सीएजी, संसद और सरकार

आज़ादी के बाद से, सिवाय 1975 में लगाए गए आपातकाल के, भारतीय लोकतांत्रिक संस्थाएं और संविधान कभी भी इतनी तनाव भरी स्थिति में नहीं रही हैं. श्रीमती इंदिरा गांधी ने संविधान के प्रावधान का इस्तेमाल वह सब काम करने के लिए किया, जो सा़फ तौर पर अनुचित था और अस्वीकार्य था. फिर भी वह इतनी सशक्त थीं कि आगे उन्होंने आने वाले सभी हालात का सामना किया. चुनाव की घोषणा की और फिर उन्हें हार का सामना करना पड़ा.

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भारत यानी डॉ. जैकेल और मिस्टर हाइड

पाकिस्तान भारत की तरह किस मायने में समान है? इसमें कोई शक नहीं कि वह क्रिकेट में बेहतर है. इंग्लैंड से हुए मुक़ाबले में उसे जीत मिली, जबकि ऑस्ट्रेलिया में भारत का सूपड़ा सा़फ हो गया. जहां तक सुप्रीम कोर्ट का सवाल है तो निश्चित तौर पर वह भी भारत के सुप्रीम कोर्ट की तरह अच्छा है.

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बिहारः जमीन आवंटन के नाम पर महादलितों के साथ धोखा

सूबे के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने अपने 6 साल के शासनकाल में महादलित आयोग क गठन किया. उसी तरह भूमि सुधार आयोग का भी गठन किया. इन आयोगों के अध्यक्षों द्वारा सरकार को भूमिहीन महादलितों को आवासीय भूमि देने की अनुशंसा की गई थी.

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पुरा प्रोजेक्‍ट आवंटन में धांधलीः देशमुख के लिए चुनौती होंगे ऐसे अधिकारी

देश की सत्तर फीसदी आबादी की नियति तय कर सकने का अधिकार है ग्रामीण विकास मंत्रालय के पास. उसके कंधों पर देश के 6 लाख से भी ज़्यादा गांवों के विकास की ज़िम्मेदारी है. सैकड़ों करोड़ों का फंड है, मनरेगा और पुरा जैसी महत्वाकांक्षी योजनाएं भी हैं.

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एलडीएः लूटो, डाका डालो अथॉरिटी

लखनऊ डेवलपमेंट अथॉरटी को राजधानी के नागरिक लूटो डाका डालो अथॉरटी के नाम से पुकारते हैं. इस नाम पर ऐतराज हो सकता है, पर सच से रूबरू होते ही हर कोई मानने को तैयार हो जाता है कि यह नाम सटीक है

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कोटवारों को इंसाफ कब मिलेगा

कोटवार एक ऐसा शब्द जो दूर दराज में रहने वाले ग्रामीणों और प्रशासन के बीच सेतु का काम करता है. सालों से ग्रामीण प्रशासनिक सेवा में लगे ये लोग कोटवार कहे जाते हैं.

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