अमृता प्रीतम की कलम से

  मशहूर लेखिका अमृता प्रीतम को पंजाबी भाषा की पहली कवयित्री माना जाता है. उन्होंने उपन्यास लिखे, कहानियां लिखीं, आत्मकथा

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साहित्य पर आधारित बॉलीवुड फिल्में – झपकी के बाद ताज़गी का अहसास…

सदियां आती जाती रहेंगी और फिल्मों में विकास के नए-नए प्रतिमान भी ग़ढे जाते रहेंगे, लेकिन चर्चित साहित्यकारों के उपन्यास

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स्त्री विमर्श का विध्वंसकारी रूप!

पिछले कई महीनों से सोशल नेटवर्किंग साइट फेसबुक पर साहित्य और पत्रकारिता से जुड़ी कुछ बेहद अहम लेखिकाएं स्त्री विमर्श

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पूरे चांद की रात…

भारतीय साहित्य के प्रमुख स्तंभ यानी उर्दू के मशहूर अ़फसानानिग़ार कृष्ण चंदर का जन्म 23 नवंबर, 1914 को पाकिस्तान के गुजरांवाला ज़िले के वज़ीराबाद में हुआ. उनका बचपन जम्मू कश्मीर के पुंछ इलाक़े में बीता. उन्होंने तक़रीबन 20 उपन्यास लिखे और उनकी कहानियों के 30 संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं. उनके प्रमुख उपन्यासों में एक गधे की आत्मकथा, एक वायलिन समुंदर के किनारे, एक गधा नेफ़ा में, तूफ़ान की कलियां, कॉर्निवाल, एक गधे की वापसी, ग़द्दार, सपनों का क़ैदी, स़फेद फूल, प्यास, यादों के चिनार, मिट्टी के सनम, रेत का महल, काग़ज़ की नाव, चांदी का घाव दिल, दौलत और दुनिया, प्यासी धरती प्यासे लोग, पराजय, जामुन का पेड़ और कहानियों में पूरे चांद की रात और पेशावर एक्सप्रेस शामिल है. 1932 में उनकी पहली उर्दू कहानी साधु प्रकाशित हुई. इसके बाद उन्होंने पीछे म़ुडकर नहीं देखा.

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पुरानी तकनीक, कमज़ोर कहानी

समकालीन हिंदी कहानी के परिदृष्य पर नज़र डालें तो युवा कथाकारों ने अपनी कहानियों में शिल्प के अलावा उसके कथ्य में भी चौंकाने वाले प्रयोग किए हैं. आज की नई पीढ़ी के कहानीकारों के पास अनुभव का एक नया संसार है जिसको वे अपनी रचनाओं में व्यक्त कर रहे हैं. इस व़क्त के जो नए कथाकार हैं, उनके अनुभव में आर्थिक उदारीकरण के बाद देश में जो बदलाव आया है उसको सा़फ तौर पर परिलक्षित किया जा सकता है.

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औरत की बोली

पिछले कई सालों से हिंदी में साहित्येतर विधाओं की किताबों के प्रकाशन में का़फी तेज़ी आई है. प्रकाशकों के अलावा लेखकों ने भी इस ओर गंभीरता से ध्यान दिया है. कई लेखकों ने कहानी, कविता, उपन्यास से इतर समाज के उन विषयों को छुआ है, परखा है, जो अब तक हिंदी समाज की नज़रों से ओझल थे.

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साहित्य जगत में तकनीकी क्रांति

वर्तमान समय तकनीक का युग हो गया है. इससे कोई भी क्षेत्र अछूता नहीं रह गया है. भूमंडलीकरण की प्रक्रिया में दुनिया बहुत तेज़ी से सिकुड़ती और नज़दीक आती जा रही है. इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों में इंटरनेट एक ऐसा माध्यम हैं, जहां कथा साहित्य बहुतायत में उपलब्ध हो सकता है. हर क्षेत्र में तकनीक का इस्तेमाल किया जा रहा है. यही हमें साहित्य में भी देखने को मिल रहा है.

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आतंक के आका कि जीवनी

पाकिस्तान के मिलिट्री शहर एबटाबाद में जब बीते दो मई को दुनिया के सबसे दुर्दांत और खूंखार आतंकवादी को अमेरिकी नेवी सील्स ने मार गिराया तो पूरे विश्व के लोगों में मौत के इस सौदागर ओसामा बिन लादेन के बारे में जानने की जिज्ञासा बेतरह बढ़ गई. अमेरिकी कार्रवाई के बाद जिस तरह से एबटाबाद स्थित ओसामा के ठिकाने से उसके और उसकी पत्नियों, बच्चों, परिवार और उसके रहन-सहन के तौर तरीक़ों के बारे में खबरें निकल कर आ रही थीं, उसने ओसामा और उसकी निजी ज़िंदगी में लोगों की रुचि और बढ़ा दी.ं

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जन्‍मदिवस 31 जुलाई पर विशेषः प्रेमचंद के सपनों का भारत

मुंशी प्रेमचंद के सपनों का भारत निश्चित ही गांधी के सपनों का भारत था. गांधी ने आज़ाद भारत का बड़ा तल्ख तजुर्बा किया. प्रेमचंद इस मायने में भाग्यशाली थे कि उन्होंने आज़ाद भारत का दु:ख और पराभव नहीं देखा. बेकल उत्साही के एक गीत का यह मुखड़ा प्रेमचंद के सपनों के भारत को सजीव करता है:

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निज भाषा पर अभिमान करो

हिंदी में प्रकाशित किसी भी कृति-उपन्यास या कहानी संग्रह या फिर कविता संग्रह को लेकर हिंदी जगत में उस तरह का उत्साह नहीं बन पाता है, जिस तरह अंग्रेजी और अन्य भाषाओं में बनता है. क्या हम हिंदी वाले अपने लेखकों को या फिर उनकी कृतियों को लेकर उत्साहित नहीं हो पाते हैं. हिंदी में प्रकाशक पाठकों की कमी का रोना रोते हैं, जबकि पाठकों की शिकायत किताबों की उपलब्धता को लेकर रहती है.

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साहित्यकार समाज सुधारक नहीं होता

नवोदित उपन्यासकार महुआ माजी का मानना है कि साहित्यकार समाज सुधारक नहीं होता. वह सिर्फ लिखता है, ताकि लोग उस विषय पर मंथन करें कि क्या सही है और क्या ग़लत. अपने उपन्यास मैं बोरिशाइल्ला के लिए वर्ष 2007 में अंतरराष्ट्रीय इंदु शर्मा कथा सम्मान पाने वाली महुआ माजी रांची की रहने वाली हैं.

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कुंठा @ प्रेम डॉट कॉम

विमल कुमार हिंदी के पाठकों के बीच एक जाना-पहचाना नाम हैं. लिक्खाड़ पत्रकार हैं, तमाम पत्र-पत्रिकाओं में साहित्य और साहित्येतर विषयों पर उनके लेख और टिप्पणियां प्रकाशित होती रहती हैं. अच्छे कवि भी हैं और कविता के लिए 1987 में ही भारत भूषण पुरस्कार प्राप्त कर चुके हैं.

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उपन्यासकार की आ़जादी

अमेरिकी लेखक जोनाथन फ्रेन्ज का उपन्यास फ्रीडम पिछले कई हफ्तों से बेस्ट सेलर की सूची में बना हुआ है. यह उपन्यास न केवल बेस्ट सेलर की सूची में शीर्ष पर है, बल्कि पाठकों के साथ-साथ आलोचकों ने भी इसे खुले दिल से सराहा है.

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मां-बेटे के रिश्ते की नई इबारत

चंद साल पहले की बात है, आस्ट्रिया से एक ऐसी ख़बर आई थी, जिसने पूरे विश्व को झकझोर कर रख दिया था. एक ऐसी क्राइम स्टोरी, जो दुनिया भर के अख़बारों में कई दिनों तक सुर्ख़ियां बनी. आस्ट्रिया निवासी एक पापी पिता जोश फ्रिट्ज ने अपनी बेटी को चौबीस साल तक बंधक बनाकर रखा और इस दौरान उसके साथ बलात्कार करता रहा.

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उदय प्रकाश नहीं थे पहली पसंद

इस वर्ष के साहित्य अकादमी पुरस्कारों का ऐलान हो गया है. हिंदी के लिए इस बार का अकादमी पुरस्कार यशस्वी कथाकार और कवि उदय प्रकाश को उनके उपन्यास मोहनदास (वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली) के लिए दिया गया. उदय प्रकाश साहित्य अकादमी पुरस्कार डिज़र्व करते हैं, बल्कि उन्हें तो अरुण कमल, राजेश जोशी और ज्ञानेन्द्रपति से पहले ही यह सम्मान मिल जाना चाहिए था.

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पद्मश्री आचार्य जानकी वल्‍लभ शास्‍त्रीः तिमिर गरल पिया अमृत भोर के लिए

महाकवि आचार्य जानकी वल्लभ शास्त्री का साहित्य एक सुषुप्त ज्वालामुखी है, जो एक न एक दिन जनसामान्य को उद्वेलित करेगा. महाकाव्य राधा, चाणक्य एवं कालीदास जैसे उपन्यास और रूप-अरूप, तीर-तरंग, शिवा, मेघगीत, अवंतिका, कानन एवं अर्पण आदि काव्य संग्रहों के रचयिता और पद्मश्री सम्मान प्राप्त महाकवि जानकी वल्लभ शास्त्री की समस्त जीवन साधना ही उनकी साहित्य सर्जना है.

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लक्ष्मण राव: चाय वाला लेखक

लिखने, पढ़ने और देश-समाज के बारे में चिंतन-मनन करने के लिए वातानुकूलित घर-कमरा होना ज़रूरी नहीं है. कमोबेश यही साबित किया है दिल्ली के एक फुटपाथ पर चाय बेचने वाले लक्ष्मण राव ने, जो अब तक डेढ़ दर्जन से ज़्यादा कृतियों की रचना कर चुके हैं.

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साहित्य में नैतिकता: सवाल पुराने, विमर्श नया

हिंदी के मूर्धन्य कवि, आलोचक, स्तंभकार, कला मर्मज्ञ एवं पूर्व नौकरशाह अशोक वाजपेयी ने एक बार फिर से साहित्य में नैतिकता का राग छेड़ा है. विभूति-कालिया प्रकरण पर लिखते हुए अशोक वाजपेयी ने इस पूरे प्रसंग को नैतिकता से जोड़ने की कोशिश की. दरअसल यह एक पुराना सवाल है, जिस पर अशोक वाजपेयी ने नया विमर्श शुरू करने की कोशिश की है.

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मज़हब पर भारी परिवेश

अचानक एक दिन एक मित्र ने फोन कर बताया कि पत्रकार जैग़म इमाम का एक उपन्यास आया है और वह आपसे मिलकर अपना उपन्यास देना चाहते हैं. फिर एक दिन जैग़म मेरे दफ्तर आए और उपन्यास दे गए. यह जैग़म से मेरी पहली मुलाक़ात थी.

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अज्ञानता का दर्प

अभी ज़्यादा दिन नहीं बीते हैं, जब फिल्म थ्री इडियट्स में क्रेडिट को लेकर लेखक चेतन भगत ने ख़ासा बवाल खड़ा कर दिया था. चेतन भगत के दो हज़ार चार में लिखे उपन्यास फाइव प्वाइंट समवन-व्हाट नॉट टू डू एट आईआईटी पर विधु विनोद चोपड़ा ने फिल्म बनाई, जो सुपरहिट रही थी.

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सफलता तलाशता विवाद

आमिर ख़ान, राजू हिरानी और विधु विनोद चोपड़ा की फिल्म थ्री इडियट्स ने मुंबई फिल्म इंडस्ट्री में कमाई के सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए थे, लेकिन कमाई के साथ-साथ इस फिल्म ने अंग़्रेजी लेखकों के बीच प्रतिष्ठा पाने के लिए संघर्ष कर रहे चेतन भगत को हिंदी जगत में भी लोकप्रिय कर दिया.

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अनुवाद से जगती उम्मीदें

हिंदी में अनुवाद की हालत बेहद ख़राब है. जो अनुवाद हो भी रहे हैं, वे बहुधा स्तरीय नहीं होते हैं. अनुवाद इस तरह से किए जाते हैं कि मूल लेखन की आत्मा कराह उठती है. हिंदी के लेखकों में अनुवाद को लेकर बहुत उत्साह भी नहीं है. अमूनन अनुवाद में लेखक तभी जुटते हैं, जब उनके पास या तो काम कम होता है या नहीं होता है.

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हिंदी अकादमी कांग्रेसी नेता ने विवाद शुरू कराया

हिंदी में साहित्यिक पुरस्कारों की स्थिति बेहद ख़राब है. पुरस्कारों की विश्वसनीयता और उसके दिए जाने के तरीक़े को लेकर लगातार सवाल उठते रहे हैं. हालात तो यहां तक पहुंच गए हैं कि साहित्य अकादमी पुरस्कारों की साख पर भी बट्टा लगा है. लेकिन ताज़ा विवाद दिल्ली की हिंदी अकादमी के श्लाका सम्मान को लेकर उठा है.

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भारत और विदेशी लेखक

भारतीय संस्कृति और इस देश के धर्म एवं उसमें व्याप्त रीतियां-कुरीतियां विदेशी लेखकों को बहुत प्रिय हैं. पहले भी कई लेखकों ने इस देश और धर्म पर लिखा है. अपने छात्र जीवन के दौरान मैंने ए एल बैशम की किताब अ वंडर दैट वॉज इंडिया देखा पढ़ी थी और उस लेखन से कई सालों तक अभिभूत भी रहा. बाद के दिनों में भी इस देश की विविधताओं से विषय उठाकर अनेक किताबें लिखी गईं.

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यह आत्ममंथन का व़क्त है

साहित्य अकादमी के पुरस्कार वितरण समारोह में कुछ हिंदू संगठनों के विरोध से साहित्यिक जगत में तू़फान उठ खड़ा हुआ है. प्रगतिवाद और जनवाद के तथाकथित ठेकेदार इसे लेखकीय अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर भगवा हमला करार दे रहे हैं. इन बयानवीर जनवादियों को समारोह के दौरान हुए विरोध प्रदर्शन में फासीवाद की आहट भी सुनाई दे रही है, लेकिन किसी भी विरोध पर हल्ला मचाने वाले उक्त प्रगतिवादी लेखक यह भूल जाते हैं कि विरोध और विवाद के पीछे की वजह क्या है.

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