कश्मीर का हल कश्मीर में है : दिल्ली या इस्लामाबाद में नहीं

एक परिप्रेक्ष्य (पर्सपेक्टिव) में अपनी बात रखूंगा. जब एक परिप्रेक्ष्य में बात होती है तो उसमें आपको राजनीति के साथ-साथ

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पाकिस्तान अपना नज़रिया बदले

पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में सड़कों के किनारे नज़र आते पोस्टर्स और टेलीविज़न चैनलों पर प्रसारित किए जा रहे विज्ञापनों में पिछले दो साल के दौरान सरकार की उपलब्धियों को गिनाया जा रहा है. सरकार द्वारा प्रायोजित इन विज्ञापनों में इसकी तथाकथित कामयाबियों को ख़ूब ब़ढा-च़ढाकर पेश किया जा रहा है.

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आक्रामक कूटनीति की समस्याएं

पाकिस्तान के साथ सचिव स्तर की बातचीत के लिए भारत की पेशकश से दोनों देशों के बीच गतिरोध दूर होने की संभावना है. लेकिन, तत्काल चुनौती यह है कि बातचीत का रास्ता कैसे शुरू हो?

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भारतीय कंपनियां भी बेहतर सामरिक साज़ोसामान बना सकती हैं

सैद्धांतिक तौर पर गणतंत्र दिवस परेड हमारी सैन्य शक्तिके प्रदर्शन का एक अवसर है, लेकिन व्यवहारिक तौर पर ऐसा लगता है, जैसे हमारी सैन्य कमज़ोरियां ज़ाहिर हो रही हैं. अगर स़िर्फ कमज़ोर प्रदर्शन का सवाल है तो कोई बात नहीं है. असल समस्या हमारी सैन्य क्षमता में हो रहे ह्रास की है, जो सालों से राजनीतिक मतभेद, नौकरशाहों के अहं और सैन्य निराशा से उपजा है.

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दोराहे पर पाकिस्तान का लोकतंत्र

उन्हें यह एहसास नहीं हुआ कि वह सभ्य समाज, जिसने सेना की मुख़ाल़फत की थी, वही आईएसआई और सेना को कमज़ोर करने वाले अधिनियम कैरी-लुगर के प्रावधानों का भी विरोध करने लगेगा. बहुत से राजनीतिज्ञ यह समझने में असफल रहे कि रक्षा मंत्रालय की क्षमताओं को बढ़ाने, इसकी शक्तियों को सभ्य समाज के अनुरूप बनाने और फैसला लेने वाला तंत्र बनाने के लिए इसमें नई जान फूंकने की ज़रूरत है

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