आख़िर इस देश को क्या चाहिए

राष्ट्रगीत में भला कौन वह/भारत-भाग्य-विधाता है/फटा सुथन्ना पहने जिसका/गुन हरचरना गाता है/मखमल टमटम बल्लम तुरही/पगड़ी छत्र चंवर के साथ/तोप छुड़ाकर,

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शादी से काम पर फर्क नहीं पड़ा: विद्या बालन

विद्या ने पिछले साल दिसंबर में डिजनी यूटीवी के महाप्रबंधक सिद्धार्थ रॉय कपूर से विवाह किया. वह कहती हैं कि 

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स्त्री विमर्श का विध्वंसकारी रूप!

पिछले कई महीनों से सोशल नेटवर्किंग साइट फेसबुक पर साहित्य और पत्रकारिता से जुड़ी कुछ बेहद अहम लेखिकाएं स्त्री विमर्श

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पूरे चांद की रात…

भारतीय साहित्य के प्रमुख स्तंभ यानी उर्दू के मशहूर अ़फसानानिग़ार कृष्ण चंदर का जन्म 23 नवंबर, 1914 को पाकिस्तान के गुजरांवाला ज़िले के वज़ीराबाद में हुआ. उनका बचपन जम्मू कश्मीर के पुंछ इलाक़े में बीता. उन्होंने तक़रीबन 20 उपन्यास लिखे और उनकी कहानियों के 30 संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं. उनके प्रमुख उपन्यासों में एक गधे की आत्मकथा, एक वायलिन समुंदर के किनारे, एक गधा नेफ़ा में, तूफ़ान की कलियां, कॉर्निवाल, एक गधे की वापसी, ग़द्दार, सपनों का क़ैदी, स़फेद फूल, प्यास, यादों के चिनार, मिट्टी के सनम, रेत का महल, काग़ज़ की नाव, चांदी का घाव दिल, दौलत और दुनिया, प्यासी धरती प्यासे लोग, पराजय, जामुन का पेड़ और कहानियों में पूरे चांद की रात और पेशावर एक्सप्रेस शामिल है. 1932 में उनकी पहली उर्दू कहानी साधु प्रकाशित हुई. इसके बाद उन्होंने पीछे म़ुडकर नहीं देखा.

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पुरानी तकनीक, कमज़ोर कहानी

समकालीन हिंदी कहानी के परिदृष्य पर नज़र डालें तो युवा कथाकारों ने अपनी कहानियों में शिल्प के अलावा उसके कथ्य में भी चौंकाने वाले प्रयोग किए हैं. आज की नई पीढ़ी के कहानीकारों के पास अनुभव का एक नया संसार है जिसको वे अपनी रचनाओं में व्यक्त कर रहे हैं. इस व़क्त के जो नए कथाकार हैं, उनके अनुभव में आर्थिक उदारीकरण के बाद देश में जो बदलाव आया है उसको सा़फ तौर पर परिलक्षित किया जा सकता है.

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मेक अप आर्टिस्ट : रिक बेकर

क्या कभी किसी ने सोचा था कि बचपन में अपने घर की रसोई के सामान से राक्षस का मेकअप करने वाले रिक बेकर किंग कांग (1976), एन अमेरिकन वेरेवोल्फ इन लंदन, स्टार वार्स, हेलबॉय, द वोल्फ मैन जैसी बड़ी-बड़ी फिल्मों में बतौर मेकअप आर्टिस्ट काम करेंगे.

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समाज को आईना दिखातीं कहानियां

पेशे से राजनीति शास्त्र के प्राध्यापक और साहित्य को समर्पित डॉ. लालजी प्रसाद सिंह का कथा संग्रह मशहूर कहानियां उनकी क़रीब तीन दर्जन कृतियों, जिनमें कुछ कविता संग्रह, उपन्यास एवं अधिकांश कहानी संग्रह हैं, की ही चुनी हुई आठ कहानियों का संग्रह है.

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औरत की बोली

पिछले कई सालों से हिंदी में साहित्येतर विधाओं की किताबों के प्रकाशन में का़फी तेज़ी आई है. प्रकाशकों के अलावा लेखकों ने भी इस ओर गंभीरता से ध्यान दिया है. कई लेखकों ने कहानी, कविता, उपन्यास से इतर समाज के उन विषयों को छुआ है, परखा है, जो अब तक हिंदी समाज की नज़रों से ओझल थे.

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साहित्य जगत में तकनीकी क्रांति

वर्तमान समय तकनीक का युग हो गया है. इससे कोई भी क्षेत्र अछूता नहीं रह गया है. भूमंडलीकरण की प्रक्रिया में दुनिया बहुत तेज़ी से सिकुड़ती और नज़दीक आती जा रही है. इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों में इंटरनेट एक ऐसा माध्यम हैं, जहां कथा साहित्य बहुतायत में उपलब्ध हो सकता है. हर क्षेत्र में तकनीक का इस्तेमाल किया जा रहा है. यही हमें साहित्य में भी देखने को मिल रहा है.

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पांच दशक से समीक्षा कर्म में लगे हैं मधुरेश

प्रेमचंद की मशहूर कहानी पंच परमेश्वर में अलगू चौधरी और खाला के बीच एक संवाद है- क्या बिगाड़ के डर से ईमान की बात न कहोगे. यह बात उस प्रसंग में कही गई है जब खाला, जुम्मन से परेशान होकर पंचायत करवानी चाहती है.

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निम्नवर्गीय जीवन संग्राम की कहानियां

मेरे मौला कथाकार डॉ. लालजी प्रसाद सिंह का 20वां कहानी संग्रह है. वैसे वह अब तक हिंदी की विभिन्न विधाओं में 35 किताबें लिख चुके हैं. इस पुस्तक में मेरे मौला, मौत का गीत, मर्सी किलिंग, जगिया और भूचाल आदि पांच कहानियां हैं.

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साहित्यिक डॉन का कारनामा

साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं को खरीदने के लिए अक्सर मैं दिल्ली के मयूर विहार इलाक़े में जाता हूं, जहां लोक शॉपिंग सेंटर के पास फुटपाथ पर तीन दुकानें लगती हैं. बिपिन के बुक स्टॉल पर मैं तक़रीबन डे़ढ दशक से जा रहा हूं. इस बीच वहां पत्र-पत्रिकाओं की तीन दुकानें सजने लगीं. जैसे ही मैं बिपिन की दुकान पर पहुंचता हूं, वहां मौजूद शख्स मुझे या तो हंस या कथादेश या फिर पाखी पकड़ा देगा.

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हिट शो के लिए तरसते शो मैन- 4 : संजय लीला भंसाली : कैमरे में कमाल, कहानी से कंगाल

संजय लीला भंसाली. आज के दौर के भारत के सबसे महंगे निर्देशक. सिनेमा में लाइट और कलर की जैसी समझ संजय लीला भंसाली को है, वैसी समझ आज के दौर के किसी दूसरे फिल्मकार को नहीं है. संजय लीला भंसाली अपनी फिल्मों में कैमरे के कमाल से विमल रॉय जैसे फिल्मकार की याद दिलाते हैं. भंसाली की हाल ही में रिलीज़ हुई फिल्म गुज़ारिश कामयाबी हासिल नहीं कर सकी.

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दिलचस्प अनुभवों की शाम

बात अस्सी के दशक के अंत और नब्बे के दशक के शुरुआती वर्षों की है. पुस्तकों को पढ़ते हुए बहुधा मन में विचार आता था कि उस पर कुछ लिखूं, लेकिन संकोचवश कुछ लिख नहीं पाता था. ज़्यादा पता भी नहीं था कि क्या और कैसे लिखूं और कहां भेजूं. मैं अपने इस स्तंभ में पहले भी चर्चा कर चुका हूं कि किताबों को पढ़ने के बाद चाचा भारत भारद्वाज को लंबे-लंबे पत्र लिखा करता था.

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तोता मैना की कहानी…

तोता-मैना की कहानी तो बचपन में सभी ने सुनी होगी, लेकिन यह नहीं सुना होगा कि तोता और मैना दोनों हमेशा साथ में काम करना पसंद करते हैं. पेरिस में हुए एक शोध के मुताबिक़, कुछ पक्षी अकेले काम करना पसंद करते हैं और कुछ समूह में. शोधकर्ताओं ने पक्षियों को कई काम दिए, ताकि उन्हें देखकर यह समझा जा सके कि पक्षियों में एक-दूसरे के साथ सहयोग करने की समझ है या नहीं.

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फिल्म प्रिव्यू : तीन थे भाई

रंग दे बसंती और दिल्ली 6 जैसी फिल्मो का निर्देशन और को-प्रोड्‌यूस करने के बाद राकेश ओमप्रकाश मेहरा मृगदीप सिंह के तीन थे भाई, को प्रोड्‌यूस कर रहे है. इस फिल्म की कहानी तीन भाइयो की है, जो एक-दूसरे से अलग रहते है

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मां-बेटे के रिश्ते की नई इबारत

चंद साल पहले की बात है, आस्ट्रिया से एक ऐसी ख़बर आई थी, जिसने पूरे विश्व को झकझोर कर रख दिया था. एक ऐसी क्राइम स्टोरी, जो दुनिया भर के अख़बारों में कई दिनों तक सुर्ख़ियां बनी. आस्ट्रिया निवासी एक पापी पिता जोश फ्रिट्ज ने अपनी बेटी को चौबीस साल तक बंधक बनाकर रखा और इस दौरान उसके साथ बलात्कार करता रहा.

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बाज़ार के फंदे में हिंदी कहानीकार

अभी चंद दिनों पहले की बात है, मेरी पत्नी चित्रा मुदगल की किताब-गेंद और अन्य कहानियां ख़रीद लाई. इस संग्रह के ऊपर दो मासूम बच्चों की तस्वीर छपी है और नीचे लिखा है, बच्चों पर केंद्रित कहानियों का अनूठा संकलन. मुझे भी लगा कि पेंग्विन से चित्रा जी की कहानियों का नया संग्रह आया है, लेकिन जब मैंने उसे उलटा-पुलटा तो लगा कि उसमें तो उनकी पुरानी कहानियां छपी हैं.

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पत्नी और भेड़िया के बीच फंसी कहानी

आत्मकथा लिखने के लिए दरअसल साहस की आवश्यकता होती है और खुद को, खुद के संबंधों को सच की कसौटी पर कसना होता है, लेकिन आमतौर पर लेखक यह साहस दिखा नहीं पाते हैं और खुद को महान बताने के लिए आत्मकथा लिखते हुए भटक जाते हैं. हिंदी साहित्य में पिछले दशक में कई दलित लेखकों की आत्मकथाएं प्रकाशित हुईं. शुरुआत में इन आत्मकथाओं ने हिंदी जगत को सकते में डाल दिया, लेकिन बाद में दलित लेखकों की आत्मकथा एक खास किस्म के फॉर्मूले में बंध गई.

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