मुस्लिम सशक्तिकरण राजनीतिक फोरम बहुत ज़रूरी

स्वाधीनता के बाद मुसलमान देश की लगभग सभी राजनीतिक पार्टियों, यहां तक कि भाजपा के भी हिस्सा रहे और निर्वाचित-मनोनीत

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यह खामोशी देश के लिए खतरनाक है

कोयला घोटाला अब स़िर्फ संसद के बीच बहस का विषय नहीं रह गया है, बल्कि पूरे देश का विषय हो गया है. सारे देश के लोग कोयला घोटाले को लेकर चिंतित हैं, क्योंकि इसमें पहली बार देश के सबसे शक्तिशाली पद पर बैठे व्यक्ति का नाम सामने आया है. मनमोहन सिंह कोयला मंत्री थे और यह फैसला चाहे स्क्रीनिंग कमेटी का रहा हो या सेक्रेट्रीज का, मनमोहन सिंह के दस्तखत किए बिना यह अमल में आ ही नहीं सकता था.

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सीएजी, संसद और सरकार

आज़ादी के बाद से, सिवाय 1975 में लगाए गए आपातकाल के, भारतीय लोकतांत्रिक संस्थाएं और संविधान कभी भी इतनी तनाव भरी स्थिति में नहीं रही हैं. श्रीमती इंदिरा गांधी ने संविधान के प्रावधान का इस्तेमाल वह सब काम करने के लिए किया, जो सा़फ तौर पर अनुचित था और अस्वीकार्य था. फिर भी वह इतनी सशक्त थीं कि आगे उन्होंने आने वाले सभी हालात का सामना किया. चुनाव की घोषणा की और फिर उन्हें हार का सामना करना पड़ा.

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असफल वित्त मंत्री सक्रिय राष्‍ट्रपति

वर्ष 2008 में ग्लोबल इकोनॉमी स्लो डाउन (वैश्विक मंदी) आया. उस समय वित्त मंत्री पी चिदंबरम थे. हिंदुस्तान में सेंसेक्स टूट गया था, लेकिन आम भावना यह थी कि इस मंदी का हिंदुस्तान में कोई असर नहीं होने वाला है. उन दिनों टाटा वग़ैरह का प्रदर्शन बहुत अच्छा रहा था और एक धारणा यह बनी कि भारतीय अर्थव्यवस्था को विश्व की अर्थव्यवस्था की ज़रूरत नहीं है.

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फैसले न लेने की कीमत

मनमोहन सिंह की बुनियादी समस्या यह है कि वह खुद फैसले नहीं लेना चाहते, लेकिन प्रधानमंत्री हैं तो फैसले तो लेने ही थे. जब उनके पास फाइलें जाने लगीं तो उन्होंने सोचा कि वह क्यों फैसले लें, इसलिए उन्होंने मंत्रियों का समूह बनाना शुरू किया, जिसे जीओएम (मंत्री समूह) कहा गया. सरकार ने जितने जीओएम बनाए, उनमें दो तिहाई से ज़्यादा के अध्यक्ष उन्होंने प्रणब मुखर्जी को बनाया.

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बिगड़े रिश्‍ते, बिगड़ी अर्थव्‍यवस्‍था

अब प्रणब मुखर्जी के दूसरे मंत्रियों और प्रधानमंत्री से रिश्ते की बात करें. वित्त मंत्री माना जाता है कि आम तौर पर कैबिनेट में दूसरे नंबर की पोजीशन रखता है. वित्त मंत्रालय इन दिनों मुख्य मंत्रालय (की मिनिस्ट्री) हो गया है, क्योंकि हर पहलू का महत्वपूर्ण पहलू वित्त होता है, इसलिए बिना वित्त के क्लीयरेंस के कोई भी फैसला हो ही नहीं सकता.

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आम चुनाव 2014 की तैयारी

अमेरिका में राष्ट्रपति के लिए चुनाव अभियान उसी दिन से शुरू हो जाता है, जिस दिन नया राष्ट्रपति शपथ लेता है. भारत में राष्ट्रपति और लोकसभा के चुनाव के बीच दो साल का अंतराल है और अभी से प्रधानमंत्री पद के लिए अभियान शुरू हो गया है. राष्ट्रपति पद के किसी एक उम्मीदवार को समर्थन देने के मुद्दे पर एनडीए का राज़ी होना मुश्किल है. भाजपा 2014 के आम चुनाव की तैयारी में जुट गई है.

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एंटनी कमेटी की रिपोर्ट : उपेक्षा, गुटबाज़ी और बयानबाज़ी कांग्रेस को ले डूबी

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को मिली करारी हार की समीक्षा कर रही एंटनी कमेटी ने दिल्ली में अपनी रिपोर्ट कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को तमाम सिफारिशों और हार के कारणों के ख़ुलासे के साथ सौंप दी. कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की हार के लिए बड़े नेताओं के नाते-रिश्तेदारों को टिकट देने, ज़मीनी कार्यकर्ताओं की उपेक्षा, कांग्रेसियों की आपसी गुटबाज़ी और बड़बोलेपन को मुख्य वजह बताया.

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स्टिंग ऑपरेशन का षड्यंत्र

अन्ना कोर कमेटी की बैठकों के बारे में ऐसी भ्रांतियां फैलाई जाती रही हैं कि वे बहुत गोपनीय होती हैं. इस संदर्भ में हाल में शमूम काज़मी की घटना का पूरा ब्यौरा इस प्रकार हैः-

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टीम अन्ना में आंतरिक लोकतंत्र नहीं है

टीम अन्ना हमेशा कहती रही है कि वह जन लोकपाल की राजनीति कर रही है और राजनीतिक दल चुनावी राजनीति कर रहे हैं. अब जबकि राजनीति हो रही है, भले ही जन लोकपाल के लिए, तब इस बात की ज़रूरत बढ़ जाती है कि टीम अन्ना उस तर्ज पर राजनीति न करे

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कांग्रेस की चार सदस्यीय कमेटी की अग्नि परीक्षा

श्रीमती सोनिया गांधी अमेरिका में अपनी बीमारी के बाद स्वास्थ्य लाभ कर रही हैं. उन्होंने हिंदुस्तान में कांग्रेस पार्टी को चलाने के लिए चार सदस्यीय कमेटी बनाई. उनकी अनुपस्थिति में पार्टी का सारा काम यह कमेटी देखने वाली है और महत्वपूर्ण फैसले लेने वाली है. इस कमेटी में राहुल गांधी, ए के एंटनी, जनार्दन द्विवेदी और अहमद पटेल हैं.

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सुप्रीम कोर्ट के संकेत चिंता का विषय हैं

देश की संसद ठप है. कौन जांच करे, पार्लियामेंट की ज्वाइंट कमेटी या पब्लिक एकाउंट्‌स कमेटी, यह बहस है. दोनों ने नाक का सवाल बना लिया है, पर चिंता का विषय है कि क्यों संसद के बाहर न कोई राजनेता और न राजनैतिक दल, एक लाख छिहत्तर हज़ार करोड़ के भ्रष्टाचार तथा कॉमनवेल्थ खेलों में हुए सत्तर हज़ार करोड़ के ख़र्चों में हुई गड़बड़ी को मुख्य मुद्दा नहीं बना रहे हैं.

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भेदभाव और अयोग्यता के बीच फर्क़ है

भारत में मुसलमानों के लिए उनकी पहचान ही सबसे बड़ी समस्या है. इसके चलते वे बेवजह दुर्भावनाओं के शिकार होते हैं और तमाम तरह की मुश्किलें झेलने के लिए मजबूर होते हैं. सच्चर कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में इसकी चर्चा करते हुए स्पष्ट रूप से लिखा है कि पहचान की समस्या के चलते मुसलमानों को एक सामान्य नागरिक की तरह रहने में मुश्किलें आती हैं.

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भारतीय मुसलमान और आवास की समस्या

भारत में मुसलमान समुदाय के सामने समस्याओं की कोई कमी नहीं. मुसलमानों को अलग नज़रिए से देखना या उनकी धार्मिकता को राष्ट्रीय एवं सामाजिक पहचान से अलग करके देखना तो आम बात है. सबसे बड़ी मुश्किल तो यह है कि मुसलमानों को अपनी पसंदीदा जगहों पर रहने के लिए मकान तक नहीं मिलता.

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सच्चर कमेटी की रिपोर्ट और मुसलमान

इस्लाम हमेशा हमारे दिलों के क़रीब रहा है और भारत में इसका विकास और विस्तार लगातार जारी रहेगा. हमारी धार्मिक सोच इतनी विस्तृत है कि इसमें हर विचारधारा के लिए जगह है. सभी धार्मिक विचारधाराएं अपनी पहचान बनाए रखते हुए एक साथ रह सकती हैं. देश के मुसलमान राष्ट्रीय जीवनशैली, राजनीति, उत्पादन प्रक्रिया, व्यवसाय, सुरक्षा, शिक्षा, कला, संस्कृति और आत्माभिव्यक्ति में बराबर के साझीदार हैं.

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कोटा नहीं तो कैसे उठेंगे पिछड़े मुसलमान?

जैसा कि सरकार द्वारा नियुक्त की गई अनेक कमेटियां, जिनमें सच्चर कमेटी और रंगनाथ मिश्र आयोग सबसे प्रमुख हैं, पहले ही बता चुकी हैं कि देश की मुस्लिम जनसंख्या विकास के अधिकांश सामाजिक-आर्थिक मापदंडों पर सबसे निचले पायदान पर खड़ी है. मुस्लिम समुदाय के अंदर पिछड़ी जातियां, जो कुल जनसंख्या की क़रीब 80 प्रतिशत हैं, की हालत सबसे ज़्यादा ख़राब है.

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