फर्रु़खाबाद को अब धोखा बर्दाश्त नहीं

अरविंद केजरीवाल फर्रु़खाबाद गए भी और दिल्ली लौट भी आए. सलमान खुर्शीद को सद्बुद्धि आ गई और उन्होंने अपनी उस धमकी को क्रियान्वित नहीं किया, जिसमें उन्होंने कहा था कि केजरीवाल फर्रु़खाबाद पहुंच तो जाएंगे, लेकिन वापस कैसे लौटेंगे. इसका मतलब या तो अरविंद केजरीवाल के ऊपर पत्थर चलते या फिर गोलियां चलतीं, दोनों ही काम नहीं हुए.

Read more

लोकतंत्र के साथ खिलवाड़ मत कीजिए

सरकार का संकट उसकी अपनी कार्यप्रणाली का नतीजा है. सरकार काम कर रही है, लेकिन पार्टी काम नहीं कर रही है और हक़ीक़त यह है कि कांग्रेस पार्टी की कोई सोच भी नहीं है, वह सरकार का एजेंडा मानने के लिए मजबूर है. सरकार को लगता है कि उसे वे सारे काम अब आनन-फानन में कर लेने चाहिए, जिनका वायदा वह अमेरिकन फाइनेंसियल इंस्टीट्यूशंस या अमेरिकी नीति निर्धारकों से कर चुकी है.

Read more

मारुति, मजदूर और तालाबंदी : कामगारों की अनदेखी महंगी पड़ेगी

मज़दूरों की गहमागहमी और मशीनों की घरघराहट से गुलज़ार रहने वाले मानेसर (गुड़गांव) के मारुति सुजुकी प्लांट में इन दिनों सन्नाटा पसरा हुआ है. प्लांट के भीतर मशीनें बंद हैं और काम ठप पड़ा है. पिछले महीने मारुति सुजुकी प्रबंधन और मज़दूरों के बीच हुए विवाद में कंपनी के एचआर हेड की मौत हो जाने के बाद हिंसा भड़क उठी. दोनों पक्षों के बीच हुई मारपीट में कई दर्जन लोग घायल हो गए.

Read more

फैसले न लेने की कीमत

मनमोहन सिंह की बुनियादी समस्या यह है कि वह खुद फैसले नहीं लेना चाहते, लेकिन प्रधानमंत्री हैं तो फैसले तो लेने ही थे. जब उनके पास फाइलें जाने लगीं तो उन्होंने सोचा कि वह क्यों फैसले लें, इसलिए उन्होंने मंत्रियों का समूह बनाना शुरू किया, जिसे जीओएम (मंत्री समूह) कहा गया. सरकार ने जितने जीओएम बनाए, उनमें दो तिहाई से ज़्यादा के अध्यक्ष उन्होंने प्रणब मुखर्जी को बनाया.

Read more

पश्चिमी उत्तर प्रदेश : दुधारू पशुओं की क़त्लगाह

दोआब स्थित मेरठ और उसके आसपास के क्षेत्रों में कभी दूध-दही की नदियां बहती थीं. बुलंदशहर, बाग़पत एवं मुज़फ्फरनगर में डेयरी उद्योग चरम पर था. पशुपालन और दुग्धोपार्जन को गांवों का कुटीर उद्योग माना जाता था, लेकिन जबसे यहां अवैध पशु वधशालाएं बढ़ीं, तबसे दूध-दही की नदियों वाले इस क्षेत्र में मांस और शराब का बोलबाला हो गया.

Read more

अपनी माटी से जुड़ते बिहारी कारोबारी

कुछ साल पहले देश में यह धारणा बन चुकी थी कि बिहार में उद्योग-धंधे लगाना किसी भी क़ीमत पर संभव नहीं है. ऐसा मानने वालों का तर्क था कि राज्य में कोई औद्योगिक माहौल ही नहीं है, क्योंकि वहां बुनियादी सुविधाओं से लेकर आधारभूत संरचनाओं की घोर कमी है.

Read more

श्रमिकों की जिंदगी से खिलवाड़

मध्य प्रदेश का कटनी ज़िला भारत के भौगोलिक केंद्र में स्थित होने के कारण बेशक़ीमती खनिज संपदा के प्रचुर भंडारण सहित जल संपदा की दृष्टि से महत्वपूर्ण है. यही वजह है कि स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया लिमिटेड (सेल) द्वारा अपने इस्पात उद्योगों हेतु आवश्यक गुणवत्ता पूर्ण कच्चे माल के तौर पर इस्तेमाल किए जाने वाले चूना पत्थर (लाईम स्टोन) की खदानें यहां के ग्राम कुटेश्वर में स्थापित की गई थीं.

Read more

ट्रेड यूनियन की आवश्यकता और इतिवृत्त

किस तरह मज़दूर पूंजीवादी उद्योगपतियों का मुक़ाबला कर सका, इसका इतिवृत्त है. यह ज़ाहिर था कि कोई स्त्री या पुरुष, जो काम करता हो, नौकरी करता हो, अकेले जाकर मालिक के साथ न बहस कर सकता है, न मुक़ाबला. मालिकों का नपा-तुला यही जवाब होता है कि अगर इस मज़दूरी और स्थिति में तुम काम नहीं करोगे तो तुम्हारे भाई दूसरे सैकड़ों करने वाले तैयार हैं.

Read more

धनवान बनने के लोभ का कारण

असमान वित्त वितरण से पैदा हुए अनेक ख़तरे हैं. खाली व्यापार-धंधों में ही नहीं, बल्कि फौज में या सेना में कहीं भी देख लीजिए, एक सिपाही की जितनी आमदनी होती है, उसके अफसर को उससे कई गुना ज़्यादा होती है. परिणामस्वरूप काफी असंतोष होता है.

Read more

झरियाः पहचान बनाने की जद्दोजहद

वर्ष 1952 में झरिया में आयोजित साहित्य सम्मेलन में राष्ट्र कवि रामधारी सिंह दिनकर ने अपनी कविता हाहाकार की ये पंक्तियां पढ़ी थीं. आधी सदी बाद ये पंक्तियां झरिया पर सटीक बैठ रही हैं. झरिया के नीचे लगी आग और इसके विस्थापन को लेकर यहां हाहाकार मचा हुआ है. राष्ट्र के औद्योगिक विकास में मेरुदंड की भूमिका निभाने वाला झरिया कोयलांचल आज अपनी पहचान बचाने के लिए जद्दोजहद कर रहा है.

Read more

बीडी मजदूर : जीवन में खुशहाली कब आएगी

किसी भी देश की आर्थिक उन्नति उसके औद्योगिक विकास पर निर्भर करती है. अगर वह किसी विकासशील देश की बात हो तो वहां के लघु उद्योग ही उसके आर्थिक विकास की रीढ़ होते हैं. भारत भी एक विकासशील देश है. ज़ाहिर है, भारत के विकास की कहानी के पीछे भी इन्हीं उद्योगों का योगदान है, लेकिन अब भारत धीरे-धीरे विकासशील देशों की कतार में का़फी आगे आ चुका है.

Read more

विकास दर धीरे-धीरे गिरने लगी है

वेन जियाबाओ पिछले दिनों लंदन गएऔर वहां उन्होंने ब्रिटिश प्रधानमंत्री को इस बात के लिए फटकारा कि उन्हें अपने अतिथि के सामने मानवाधिकार पर भाषण नहीं देना चाहिए, लेकिन तब ब्रिटिश प्रधानमंत्री डेविड कैमरन के पास जियाबाओ की बात सुनने के अलावा कोई विशेष चारा नहीं था, क्योंकि वह चीन से व्यापार और निवेश को इच्छुक थे.

Read more

मध्‍य प्रदेशः वेलस्‍पन कंपनी का कारनामा- देश में कितने और सिंगुर बनेंगे

विकास के नाम पर आ़खिर कब तक किसानों और मज़दूरों को उनके हक़ से वंचित किया जाएगा? सेज, नंदीग्राम, सिंगुर, जैतापुर, फेहरिस्त लंबी है और लगातार लंबी होती जा रही है. इसी क़डी में एक और नाम जु़ड गया है वेलस्पन का. मध्य प्रदेश के कटनी ज़िले में वेलस्पन कंपनी के प्रस्तावित पावर प्लांट की स्थापना हेतु ज़िले की बरही एवं विजयराघवगढ़ तहसीलों के गांव बुजबुजा व डोकरिया के किसानों की लगभग 237.22 हेक्टेयर भूमि का शासन द्वारा अधिग्रहण किए जाने की खबर है.

Read more

चूडी़ मजदूरों की जिंदगी बेहाल

पुरानी कहावत है कि दिया तले हमेशा अंधेरा रहता है. यह बात पूरी तरह देश के कांच उद्योग फिरोज़ाबाद पर लागू होती है. फिरोजाबाद के कांच उद्योग ने अपनी कला से न स़िर्फ देश की सुहागिनों की कलाइयों को सजाया बल्कि कांच की कलात्मक कारीगरी से विदेशों में भी नाम रोशन किया है.

Read more

अंधाधुंध औद्योगिकरणः विकास या विनाश?

विकास के वैसे तो अलग-अलग पैमाने हो सकते हैं, लेकिन जब विकास का रास्ता आगे चलकर विनाश पैदा करे तो ऐसे विकास की कितनी ज़रूरत सरकार को होनी चाहिए? खासकर तब, जब मामला लोगों की ज़िंदगियों से जुड़ा हुआ हो. ऐसे में लोगों की ज़िंदगी पर कितना असर पड़ता है, यह बात सोचने पर जेहन में कई सवाल खड़े हो जाते हैं.

Read more

गलत समय पर सही बहस

भले ही मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने राज्य सभा के औचित्य के सवाल पर दिया गया अपना बयान वापस ले लिया है, फिर भी इस पर बहस तो छिड़ ही गई है. जिस तरह भारतीय राजनीति का अपराधीकरण, भ्रष्टाचारीकरण व आर्थिकीकरण हो रहा है, उसे देखकर शिवराज सिंह चौहान के बयान को अप्रासंगिक नहीं ठहराया जा सकता.

Read more

गयाः देश-विदेश तक फैली तिलकुट की सोंधी सुगंध

उत्तर भारत का सांस्कृतिक नगर गया मौसमी मिष्ठानों के लिए चर्चित रहा है. यहां लगभग हर ॠतु के अनुसार मिष्ठानों के निर्माण की परंपरा आज भी बरकरार है. बरसात के मौसम में अनरसा, गर्मी में लाई एवं जाड़े में तिलकुट का कारोबार उफान पर रहता है.

Read more

चंदेरी साड़ी उद्योगः कब दूर होगी बुनकरों की बदहाली

मध्य प्रदेश के चंदेरी की हथकरघा कला जो देखता है, वही कायल हो जाता है, लेकिन इससे जुड़ा दूसरा सच यह है कि चंदेरी साड़ी उद्योग जैसे-जैसे व्यवसायिक गति पकड़ता जा रहा है, परंपरागत साड़ियां लुप्त होती जा रही हैं. चंदेरी के बुनकर कम समय में कम लागत की अधिक बिकने वाली साड़ियां बनाने में अधिक रुचि ले रहे हैं.

Read more

ना जइयो परदेस

संजय साव की उम्र 32 साल है. वह बिहार के गोपालगंज का रहने वाला है. गांव में रहकर वह इतना नहीं कमा पाता कि अपने परिवार के भोजन और अन्य ज़रूरतों को पूरा कर सके. दिक्कतों को झेलते-झेलते परेशान होकर वह कमाने के लिए बाहर जाने का फैसला करता है, ताकि अपने घर कुछ पैसा भेज सके और बच्चों को कम से कम दो व़क्त की रोटी नसीब हो.

Read more

उत्तर प्रदेश-उत्तराखंडः मेहनतकशों का सम्‍मान नहीं

समाज में स्पष्ट रूप से दो वर्ग देखे जा सकते हैं. एक है पारंपरिक सामंती एवं नव धनाढ्य शासक वर्ग, जिसमें अधिकांश नौकरीपेशा हैं और दूसरा है मेहनतकश वर्ग, जो इंसान की मूलभूत आवश्यकताओं को पूरा करने हेतु भौतिक सामग्रियों का उत्पादन करता है.

Read more

मध्‍य प्रदेशः विकास के नाम पर लूटखसोट

आज देश ही नहीं, दुनिया भर में विकास की मौजूदा अवधारणा, दिशा और प्रक्रिया एवं उसके नतीजों को प्रकृति, पर्यावरण तथा आम जन विरोधी साबित करते हुए उन पर गंभीर सवालिया निशान खड़े किए जा रहे हैं.

Read more

उद्यमी करें काज सरकार करे राज

बिहार धातु एवं खनन क्षेत्र की विशाल कंपनी वेदांता के मुखिया अनिल अग्रवाल की जन्मभूमि है. उनका उड़ीसा निवेश राजनीतिक उठापटक के चलते रद्द कर दिया गया. बकौल अग्रवाल, अब मैं खून के आंसू रो रहा हूं. ऐसे राजनीतिक परिदृश्य में बिहार को कर्मभूमि बनाने वाले उद्योगपति निवेश के मुद्दे पर क्या सोचते हैं?

Read more

बढ़ेगा कारोबार, बढ़ेगा बिहार

कहा जाता है कि बेहतर राजनीतिक माहौल में ही आर्थिक उन्नति के अंकुर छिपे होते हैं. चुनावी सरगर्मी शुरू होते ही निज़ाम बदलने की संभावना ने कारोबारी जगत में हलचल पैदा कर दी है. आने वाला समय कैसा होगा, क्या कारोबारी जगत मौजूदा निज़ाम से खुश है, अगर है तो क्यों, क्या सभी वर्ग संतुष्ट हैं, कौन सी उम्मीदें पूरी नहीं हो सकीं और अब नई सरकार से क्या अपेक्षाएं हैं आदि विचार बिंदुओं पर हमने व्यापारी समाज का मन टटोलने की कोशिश की.

Read more

पूरब न जइयो सइयां, चाकरी नहीं हैः औद्योगिक बदहाली से प्रवासियों का बुरा हाल

यह दौर था 30-40 साल पहले का, जब बिहार-उत्तर प्रदेश में महेंद्र मिश्र की यह पूरबी ख़ूब गाई जाती थी. नाच या नौटंकी में इस तरह के गाने चलते थे. उस जमाने में कमाई के लिए पूरब का क्रेज़ था और प्रवासी श्रमिक सतुआ-भूजा की गठरी लेकर निकल पड़ते थे श्रमसंधान के लिए. उनका रुख़ पूरब की ओर यानी असम व पश्चिम बंगाल की ओर होता था.

Read more

स्‍वरोजगार के लिए बेहतरीन विकल्‍प है फ्रेंचाइजी

एक वक्त था जब नौकरी के लिए पढ़े-लिखे लोगों की ज़रूरत थी, पर मंदी के दौर ने ऐसा माहौल बना दिया है कि पढ़े-लिखे लोगों को भी नौकरी पाने के लिए खाक छानना पड़ रहा है. हालात इस कदर खराब हो रहे हैं कि लोगों की हाथ आई नौकरियां भी छूट रही हैं. ऐसे में फ्रेंचाइजिंग इंडस्ट्री में हाथ आजमाना एक बेहतर विकल्प हो सकता है.

Read more

गया का अगरबत्ती उद्योगः बेहाल कारीगर, उदासीन सरकार

गया ज़िला अंतर्गत पंचायती अखाड़ा में रुकसाना अगरबत्ती बनाकर अपने परिवार का गुज़ारा करती है. रुकसाना एवं उसके बच्चे हर रोज़ तीन से चार किलो अगरबत्ती बनाते हैं. उसका पति मज़दूरी करता है. रुकसाना का कहना है कि वह तीन से चार हज़ार रुपये महीना कमा लेती है. बात करते-करते उसकी आंखों से आंसू बहने लगते हैं और वह अपनी परेशानियां बयां करने लगती हैं.

Read more

सद्भाव की मिसाल लालगोपालगंज

कभी उत्तर प्रदेश के अति संवेदनशील इलाक़े के रूप में पहचाना जाने वाला एक प्रमुख क़स्बा अब हिंदू-मुस्लिम एकता का प्रतीक बन चुका है. इलाहाबाद की सीमा पर स्थित क़रीब चालीस हज़ार की आबादी वाले क़स्बा लालगोपालगंज को समूचे उत्तर भारत के प्रमुख देवी-देवताओं के मंदिरों एवं तीर्थस्थलों के लिए चुनरी-कलावा बनाने और बतौर निर्यातक पहला स्थान पाने का गौरव हासिल है.

Read more

हिंदुस्‍तान फर्टिलाइजर कॉरपोरेशन बरौनीः विकास के वादे कहां गए

बिहार का बरौनी स्थित हिंदुस्तान फर्टिलाइज़र कॉरपोरेशन लिमिटेड (एचएफसीएल). 1990 के आसपास इस कारखाने में अच्छी ख़ासी मात्रा में उर्वरक का उत्पादन होता था, लेकिन 2002 में केंद्र में एनडीए और बिहार में लालू प्रसाद यादव के शासनकाल के दौरान यह कारखाना घाटे के चलते बंद हो गया. कारखाना बंद होने से इससे जुड़े हज़ारों कामगार बेरोज़गार हो गए.

Read more

695 उद्योग बंद नए की रफ्तार मंद

धनबाद कोयलांचल का नाम प्रमुख औद्योगिक क्षेत्रों में शुमार है. बीसीसीएल एवं टाटा की कोल इंडिया कंपनियों के अलावा यहां पूर्व में काफी संख्या में छोटे-बड़े उद्योग सुचारू रूप से चल रहे थे. मगर, बाद में कई बड़े उद्योग विभिन्न कारणों से बंद होते गए.

Read more