लक्ष्‍मी सहगल : लड़ाई अब भी जारी है

कैप्टन लक्ष्मी सहगल कभी पहचान की मोहताज नहीं रहीं. उनकी ज़िंदगी का हर पड़ाव उनके राजनीतिक उदय की एक अप्रत्याशित कहानी कहता है. आज़ाद हिंद फौज में कैप्टन बनने से लेकर 2002 में राष्ट्रपति के चुनाव लड़ने तक वह भारतीय राजनीति में सकारात्मक भूमिका निभाती रहीं. नेताजी सुभाष चंद्र बोस की क़रीबी मानी जाने वाली लक्ष्मी सहगल का 94 वर्ष की उम्र में कानपुर में निधन हो गया.

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बंद मिलें और जनप्रतिनिधियों की चुप्पी

समस्तीपुर बिहार का प्रमुख ज़िला है. यहां पूर्व मध्य रेलवे का मंडलीय कार्यालय है, उत्तर बिहार का इकलौता राजेंद्र कृषि विश्वविद्यालय है. फिर भी यह जिला औद्योगिक क्षेत्र में पिछड़ा है. प्राकृतिक संसाधनों की उपलब्धता के बावजूद यहां उद्योग पनप नहीं पा रहे हैं.

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सरकार खिलाडि़यों से खेल रही है

कुछ दिन पहले पान सिंह तोमर नाम की एक फिल्म आई थी. फिल्म के निर्देशक तिगमांशु धूलिया ने खिलाड़ी से बाग़ी बनने की एक कहानी को रूपहले परदे पर दिखाया. हिमांशु ने इस फिल्म को उन खिलाड़ियों को समर्पित किया, जिन्होंने देश के गौरव और सम्मान के लिए अपना जीवन न्योछावर कर दिया और इसके बाद भी वे गुमनामी और बदहाली में जीने को मजबूर रहे.

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जीने का अधिकार अभियानः जन जागरण के नए प्रयोग की दस्तक

अपने हितों और अधिकारों के लिए आदिवासियों को जगाने और जुटाने का यह अनूठा सामाजिक प्रयोग है. नाम है जीने का अधिकार अभियान, जो मध्य प्रदेश के जबलपुर, कटनी एवं मंडला ज़िलों के ढाई दर्जन से अधिक आदिवासी गांवों में अपने पैर जमाने की तैयारी कर रहा है.

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सियासत के शहर में सन्नाटा

प्रथम स्वतंत्रता संग्राम से लेकर जंग-ए-आज़ादी में बिस्मिल अशफाक-रोशन की साझी शहादत, साझी विरासत वाला शहर शाहजहांपुर आज न जाने क्यों राजनीतिक शून्यता का शिकार हो गया है. आज़ादी के बाद भी सेठ विशन चंद्र सेठ, प्रेम किशन खन्ना, जितेंद्र प्रसाद व सत्यपाल सिंह यादव जैसे कद्दावर नेता देश और प्रदेश की राजनीति में छाये रहे. अब मौजूदा हालात कुछ इस तरह बन गये हैं कि आरक्षण के भंवर में फंसा यह ज़िला सियासी तौर पर रस्म अदायगी तक सिमट कर रह गया है, ना पहले जैसी चर्चायें होती हैं ना सियासी कोठियों की धमक सुनाई देती है और ना ही समर्थकों में कोई जोश-ख़रोश दिखाई पड़ता है. सियासत जैसे कोई ग़ैर ज़रूरी चीज़ हो चुकी हो.

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आज़ादी के 63 बरसों बाद भी बेगाने

हमारे मुल्क के नीति नियंता किस तरह ग़ैर ज़िम्मेदारी और बिना दूरअंदेशी से अपनी नीतियां बनाते हैं, इसका एहसास हमें अभी हाल में आए शत्रु संपत्ति संशोधन और विधिमान्यकरण विधेयक का हश्र देखकर होता है. हिंदुस्तानी मुसलमानों की ज़मीन-जायदाद से सीधे-सीधे जुड़े इस संवेदनशील विधेयक, जिस पर मुल्क भर में बहुत विचार-विमर्श की ज़रूरत थी, को गोया इस तरह पेश करने की तैयारी थी, मानो यह कोई मामूली विधेयक हो.

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आज़ादी का संघर्ष और समाजवादी

समाजवादी आंदोलन की शुरुआत भारत और दुनिया में एक अर्थ में बहुत पहले हो जाती है. वह अर्थ है अनासक्ति का, मिलकियत और ऐसी चीज़ों के प्रति लगाव ख़त्म करने या कम करने का, मोह घटाने का. जबसे समाजवाद के ऊपर कार्ल मार्क्स की छाप बहुत पड़ी, तबसे एक दूसरा अर्थ सामने आ गया.

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क्रांतिकारियों का पहला धमाका

22 जून, 1897 को रैंड को मौत के घाट उतार कर भारत की आज़ादी की लड़ाई में प्रथम क्रांतिकारी धमाका करने वाले वीर दामोदर पंत चाफेकर का जन्म 24 जून, 1869 को पुणे के ग्राम चिंचवड़ में प्रसिद्ध कीर्तनकार हरिपंत चाफेकर के ज्येष्ठ पुत्र के रूप में हुआ था. उनके दो छोटे भाई क्रमशः बालकृष्ण चाफेकर एवं वासुदेव चाफेकर थे.

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