सामाजिक विशमता मानव नस्ल का

आप पूछ सकते हैं कि भाई, जिन आदमियों के पास खाने को पर्याप्त रोटी नहीं है, पहनने के लिए कपड़ा नहीं है, उन सबको समान बंटवारा कर देने से क्या सब ठीक हो जाएगा? क्या आप मानते हैं कि वे उस प्राप्त धन का दुरुपयोग नहीं करेंगे? क्या उन्हें प्राथमिकता का ज्ञान या ध्यान रहेगा? वे लोग मिली हुई धनराशि जुए या अन्य किसी दुर्व्यसन में खर्च करके फिर उसी तरह रोटी-कप़डे के मोहताज नहीं बन जाएंगे?

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समाज का अभिशाप, अमीरों का शौक

एक संयुक्त परिवार को ले लीजिए. आप परिवार के बड़े हैं. कई बच्चे हैं. रुपये आपके पास मान लीजिए 500 हैं. सबसे पहला प्रश्न उठेगा कि पहले-पहल क्या चीज़ खरीदी जाए, उसके बाद क्या? इस तरह परिवार की ज़रूरत की चीज़ों की सूची बनेगी और आप वस्तुएं उपलब्ध कर लेंगे. मान लीजिए, खाने के लिए घर में अन्न नहीं है.

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वर्ग तंत्र और यथास्थितिवाद

पांचवीं योजना वर्ग विभाजन की है. राष्ट्र को या समाज को कई वर्गों में विभक्त मान लिया जाता है और प्राय: हर एक वर्ग की अलग-अलग आय निर्धारित होती है. मान लीजिए, एक वर्ग निम्न कोटि के काम करने वाले मज़दूरों, क़ुलियों, भारवाहकों का है, उन्हें औसतन 70 रुपये माहवार मिलता है. दूसरा वर्ग प्रोफेसर, डॉक्टर इत्यादि लोगों का है, जिन्हें क़रीब 1000 रुपये माहवार मिलता है.

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जिसकी लाठी उसकी भैंस

तीसरी योजना है कि जिसके पास ताक़त हो, वह ले ले. जो संभाल सके, वह रखे. यदि यह कार्यान्वित हुई तो विश्व में कहीं भी शांति या सुरक्षा का नामोनिशान ही नहीं रहेगा. अगर सब ताक़त में या चालाकी में समान हों तो संघर्ष और भी भयानक होंगे, परिणामस्वरूप कोई कुछ भी हथिया न सकेगा. बालक-वृद्ध कम ताक़त वाले हैं, युवा व्यक्ति अधिक ताक़त वाले हैं.

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सांसद निधि: कहां और कितना खर्च हुआ

विकास कार्य के लिए आपके स्थानीय सांसद को हर साल करोड़ों रुपये मिलते हैं. इसे सांसद स्थानीय विकास फंड कहा जाता है. इस फंड से आपके क्षेत्र में विभिन्न विकास कार्य किए जाने की व्यवस्था होती है. लेकिन क्या कभी आपने अपने लोकसभा क्षेत्र में सांसद निधि से हुए विकास कार्यों के बारे में जानने की कोशिश की?

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उत्तर प्रदेश अल्‍पसंख्‍यक आयोगः खर्चा रूपया, काम चवन्‍नी

अल्पसंख्यक, एक ऐसा शब्द, जिसका इस्तेमाल शायद राजनीति में सबसे ज़्यादा होता है. सत्ता में आने से पहले और सत्ता में आने के बाद बस इस शब्द और इस समुदाय का इस्तेमाल ही होता आया है. इसके अलावा जो कुछ भी होता है, वह स़िर्फ दिखावे के लिए होता है.

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पंचायत के खर्च का हिसाब मांगे

गांधी जी का सपना था कि देश का विकास पंचायती राज संस्था के ज़रिए हो. पंचायती राज को इतना मज़बूत बनाया जाए कि लोग ख़ुद अपना विकास कर सकें. आगे चल कर स्थानीय शासन को ब़ढावा देने के नाम पर त्री-स्तरीय पंचायती व्यवस्था लागू भी की गई.

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विशेषज्ञों की परामर्श सेवा पर पौने दो अरब रूपए खर्च

मध्य प्रदेश के जल संसाधन विभाग ने तकनीकी विशेषज्ञों की परामर्श सेवा लेने के लिए पौने दो अरब रूपए खर्च करके परामर्श सेवा कंपनियों को तो मालामाल कर दिया, लेकिन इस सेवा से राज्य को कितना लाभ मिला, इस बारे में विभाग कुछ भी बताने को तैयार नहीं है. आरोप है कि मध्य प्रदेश का जल संसाधन विभाग कुछ अफसरों की सनक पर चलता है. चूंकि राजनेता ज़्यादा समझदार और चुस्त नहीं हैं, इसलिए विभाग में अफसरों की ही मनमानी चलती है.

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