खेती-किसानी और उद्यमिता को नई दिशा दे रहा मोरारका फाउंडेशन

इसे पानी की कमी कहें या संसाधनों का अभाव, राजस्थान में खेती को हमेशा से ही घाटे का सौदा माना

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क्या सरकार शांतिपूर्ण किसान आन्दोलन को आन्दोलन नहीं मानती

22 और 23 फरवरी को देश के अधिकतर हिस्सों में किसानों ने शांतिपूर्ण आंदोलन किया. इन शांतिपूर्ण आंदोलन कर रहे

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कर्ज का रकम जुटाने हेतु सरकारी कर्मियों के एक दिन का वेतन काटेगी सरकार

नई दिल्ली, (राजीव) : किसानों के कर्ज माफ़ी ने तोड़ी सरकार की कमर कर्ज का रकम जुटाने हेतु सरकारी कर्मियों

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अहमदनगर के किसानों ने लिया निर्णय: खेत नहीं जोतेंगे, उपज नहीं बेचेंगे

संजय अस्थाना : चंपारण सत्याग्रह के शताब्दी वर्ष में खेती-किसानी पर राष्ट्रीय विमर्श के बीच महाराष्ट्र में अहमदनगर के किसानों ने

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महाराष्ट्र : कर्ज से परेशान किसान ने की पत्नी की हत्या और फिर दी अपनी जान

मुंबई : महाराष्ट्र में कर्ज से परेशान किसानों के खुदखुसी करने का मामला थमने का नाम नही ले रहा है।महाराष्ट्र

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दादरी पॉवर प्लांट भूमि अधिग्रहण प्रकरण : रिलायंस ने घुटने टेके

किसान को विकास का अगुवा और संस्कृति का खुदा कहा गया है, लेकिन जैसे-जैसे मानव सभ्यता आगे बढ़ी, वैसे-वैसे किसान

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किसानों की दुश्मन है कांग्रेस

भट्टा-पारसौल किसान आंदोलन के अग्रणी नेता मनवीर तेवतिया ने भूमि अधिग्रहण विधेयक में संशोधन की मांग को लेकर और किसान

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विदेशी भगाओ-स्वदेशी अपनाओ की नीति पर अमल हो

हो सकता है कि सरकार क़ानूनों के तहत जबर्दस्ती अनाज ले जाए, लेकिन क्या 55 साल पूर्व बारडोली में ब्रिटिश सरकार

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बंद हो कमोडिटी एक्सचेंज

कमोडिटी एक्सचेंज को अर्थशास्त्री सट्टा बाज़ार मानते हैं, क्योंकि वहां लोगों की गाढ़ी कमाई के साथ खिलवाड़ किया जाता है.

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चांदन डैम पर किसका हक़- जल और ज़मीन की जंग लड़ रहे हैं किसान

किसानों और आदिवासियों को उनके जल, जंगल एवं ज़मीन से बेदख़ल करने के लिए राजनेता और पूंजीपति वर्ग जिस तरह

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रंगराजन समिति की सिफारिश किसान विरोधी

पिछले दिनों राजधानी दिल्ली में गन्ना उत्पादक किसानों ने संसद का घेराव किया. आंदोलनकारी किसानों के समर्थन में पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल वीके सिंह, हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री ओमप्रकाश चौटाला, तृणमूल कांग्रेस के सांसद सुल्तान अहमद भी खुलकर सामने आए. देश के अलग-अलग राज्यों से आए किसान जब संसद के बाहर आंदोलन कर रहे थे, उसी दिन संसद के भीतर माननीय सदस्य एफडीआई के मुद्दे पर बहस कर रहे थे.

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राजनीति के नए सिद्धांत

भारत की राजनीति में नए सैद्धांतिक दर्शन हो रहे हैं. पता नहीं ये सैद्धांतिक दर्शन भविष्य में क्या गुल खिलाएंगे, पर इतना लगता है कि धुर राजनीतिक विरोधी भी एक साथ खड़े होने का रास्ता निकाल सकते हैं. लेकिन लोकसभा या राज्यसभा में क्या अब ऐसी ही बहसें होंगी, जैसी इस सत्र में देखने को मिली हैं. मानना चाहिए कि ऐसा ही होगा. ऐसा मानने का आधार है. दरअसल, अब इस बात की चिंता नहीं है कि हिंदुस्तान में आम जनता का हित भी महत्वपूर्ण है.

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उड़ीसा ने अन्‍ना हजारे को सिर-आंखों पर बैठाया : राजनीति को नए नेतृत्‍व की जरूरत है

अन्ना हजारे कार्यकर्ता सम्मेलन में शिरकत करने के लिए उड़ीसा दौरे पर गए. उनकी अगवानी करने के लिए बीजू पटनायक हवाई अड्डे पर हज़ारों लोग मौजूद थे, जो अन्ना हजारे जिंदाबाद, भ्रष्टाचार हटाओ और उड़ीसा को भ्रष्टाचार मुक्त बनाने के नारे लगा रहे थे. अन्ना ने कहा कि हमारा काम बहुत बड़ा है और किसी को भी खुद प्रसिद्धि पाने के लिए यह काम नहीं करना है.

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मध्‍य प्रदेश: पुलिस बर्बरता के शिकार हुए किसान

भूमि अधिग्रहण के लिए सरकार भले ही एक मज़बूत क़ानून बनाने की बात कर रही हो, लेकिन सच्चाई इसके विपरीत है. यही वजह है कि देश की सभी राजनीतिक पार्टियां किसानों और मज़दूरों के हितों की अनदेखी करते हुए निजी कंपनियों को फायदा पहुंचाने में जुटी हैं. बात चाहे कांग्रेस शासित महाराष्ट्र की हो या फिर भाजपा शासित मध्य प्रदेश की, हालात कमोबेश एक जैसी ही हैं.

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किसानों पर गोलियां चलाने से हल नहीं निकलेगा

भारत भी अजीब देश है. यहां कुछ लोग ऐसे हैं, जिन्हें फायदा पहुंचाने के लिए सरकार सारे दरवाज़े खोल देती है. कुछ लोग ऐसे हैं, जिन्हें लाभ पहुंचाने के लिए नियम-क़ानून भी बदल दिए जाते हैं. कुछ लोग ऐसे भी हैं, जिनके हितों की रक्षा सरकारी तंत्र स्वयं ही कर देता है, मतलब यह कि किसी को कानोंकान खबर तक नहीं होती और उन्हें बिना शोर-शराबे के फायदा पहुंचा दिया जाता है.

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सीमेंट कारखानों के लिए भूमि अधिग्रहण : किसान आखिरी दम तक संघर्ष करें

देश में जब भी भूमि अधिग्रहण की बात होती है, तो सरकार का इशारा आम आदमी और किसान की तऱफ होता है. आज़ादी के बाद से दस करोड़ लोग भूमि अधिग्रहण की वजह से विस्थापित हुए हैं. अपनी माटी से अलग होने वालों में कोई पूंजीपति वर्ग नहीं होता. विकास की क़ीमत हमेशा आम आदमी को ही चुकानी पड़ी है. जिनके पास धन है, वे दिल्ली और मुंबई जैसे महानगरों में अपने मनमाफिक मकान ख़रीद सकते हैं, लेकिन वह आम आदमी, जिसके पास अपनी जीविका और रहने के लिए ज़मीन का एक छोटा सा टुकड़ा है, उसे बेचकर आख़िर वह कहां जाएगा? ऐसे कई ज्वलंत सवालों पर पेश है चौथी दुनिया की यह ख़ास रिपोर्ट…

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