कम होती बहस और प्रचार की परंपराएं

देश में मौजूदा राजनीति भले ही कई विसंगतियों की शिकार रही हो, लेकिन लोकसभा, विधानसभा, ग्राम पंचायतों और शहरी निकायों

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तीसरा मोर्चा संभावनाएं और चुनौतियां

लोकसभा में एफडीआई के मुद्दे पर दो दलों ने जो किया, वह भविष्य की संभावित राजनीति का महत्वपूर्ण संकेत माना जा सकता है. शायद पहली बार मुलायम सिंह और मायावती किसी मुद्दे पर एक सी समझ रखते हुए, एक तरह का एक्शन करते दिखाई दिए. यह मानना चाहिए कि अब यह कल्पना असंभव नहीं है कि चाहे उत्तर प्रदेश का चार साल के बाद होने वाला विधानसभा का चुनाव हो या फिर देश की लोकसभा का आने वाला चुनाव, ये दोनों साथ मिलकर भी चुनाव लड़ सकते हैं.

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राजनीति के नए सिद्धांत

भारत की राजनीति में नए सैद्धांतिक दर्शन हो रहे हैं. पता नहीं ये सैद्धांतिक दर्शन भविष्य में क्या गुल खिलाएंगे, पर इतना लगता है कि धुर राजनीतिक विरोधी भी एक साथ खड़े होने का रास्ता निकाल सकते हैं. लेकिन लोकसभा या राज्यसभा में क्या अब ऐसी ही बहसें होंगी, जैसी इस सत्र में देखने को मिली हैं. मानना चाहिए कि ऐसा ही होगा. ऐसा मानने का आधार है. दरअसल, अब इस बात की चिंता नहीं है कि हिंदुस्तान में आम जनता का हित भी महत्वपूर्ण है.

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आडवाणी जी बधाई के पात्र हैं

श्री लालकृष्ण आडवाणी ने अपने ब्लॉग पर एक कमेंट लिखा और उस कमेंट पर कांग्रेस एवं भाजपा में भूचाल आ गया. कांग्रेस पार्टी के एक मंत्री, जो भविष्य में महत्वपूर्ण कैबिनेट मंत्री बन सकते हैं, ने कहा कि भाजपा ने अपनी हार मान ली है. मंत्री महोदय यह कहते हुए भूल गए कि उन्होंने अपनी बुद्धिमानी से लालकृष्ण आडवाणी जी के आकलन को वैधता प्रदान कर दी.

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तमिलनाडुः भ्रष्टाचार पर जनता का कहर बरपा

तमिलनाडु में जनता ने करुणानिधि और कांग्रेस गठजोड़ को एक सिरे से नकार दिया है. डीएमके की यह 1991 के बाद अब तक की सबसे बुरी हार है, जब राजीव गांधी की हत्या हुई थी. यह डीएमके के 1967 से अब तक के राजनीतिक इतिहास का दूसरा सबसे बड़ा झटका है.

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