हमने देखा कि पंचायती राज की वर्तमान योजना के अंतर्गत आज जो पंचायतें हैं, वे गांधी जी की कल्पना की पंचायतों से पूरी तरह से भिन्न हैं. आज की पंचायतें तो प्रातिनिधिक व्यवस्था का ही एक अंग हैं. उनमें जनता द्वारा प्रत्यक्ष स्व-शासन संभव नहीं है. वास्तव में पंचायती राज की आज की व्यवस्था आम [...]
Tags: आंदोलन, क़ानून, कारखाने, केंद्र, गांधी जी, ग्र बहुमत, ग्रामसभा, ग्रामसभा कार्यसमिति, चुनाव के नियम, जनसंख्या, ज़िला प्रखंड, निर्वाचन आयोग, पंचायत, पानी, बिजली, राज्य, रेल, वर्तमान योजना, संविधान, सड़क, सत्ता, सभापति चुनाव, सरकार Posted in समाज, स्टोरी-6 by Author: ठाकुर दास बंग | No Comments » | Read More... |
जस्टिस डिलेड, जस्टिस डिनाइड, यानी देर से मिले न्याय का कोई अर्थ नहीं रह जाता. प्रस्तावित सिटीजन चार्टर बिल के प्रावधान भी कुछ ऐसे ही हैं. यहां सरकारी सेवा पाने के अधिकार के लिए एक आम आदमी को एक नहीं, दो नहीं, बल्कि तीन जगहों पर अपील करनी पड़ेगी. और अपीलों की हालत क्या होती [...]
Tags: आम आदमी, आरटीआई क़ानून, औरंगाबाद, क़ानून, केंद्र सरकार, ज़िला अदालतों, ज़िला निबंधक, जिलाधिकारी, देश, नागरिक माल, न्याय, बिहार, मकान, लखनऊ, शहरी, शिक्षित, सरकारी सूचना, सलाहुद्दीन, सुप्रीम कोर्ट Posted in Crousel1, कवर स्टोरी, पहला पन्ना, राजनीति by Author: शशि शेखर | No Comments » | Read More... |
गांधी जी का सपना था कि देश का विकास पंचायत राज संस्था के ज़रिए हो. पंचायती राज को इतना मज़बूत बनाया जाए कि लोग ख़ुद अपना विकास कर सकें. दरअसल, इसी के तहत आगे चलकर स्थानीय शासन को ब़ढावा देने के नाम पर त्रिस्तरीय पंचायती व्यवस्था लागू भी की गई. ज़िला स्तर पर ज़िला परिषद, [...]
Tags: अधिकार, अधिकारी, आवेदन, इंदिरा आवास योजना, क़ानून, कार्य, केंद्र, गांधी जी, ग्राम सभा, घोटाले, देश, नागरिक, पंचायत, भ्रष्टाचार, राज्य सरकार, लोग, विकास, व्यवस्था, सूचना, हिसाब Posted in समाज by Author: चौथी दुनिया ब्यूरो | No Comments » | Read More... |
अपने देश में किसी भी राज्य के पंचायत क़ानून ने गांव के सब मतदाताओं को, यानी उनकी मिली हुई ग्रामसभा को कोई अधिकार नहीं दिए हैं, वह हमने देखा. अत: लोग ग्रामसभाओं की बैठक में जाते नहीं. जब ग्रामसभा को स्व-शासन का कोई अधिकार नहीं है, तो लोग इन बैठकों में क्यों उपस्थित रहें? ग्रामसभा [...]
Tags: क़ानून, गांव, गांव के शासन, ग्रामसभा, चुनाव, जन-द्रोही, जनतंत्र, पंचायत, भारत सरकार, भ्रष्टाचार, मतदाताओं, राजनीतिक, राज्य, व्यवस्थाएं, शासन, श्री आर के पाटिल, स्वरूप Posted in राज्य, समाज by Author: ठाकुर दास बंग | No Comments » | Read More... |
बीती 20-21 फरवरी को ट्रेड यूनियनों की दो दिवसीय देशव्यापी हड़ताल न स़िर्फ पूरी तरह कामयाब रही, बल्कि इस हड़ताल ने यूपीए सरकार की मज़दूर विरोधी नीतियों को भी जगज़ाहिर कर दिया. सरकार टाटा, बिड़ला, अंबानी, गोयनका, डालमिया और सिंघानिया जैसे चंद पूंजीपतियों को फ़ायदा दिलाने के लिए दिन-रात परेशान रहती है, लेकिन आश्चर्य की [...]
Tags: इंश्योरेंस दफ्तर, क़ानून, कामगारों, किसानों, केंद्र सरकार, ट्रेड यूनियनों, दूरसंचार कार्यालय, न्यूनतम वेतन, पोस्ट ऑफिस, प्रधानमंत्री, मज़दूर विरोधी, महंगाई, यूपीए सरकार, वित्त मंत्री, श्रम मंत्री, सरकार, सरकारी बैंक, सेना की कैंटीन, हड़ताल Posted in आंदोलन, स्टोरी-6 by Author: अभिषेक रंजन सिंह | No Comments » | Read More... |
किसानों और आदिवासियों को उनके जल, जंगल एवं ज़मीन से बेदख़ल करने के लिए राजनेता और पूंजीपति वर्ग जिस तरह क़ानून और नियमों की परवाह नहीं कर रहे हैं, उसे देखकर यही कहा जा सकता है कि किसानों, मज़दूरों एवं आदिवासियों को अपनी लड़ाई पहले से और ज़्यादा संगठित होकर लड़ने की ज़रूरत है. सरकारी [...]
Tags: अभिजीत ग्रुप, आदिवासी, आर-पार की लड़ाई, क़ानून, किसान, चांदन डैम, चांदन नदी, जल और ज़मीन, नीतीश सरकार, पावर प्लांट, बिहार, राजनेता और पूंजीपति Posted in Crousel2, आंदोलन, राजनीति, राज्य, स्टोरी-6 by Author: अभिषेक रंजन सिंह | No Comments » | Read More... |
तमाम सर्वे बताते हैं कि आज के युवा सेना में नौकरी करने की बजाय अन्य कोई पेशा अपनाना चाहते हैं. ऐसा नहीं है कि सेना की नौकरी के आकर्षण में कोई कमी आई हो या फिर वहां मिलने वाली सुविधाओं में कोई कटौती की गई हो, बावजूद इसके विभिन्न वजहों से सेना में नए अधिकारियों की कमी दिख रही है. उन्हीं वजहों में से एक है पेंशन का मामला. सेना में पेंशन विसंगतियों को लेकर संभवत: पहली बार कोई रिटायर्ड नौसेना अधिकारी सार्वजनिक रूप से सामने आया है. आखिर क्या है पूरी कहानी, पढ़िए चौथी दुनिया की इस एक्सक्लूसिव रिपोर्ट में….
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भूमि अधिग्रहण एवं पुनर्स्थापना एवं पुनर्वास विधेयक संसद के मॉनसून सत्र में भी पेश नहीं हो सका. यह विधेयक कब पेश होगा और देश के करोड़ों किसानों की परेशानियां कब खत्म होंगी, यह कोई नहीं बता सकता. मौजूदा समय में देश के अंदर जबरन भूमि अधिग्रहण के विरोध में छोटे-बड़े सैकड़ों आंदोलन चल रहे हैं. अब नंदीग्राम, सिंगुर, भट्टा पारसौल, नगड़ी, जैतापुर और कुडनकुलम जैसे हालात कई राज्यों में पैदा हो गए हैं.
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नए भूमि अधिग्रहण क़ानून को लेकर देश भर की निगाहें संसद और केंद्र सरकार पर टिकी हुई हैं. जबरन भूमि अधिग्रहण के विरोध में आंदोलित कई राज्यों में सैकड़ों ग़रीब किसानों एवं आदिवासियों को पुलिस की गोलियों का शिकार होना पड़ा. उनका दोष स़िर्फ इतना था कि वे किसी भी क़ीमत पर अपनी पुश्तैनी ज़मीन देने के लिए तैयार नहीं थे. ब्रिटिश शासन के दौरान अंग्रेजों ने भूमि अधिग्रहण अधिनियम 1894 बनाया था.
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सूचना का अधिकार क़ानून को लागू हुए क़रीब छह साल होने को हैं. इन छह सालों में इस क़ानून ने आम आदमी को पिछले साठ साल की मजबूरी से मुक्ति दिलाने का काम किया. इस क़ानून ने आम आदमी को सत्ता में बैठे ताक़तवर लोगों से सवाल पूछने की ताक़त दी. व्यवस्था में लगे दशकों पुराने ज़ंग को छुड़ाने में मदद की.
Tags: Delhi, Information, RTI, law, rights, अधिकार, आरटीआई, क़ानून, दिल्ली, सूचना Posted in कानून और व्यवस्था, जरुर पढें, विधि-न्याय, समाज by Author: चौथी दुनिया ब्यूरो | No Comments » | Read More... |
सोलह मार्च को वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी बजट पेश करेंगे. पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव के बाद पेश किए जा रहे इस बजट की रूपरेखा पर हाल में वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी के घर पर एक मीटिंग हुई. दो घंटे के बाद मीडिया को स़िर्फ इतना बताया गया कि जनता के हितों को ध्यान में रखकर बजट तैयार किया जाएगा, लेकिन इस मीटिंग के बाद जितने भी नेता मुखर्जी के घर से बाहर निकल रहे थे, उनके चेहरे से पता चल रहा था कि आगे क्या होने वाला है.
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फिर कल-काऱखानों के चल निकलने के कारण स्त्री कामगारों की संख्या बढ़ी, लेकिन बाज़ार में इनकी मज़दूरी का भाव पुरुषों की अपेक्षा निम्न स्तर का ही रहा. मालिकों की दलील यह थी कि यदि हमें मज़दूरों की ज़रूरत ही हो तो हम पुरुषों को ही क्यों न रखें और फिर सस्ती दर में औरतें काम करने के लिए राज़ी भी तो हैं. उनके इस उत्तर में सुदृढ़ तर्क का अभाव भले हो, इसने स्त्रियों को मज़दूरी की आवश्यकता के कारण सस्ती दर पर काम करने के लिए बाध्य कर दिया.
Tags: Women, capitalism, labor, law, social, torture, अत्याचार, क़ानून, पूंजीवादी, मज़दूरी, सामाजिक, स्त्री Posted in आर्थिक, जरुर पढें, समाज by Author: महावीर प्रसाद आर मोरारका | No Comments » | Read More... |
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जनता एक ज़िम्मेदार संसद का निर्माण करे |
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