जनता धर्म मानती है तो थ्योरी में इसे जेंटलमैन गेम का दर्जा दिया गया है. कुछ लोग इसे सामंतों को खेल बताते हैं, जिसमें दो सामंती खेलते हैं और बाकी खिलाड़ी मज़दूरी करते हैं. लेकिन अब क्रिकेट को लेकर एक नई परिभाषा ग़ढी जा रही है. अब इसे पैसा, ग्लैमर और विवादों का पिटारा माना जा रहा है. ज़ाहिर है, इस नई परिभाषा में क्रिकेटर भी ख़ुद को सांचे में ढालने की कोशिश कर रहे हैं.

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काले धन पर टिका भारतीय प्रजातंत्र

मैंने दो पत्रकारों को बात करते सुना था. एक ने दूसरे से कहा कि उसने शेयर बाज़ार घोटाले के एक आरोपी को प्रधानमंत्री के पास चार करोड़ रुपये ले जाते देखा था. दूसरे ने तपाक से कहा कि उसे विश्वास नहीं होता, क्योंकि प्रधानमंत्री इतनी छोटी रकम पर तो छींक भी नहीं मारेंगे.

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लगता है बाबा रामदेव से कांग्रेस डर गई

राजनीति और आध्यात्म में सबसे बड़ा फर्क़ यह है कि आध्यात्म मनुष्य को मौन कर देता है, जबकि राजनीति में मौन रखना सबसे बड़ा पाप साबित होता है. बाबा रामदेव के हमले के बाद कांग्रेस पार्टी आध्यात्म की ओर मुड़ गई है, उसने चुप्पी साध ली है.

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दिल्‍ली का बाबूः अवज्ञा की सज़ा

हिमाचल प्रदेश में एक वरिष्ठ आईएएस अधिकारी मनीषा श्रीधर पर लगे अवज्ञा के आरोप का मुद्दा इन दिनों यहां के बाबुओं के बीच चर्चा का विषय बना हुआ है. राज्य सरकार ने 1984 बैच की इस अधिकारी के खिला़फ जांच शुरू कर दी है.

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कांग्रेस और रामदेव आमने-सामने

भारत की राजनीति का यह अजीबोग़रीब दौर है. संत राजनीति कर रहे हैं और राजनीतिक दल संतों की तरह बर्ताव कर रहे हैं. संत से मतलब मौन धारण करना है. ऐसा पहली बार देखा जा रहा है कि किसी पार्टी पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगाए जा रहे हैं, देश भर में रैलियां करके राजनेताओं के ख़िला़फ आग उगली जा रही है और देश चलाने वाली पार्टी चुप्पी साधकर सब कुछ सुन कर रही है.

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बाबा रामदेव अब सिर्फ रामदेव

राजनीति काजल की काली कोठरी है. ऐसे बहुत ही कम लोग होते हैं, जो इस काली कोठरी में घुस जाएं और बेदाग़ निकल जाएं. बाबा रामदेव राजनीति की इस काली कोठरी में घुसे नहीं कि उनके दामन पर दाग़ लगने लगे हैं. पहले कांग्रेस पार्टी के दिग्विजय सिंह ने बाबा को मिलने वाले काले धन की जांच की मांग की.

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रामदेव संतों की मर्यादा में रहकर काम करें

बाबा रामदेव पर लगे आरोपों की सच्चाई जानने के लिए समन्वय संपादक डॉ. मनीष कुमार ने सुमेर पीठ के जगतगुरु शंकराचार्य नरेंद्रानंद सरस्वती से बातचीत की. प्रस्तुत हैं मुख्य अंश:

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काला धन बनाम राजनीतिक हथकंडे

भारत दुनिया की नज़रों में 15 अगस्त, 1947 को स्वतंत्र हो गया था. उस समय हमारे नेताओं, अधिकारियों एवं देशभक्तों के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती थी इस विशाल राष्ट्र को आत्मनिर्भर बनाना. वहीं दूसरी तऱफ देश के अंदर वे शक्तियां भी सक्रिय हो उठीं, जिन्हें भारत की आत्मनिर्भरता और आम जनता से ज्यादा फिक्र इस बात की थी कि वे किस प्रकार कम समय में अधिक धन-संपत्ति का संग्रह कर सकें.

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साधु-संत के वेश में खूंखार अपराधी

एक दौर ऐसा था कि धर्म क्षेत्र से जुड़े साधु-संत मायावी प्रलोभनों से दूर रहकर समाज को संस्कारित व धार्मिक बनाने में अपनी महती भूमिका निभाते हुए स्वयं सात्विक-सरल जीवन जीते थे. काम, क्रोध, मद लोभ को त्याग कर दूसरों को प्रेरणा देते हुए खुद का जीवन दूसरों के हितार्थ होम कर देते थे.

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