नोटबंदी के बाद मोदी सरकार उठाएगी बड़ा कदम, 5 लाख से ज्यादा लोग रडार पर!

नई दिल्ली। इनकम टैक्स ने ब्लैक मनी का पता लगाने के लिए 5.56 लाख  ऐसे लोगों की पहचान की है

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देशभक्तों और ग़द्दारों की पहचान कीजिए

जब बाबा रामदेव के अच्छे दिन थे, उस समय हिंदुस्तानी मीडिया के कर्णधार उनसे मिलने के लिए लाइन लगाए रहते थे. आज जब बाबा रामदेव परेशानी में हैं तो मीडिया के लोग उन्हें फोन नहीं करते. पहले उन्हें बुलाने या उनके साथ अपना चेहरा दिखाने के लिए एक होड़ मची रहती थी. आज बाबा रामदेव के साथ चेहरा दिखाने से वही सारे लोग दूर भाग रहे हैं. यह हमारे मीडिया का दोहरा चरित्र है.

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अन्‍ना की हार या जीत

अन्ना हजारे ने जैसे ही अनशन समाप्त करने की घोषणा की, वैसे ही लगा कि बहुत सारे लोगों की एक अतृप्त इच्छा पूरी नहीं हुई. इसकी वजह से मीडिया के एक बहुत बड़े हिस्से और राजनीतिक दलों में एक भूचाल सा आ गया. मीडिया में कहा जाने लगा, एक आंदोलन की मौत. सोलह महीने का आंदोलन, जो राजनीति में बदल गया. हम क्रांति चाहते थे, राजनीति नहीं जैसी बातें देश के सामने मज़बूती के साथ लाई जाने लगीं.

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फैसले न लेने की कीमत

मनमोहन सिंह की बुनियादी समस्या यह है कि वह खुद फैसले नहीं लेना चाहते, लेकिन प्रधानमंत्री हैं तो फैसले तो लेने ही थे. जब उनके पास फाइलें जाने लगीं तो उन्होंने सोचा कि वह क्यों फैसले लें, इसलिए उन्होंने मंत्रियों का समूह बनाना शुरू किया, जिसे जीओएम (मंत्री समूह) कहा गया. सरकार ने जितने जीओएम बनाए, उनमें दो तिहाई से ज़्यादा के अध्यक्ष उन्होंने प्रणब मुखर्जी को बनाया.

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काला धन पर बहसः नीति और नीयत दोनों में खोट है

काला धन. एक ऐसा शब्द जिसके सहारे विपक्ष जनता को सुनहरे भविष्य और खुद के लिए सत्ता का सपना देख रहा है. लालकृष्ण आडवाणी ने इसी मुद्दे पर रथ यात्रा कर डाली. संसद में इस मुद्दे पर बहस कराने के लिए बीजेपी ने ए़डी-चोटी का ज़ोर लगा दिया. बहस भी हुई, लेकिन नतीजा स़िफर.

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नव उदारवाद की प्रयोगशाला में भ्रष्‍टाचार

एक दशक पहले यह खतरा पहचान में आने लगा था कि अगर नव उदारवादी नीतियों के मुक़ाबले में खड़े होने वाले जनांदोलनों का राजनीतिकरण और समन्वयीकरण नहीं हुआ तो नव उदारवाद के दलाल, चाहे वे नेता हों, नौकरशाह हों, बुद्धिजीवी हों, एनजीओबाज हों, धर्मगुरु हों, कलाकार हों या खिलाड़ी, विरोध के सारे प्रयास नाकाम कर देंगे. वही हो रहा है.

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भाजपा में बहुत दम है…

भारतीय जनता पार्टी अब पार्टी विथ डिफरेंस के बजाय पार्टी इन डिलेमा बन गई है. दूसरे दलों से अलग होने का दंभ भरने वाली पार्टी अब असमंजस और विरोधाभास से ग्रसित हो चुकी है. वह भीषण गुटबाज़ी की चपेट में है, जिसकी वजह से पार्टी कार्यकर्ता आम जनता से दूर होते जा रहे हैं और पार्टी के नेताओं एवं कार्यकर्ताओं में दूरियां बढ़ गई हैं. पार्टी के अंतर्द्वंद्व का हाल यह है कि नेता प्रतिपक्ष का कोई बयान आता है तो पार्टी के दूसरे नेता नाराज़ हो जाते हैं.

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इनके लिए अनशन कौन करेगा

यह ज़रूरी नहीं है कि सभी अनशन प्रभावकारी साबित हों या वे नैतिक दृष्टि से सही माने जाएं. जब ब्रिटिशों ने अछूतों (जैसा कि उन्हें उस व़क्त कहा जाता था) के लिए अलग निर्वाचक मंडल की घोषणा की, तब गांधी जी ने अनशन किया था.

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भ्रष्‍टाचार और काले धन के खिलाफ आंदोलन में बाबा रामदेव चूक गए

राजनीति भी अजीबोग़रीब खेल है, इसलिए इसे गेम ऑफ इंपोसिबल कहा गया है. यह ऐसा खेल है, जिसमें बड़े-बड़े खिलाड़ी को धराशायी होने में व़क्त नहीं लगता है, छोटे खिलाड़ी बाज़ी मार ले जाते हैं और कभी-कभी सबसे अनुभवी खिलाड़ी भी किसी नौसिखिए की तरह खेल जाता है. यह किसने सोचा था कि बाबा रामदेव के आंदोलन का ऐसा अंत होगा.

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आरोप लगाने से ज़्यादा कठिन है शासन करना

वर्ष 1970 की बात है. एडवर्ड हीथ प्रधानमंत्री पद की दौड़ में हैरल्ड विल्सन के ख़िला़फ खड़े थे और लोगों से यह वादा कर रहे थे कि मैं महंगाई कम कर दूंगा. जब वह जीत गए, प्रधानमंत्री बन गए, तब उन्हें पता चला कि विपक्ष में रहकर आरोप लगाने से ज़्यादा कठिन सत्ता में आने के बाद काम करना होता है, अपने वादों को पूरा करना होता है.

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रामदेव जी, आपका सत्याग्रह कैसा होगा

देश एक कन्फ्रंटेशन की ओर बढ़ रहा है. कन्फ्रंटेशन देश के हित में है या नहीं है, अभी यह नहीं कह सकते हैं, पर कन्फ्रंटेशन क्यों और किस तरह का होने वाला है, इसे थोड़ा समझने की कोशिश करनी चाहिए. भ्रष्टाचार इन दिनों देश में केंद्रीय विषय बना हुआ है और अन्ना हजारे, जिनकी वजह से देश में एक जागृति आई, देश भर में घूमने की योजना बना रहे हैं.

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दिल्ली का बाबुः बाबुओं के बाबु

पिछले दिनों एक पुराने मित्र के पी सिंह का दिल्ली में देहांत हो गया, जिससे बहुत से वरिष्ठ बाबुओं को आघात पहुंचा. वैसे तो के पी से पहले उनके बहुत से मित्रों का देहावसान हो चुका है, लेकिन उनकी याद में आयोजित कार्यक्रम में शीर्षस्थ बाबू बड़ी संख्या में मौजूद थे.

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काले धन का सौदागर हसन अली

एक चोर प्रवृत्ति का ठग व्यक्ति हुआ करता था नटवर लाल. उसने तीन बार ताजमहल को, दो बार लालकिले को और एक बार तो राष्ट्रपति भवन को भी भोले-भाले विदेशी पर्यटकों को बेच डाला था. इस नटवर लाल का असली नाम मिथिलेश कुमार श्रीवास्तव था. नटवर लाल ने अपनी चालाकी से सैकड़ों लोगों के करोड़ों रुपये मार लिए.

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काले धन पर टिका भारतीय प्रजातंत्र

पीवी नरसिम्हाराव के समय की एक बात मुझे हमेशा याद आती है. मैंने दो पत्रकारों को बात करते सुना था. एक ने दूसरे से कहा कि उसने शेयर बाज़ार घोटाले के एक आरोपी को प्रधानमंत्री के पास चार करोड़ रुपये ले जाते देखा था. दूसरे ने तपाक से कहा कि उसे विश्वास नहीं होता, क्योंकि प्रधानमंत्री इतनी छोटी रकम पर तो छींक भी नहीं मारेंगे.

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लगता है बाबा रामदेव से कांग्रेस डर गई

राजनीति और आध्यात्म में सबसे बड़ा फर्क़ यह है कि आध्यात्म मनुष्य को मौन कर देता है, जबकि राजनीति में मौन रखना सबसे बड़ा पाप साबित होता है. बाबा रामदेव के हमले के बाद कांग्रेस पार्टी आध्यात्म की ओर मुड़ गई है, उसने चुप्पी साध ली है.

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काला धन बनाम राजनीतिक हथकंडे

भारत दुनिया की नज़रों में 15 अगस्त, 1947 को स्वतंत्र हो गया था. उस समय हमारे नेताओं, अधिकारियों एवं देशभक्तों के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती थी इस विशाल राष्ट्र को आत्मनिर्भर बनाना. वहीं दूसरी तऱफ देश के अंदर वे शक्तियां भी सक्रिय हो उठीं, जिन्हें भारत की आत्मनिर्भरता और आम जनता से ज्यादा फिक्र इस बात की थी कि वे किस प्रकार कम समय में अधिक धन-संपत्ति का संग्रह कर सकें.

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