एक नहीं, देश को कई केजरीवाल चाहिए

साधारण पोशाक में किसी आम आदमी की तरह दुबला-पतला नज़र आने वाला शख्स, जो बगल से गुजर जाए तो शायद उस पर किसी की नज़र भी न पड़े, आज देश के करोड़ों लोगों की नज़रों में एक आशा बनकर उभरा है. तीखी बोली, तीखे तर्क और ज़िद्दी होने का एहसास दिलाने वाला शख्स अरविंद केजरीवाल आज घर-घर में एक चर्चा का विषय बन बैठा है. अरविंद केजरीवाल की कई अच्छाइयां हैं तो कुछ बुराइयां भी हैं. उनकी अच्छाइयों और बुराइयों का विश्लेषण किया जा सकता है, लेकिन इस बात पर दो राय नहीं है कि देश में आज भ्रष्टाचार के खिला़फ जो माहौल बना है, उसमें अरविंद केजरीवाल का बड़ा योगदान है.

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आत्‍महत्‍या की कीमत हम सब चुकाते हैं

वर्ष 2006 में मानव संसाधन विकास राज्यमंत्री नवीन जिंदल ने संसद में एक मुद्दा उठाया कि भारतीय छात्रों द्वारा आत्महत्या की घटनाओं की वजह क्या है और सरकार किस तरह आत्महत्या के आंकड़े बढ़ने से रोक सकती है. इसके बाद संसद की तऱफ से कुछ विशेष क़ानून बनाए गए. सबसे पहले तो परीक्षाओं से जुड़ी हेल्पलाइन शुरू की गई, जो परीक्षा से पहले विद्यार्थियों को फोन पर साइकोलॉजिकल एडवाइस देती है.

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फैसले न लेने की कीमत

मनमोहन सिंह की बुनियादी समस्या यह है कि वह खुद फैसले नहीं लेना चाहते, लेकिन प्रधानमंत्री हैं तो फैसले तो लेने ही थे. जब उनके पास फाइलें जाने लगीं तो उन्होंने सोचा कि वह क्यों फैसले लें, इसलिए उन्होंने मंत्रियों का समूह बनाना शुरू किया, जिसे जीओएम (मंत्री समूह) कहा गया. सरकार ने जितने जीओएम बनाए, उनमें दो तिहाई से ज़्यादा के अध्यक्ष उन्होंने प्रणब मुखर्जी को बनाया.

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दूध की कीमत का सवालः मुनाफे में कंपनियां घाटे में किसान

अनाज पैदा करने वाले किसानों द्वारा अपनी मांगों को लेकर आंदोलन करते अक्सर देखा गया है, लेकिन ऐसा पहली मर्तबा हुआ, जब दूध की सही क़ीमत निर्धारित करने को लेकर दुग्ध उत्पादक किसानों एवं ग्वालों ने बड़ी संख्या में एकजुट होकर राजधानी दिल्ली में प्रदर्शन किया. दिल्ली के जंतर-मंतर पर ग्वाला गद्दी समिति एवं दूध उत्पादक किसानों की मांगों को जायज़ क़रार देते हुए टीम अन्ना ने भी इसका समर्थन किया.

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