बच्चों के लिए एक अच्छी किताब

बचपन, उम्र का सबसे प्यारा दौर होता है. यह अलग बात है कि जब हम छोटे होते हैं तो ब़डा होना चाहते हैं, क्योंकि कई बार स्कूल, प़ढाई और रोकटोक से परेशान हो जाते हैं. हम कहते हैं कि अगर ब़डे होते तो हम पर किसी तरह की कोई पाबंदी नहीं होती, न स्कूल ड्रैस पहननी प़डती और न ही रोज़ सुबह जल्दी उठकर स्कूल जाना प़डता. मगर जब हम ब़डे होते हैं, तो अहसास होता है कि वाक़ई बचपन कितना प्यारा होता है.

Read more

समकालीन गीतिकाव्य पर बेहतरीन शोध ग्रंथ

अनंग प्रकाशन द्वारा प्रकाशित समकालीन गीतिकाव्य : संवेदना और शिल्प में लेखक डॉ. रामस्नेही लाल शर्मा यायावर ने हिंदी काव्य में 70 के दशक के बाद हुए संवेदनात्मक और शैल्पिक परिवर्तनों की आहट को पहचानने की कोशिश की है. नवगीतकारों को हमेशा यह शिकायत रही है कि उन्हें उतने समर्थ आलोचक नहीं मिले, जितने कविता को मिले हैं. दरअसल, समकालीन आद्यावधि गीत पर काम करने का खतरा तो बहुत कम लोग उठाना चाहते हैं.

Read more

सरल शब्दों में जीवन की अभिव्यक्ति

हाल में आरोही प्रकाशन ने रेणु हुसैन की कविताओं के दो संग्रह प्रकाशित किए हैं. पहला कविता संग्रह है पानी-प्यार और दूसरे कविता संग्रह का नाम है जैसे. अंग्रेज़ी की वरिष्ठ अध्यापिका रेणु हुसैन स्कूल के व़क्त से ही कविताएं लिख रही हैं.

Read more

रिश्तों की गर्माहट का संग्रह

चौथी दुनिया में लगभग तीन साल से ज़्यादा समय से लिख रहे अपने स्तंभ में कविता और कविता संग्रह पर बहुत कम लिखा. साहित्य से जुड़े कई लोगों ने शिकायती लहज़े में इस बात के लिए मुझे उलाहना भी दिया. कइयों ने कविता के प्रति मेरी समझ पर भी सवाल खड़े किए.

Read more

करूं न याद, मगर किस तरह भुलाऊं उसे

अहमद फराज़ आधुनिक दौर के उम्दा शायरों में गिने जाते हैं. उनका जन्म 14 जनवरी, 1931 को पाकिस्तान के उत्तर-पश्चिम सीमा प्रांत के कोहाट में हुआ था. उनका असली नाम सैयद अहमद शाह था. उन्होंने पेशावर विश्वविद्यालय से उर्दू और फ़ारसी में एमए किया. इसके बाद यहीं प्राध्यापक के रूप में उनकी नियुक्ति हो गई थी. उन्हें बचपन से ही शायरी का शौक़ था.

Read more

मूल्यांकन में आलस क्यों

कौन जानता था कि सिमरिया घाट के बालू की रेत पर खेलने वाला बालक एक दिन अपनी तर्जनी उठाकर कह सकेगा- लोहे के पेड़ हरे होंगे तू गान प्रेम का गाता चल, नम होगी यह मिट्टी ज़रूर तू आंसू के कण बरसाता चल. यह वही बालक था, जो बाद में राष्ट्रकवि बना और जिनका नाम था रामधारी सिंह दिनकर. रामधारी सिंह दिनकर राष्ट्रीय चेतना के कवि थे.

Read more

जहां चाह, वहां राह

एक अच्छी कोशिश हमेशा प्रशंसनीय होती है, लेकिन जब ऐसी कोई कोशिश नए और संसाधनों का अभाव झेलने वाले लोग करते हैं तो वे दो-चार अच्छे शब्दों और शाबाशी के हक़दार ख़ुद-बख़ुद हो जाते हैं. त्रैमासिक साहित्यिक पत्रिका समसामयिक सृजन इसकी मिसाल है.

Read more

साहित्य जगत में तकनीकी क्रांति

वर्तमान समय तकनीक का युग हो गया है. इससे कोई भी क्षेत्र अछूता नहीं रह गया है. भूमंडलीकरण की प्रक्रिया में दुनिया बहुत तेज़ी से सिकुड़ती और नज़दीक आती जा रही है. इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों में इंटरनेट एक ऐसा माध्यम हैं, जहां कथा साहित्य बहुतायत में उपलब्ध हो सकता है. हर क्षेत्र में तकनीक का इस्तेमाल किया जा रहा है. यही हमें साहित्य में भी देखने को मिल रहा है.

Read more

आम आदमी के दुःख-दर्द की किताब

कोई माने या न माने, लेकिन सच यही है कि कविता की कोई शास्त्रीय परिभाषा नहीं होती. वह हर पंक्ति कविता है, जो तरीक़े से आम आदमी के दु:ख-दर्द की बात करती है, घर-आंगन की बात करती है, समाज के काले पक्ष पर रोशनी डालती है और देश-दुनिया के प्रति अपनी चिंता को ज़ाहिर करती है.

Read more

लोक से दूर होती कविता

एक दिन दफ्तर के साथियों से कविता पर बात शुरू हुई. मेरे मन में सवाल बार-बार कौंध रहा था कि अब कोई दिनकर, बच्चन या श्याम नारायण पांडे जैसी कविताएं क्यों नहीं लिखता. आज जिस तरह की कविताएं लिखी जा रही हैं, वे स़िर्फ कुछ ख़ास लोगों की समझ में आती हैं और एक सीमित दायरे में ही उन्हें प्रचार-प्रसार और सम्मान मिलता है.

Read more

डॉ. वैद्यनाथ शर्माः पर्दे के पीछे हैं नंगे, बाहर रूप सजाते हैं

संघर्ष संकुल जीवन के गलियारे से गुज़र कर लक्ष्य के विराट प्रांगण तक एक आम आदमी किस तरह पहुंचता है, यही साबित किया डॉ. वैद्यनाथ शर्मा ने. बहुआयामी रचनाधर्मिता और उदात्त व्यक्तित्व के धनी डॉ. शर्मा उच्च कोटि के शिक्षाविद्, स्वस्थ राजनीतिक चेतना संपन्न बुद्धिजीवी, दूरदर्शी संगठनकर्ता, संवेदनशील कवि, सजग साहित्य समीक्षक, समालोचक, यथार्थवादी कहानीकार, भाव प्रवण विचारक, व्याकरणाचार्य, कुशल शोध प्रज्ञ एवं सक्षम शोध निदेशक हैं.

Read more

नारायण सुर्वे: आम जनता का कवि

ऐसा गामी ब्रह्म, माझे विद्यापीठ एवं जाठीरबामा जैसे कविता संकलनों के रचयिता एवं प्रसिद्ध मराठी विद्वान पद्मश्री नारायण सुर्वे नहीं रहे. पिछले दिनों उनका निधन हो गया, वह 83 साल के थे. नारायण अनाथ थे, बचपन में उनका पालन पोषण सुर्वे नामक मज़दूर ने किया था.

Read more

कवि, कविता और समाज

कहते हैं कि जहां न पहुंचे रवि, वहां पहुंच कवि. सच भी है, कवि अपनी कल्पना के ज़रिए किसी विषय के उस बिंदु तक जा पहुंचता है, जिस पर आमजन की नज़र शायद जाती हो. कैसे संभव हो पाता है यह सब? कवि अपनी कविता और ख़ुद को समाज के साथ कैसे जोड़ता है? विभिन्न मौक़ों पर उसकी मनोस्थिति क्या होती है?

Read more