संशोधित भूमि अधिग्रहण बिलः ग्रामीण विकास या ग्रामीण विनाश

ओडिसा के जगतसिंहपुर से लेकर हरियाणा के फतेहाबाद में ग्रामीण भूमि अधिग्रहण का विरोध कर रहे हैं. दूसरी ओर झारखंड के कांके-नग़डी में आईआईएम के निर्माण के लिए हो रहे भूमि अधिग्रहण का लोग विरोध कर रहे हैं. इस पर सरकार का कहना है कि देश को विकास पथ पर बनाए रखने के लिए भूमि अधिग्रहण आवश्यक है.

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पिछले चार साल में अनाज नहीं सड़ा: एफसीआई

जुलाई 2010 में सरकार ने एक आरटीआई के अंतर्गत पूछे गए सवाल के जवाब में कहा था कि देश में एफसीआई के विभिन्न गोदामों में 1997 से 2007 के बीच 1.83 लाख टन गेहूं, 6.33 लाख टन चावल और 2.2 लाख टन धान खराब हो गया था. जुलाई 2012 में एक अन्य आरटीआई के जवाब में एफसीआई ने कहा है कि 2008 से लेकर अब तक देश में एफसीआई के किसी भी गोदाम में अनाज खराब नहीं हुआ है.

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लापरवाही, मनमानी और भ्रष्‍टाचार का गढ़

साढ़े पांच दशक पूर्व कई लोक कल्याणकारी उद्देश्यों को लेकर स्थापित किया गया भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) आज लापरवाही, मनमानी

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भूखों की रोटी कहां है

यूं तो भारत को विकासशील देशों की श्रेणी में अगला स्थान हासिल है, लेकिन फिर भी कुछ आंकड़े ऐसे हैं, जो इस सच को ठुकराने लगते हैं. ये आंकड़े बताते हैं कि भारत में भूखे लोगों की संख्या बढ़कर 6.3 करोड़ हो गई है. एक ग़ैर सरकारी संस्था द्वारा जारी सर्वे रिपोर्ट के आधार पर कहा गया है कि खराब आहार प्रणाली और खाद्य पदार्थों के बढ़ते दामों के कारण भूखे लोगों की गिनती बढ़ती जा रही है.

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भूखों को रोटी देने की कवायद

देश में खाद्य सुरक्षा विधेयक को मंज़ूरी मिलने से भुखमरी से होने वाली मौतों में कुछ हद तक कमी आएगी, ऐसी उम्मीद की जा सकती है. हाल में प्रगतिशील जनतांत्रिक गठबंधन (यूपीए) की अध्यक्ष सोनिया गांधी की अध्यक्षता वाली राष्ट्रीय सलाहकार परिषद (एनएसी) ने राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा विधेयक 2011 को मंज़ूरी दी है.

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मिलावटख़ोरों को फांसी हो

हमारे देश में इन दिनों भ्रष्टाचार को लेकर व्यापक बहस छिड़ी हुई है. देश में फैला मिलावटख़ोरी व नक़ली वस्तुएं बेचने वालों का नेटवर्क भी इसी भ्रष्टाचार का एक सर्वप्रमुख अंग है, परंतु बावजूद इसके कि लगभग प्रत्येक भारतीय इस समय कहीं न कहीं मिलावटख़ोरी या नक़ली वस्तुओं की ख़रीद फरोख्त का स्वयं शिकार हो रहा है.

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बीटी बीज यानी किसानों की बर्बादी

संप्रग सरकार की जो प्रतिबद्धता किसान और खेती से जुड़े स्थानीय संसाधनों के प्रति होनी चाहिए, वह विदेशी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के प्रति दिखाई दे रही है. इस मानसिकता से उपजे हालात कालांतर में देश की बहुसंख्यक आबादी की आत्मनिर्भरता को परावलंबी बना देने के उपाय हैं.

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जन्म से पहले की भूख

गरीबों के नाम पर योजनाएं ढेर सारी हैं, लेकिन वितरण व्यवस्था में गड़बड़ियों के कारण आर्थिक असमानता की खाई चौड़ी होती जा रही है. भारत में हर साल लगभग 25 लाख शिशुओं की अकाल मृत्यु हो जाती है. इसी तरह 42 प्रतिशत बच्चे गंभीर कुपोषण के शिकार हैं.

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जिधर देखो उधर मिलावट

बनारस की शान और लबों पर सुर्ख़ी लाने वाले पान में अब कत्थे के स्थान पर गैम्बियर का इस्तेमाल खुलेआम हो रहा है. उत्तर प्रदेश में जनवरी से मई 2010 तक 51 स्थानों पर छापे मारकर सैकड़ों नमूने लिए गए. जिनमें से 19 नमूनों में गैम्बियर पाए जाने पर सरकार ने संबंधित लोगों के ख़िला़फ कार्यवाही के आदेश दिए हैं.

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एक बार फिर जी एम खाद्य पदार्थ लाने की तैयारी

खाद्य सुरक्षा के नाम पर एक बार फिर हमारे मुल्क में जीएम फसलों और खाद्य पदार्थों के प्रवेश की तैयारियां हैं. जीएम फूड के ख़िला़फ उठी तमाम आवाज़ों और पर्यावरण एवं जैव तकनीक मंत्रालय के मतभेदों को दरकिनार कर यूपीए सरकार संसद के मानसून सत्र में भारतीय जैव नियामक प्राधिकरण विधेयक 2009 लाने का मन बना रही है.

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मल्‍टी ब्रांड रिटेल में एफडीआई

पिछले तीन सालों में महंगाई में बेतहाशा वृद्धि हुई है. 2007 में यह 5.69 प्रतिशत थी, लेकिन 2010 में 10.55 प्रतिशत के स्तर पर पहुंच चुकी है. वह भी तब, जबकि इस दौरान देश में खाद्यान्नों के उत्पादन में इज़ा़फा हुआ है. आम आदमी की जेब से लेकर पेट तक को चोट करती इस महंगाई की सबसे बड़ी वजह क्या है?

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अंडमान में खाद्य प्रसंस्‍करण की पहल

अंडमान-निकोबार द्वीप समूह में पर्यावरणीय संतुलन क़ायम रखने के लिए कुछ समय पूर्व न्यायालय ने वनों की कटाई पर रोक लगा दी थी. लंबे समय तक काष्ठ उत्पादों के निर्माण से जुड़े लोगों के सामने ऐसे में रोजी-रोटी का संकट आ खड़ा हुआ.

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गायब होती वरक कला चांदी का फ्राड वर्क

मिठाई पर चांदी के वरक के नाम पर जहर चढ़ाया जा रहा है. मिठाई खाने वाले को जब बीमारी पूरी तरह जकड़ लेती है, तब उसे पता चलता है कि मिठाई की सौगात रोग लेकर आई है. लखनऊ की नजाकत-नफासत के बीच परंपरा की थाती की याद दिलाते हथौड़ों की धुन चौक की एक तंग गली में गूंजती रहती है.

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खाद्य प्रसंस्‍करण उद्योग और ग्रामीण आत्‍मनिर्भरता

भारत गांवों का देश है, जिसकी अर्थव्यवस्था का मूल आधार कृषि को माना जाता है, लेकिन विडंबना यह है कि एक ओर जहां किसानों को बेहतर उत्पादन होने पर भी फसल की कम क़ीमत मिलती है, वहीं दूसरी तऱफ कम उत्पादन होने पर भी उन्हें घाटे का सामना करना पड़ता है.

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बीहड़ों में तब्‍दील होती उपजाऊ भूमि

कहने को तो भारत कृषि प्रधान देशों की श्रेणी में आता है, इसके बावजूद हम गेहूं से लेकर अन्य खाद्य पदार्थों का आयात करने पर मजबूर हैं. ऐसा नहीं है कि हमारे पास अन्न पैदा करने के लिए उपजाऊ भूमि और अन्य साधनों की कमी है. यहां तो 800 एकड़ कृषि योग्य भूमि ही बीहड़ों में तब्दील होकर बर्बाद हो रही है.

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भ्रष्ट राशन दुकानदारों का इलाज है आरटीआई

भारत में राशन व्यवस्था की शुरुआत के पीछे का एक मक़सद यह भी था कि कम आय वाले लोगों और ग़रीब आदमी को दो व़क्त का भोजन नसीब हो सके, लेकिन ग़रीब लोगों का भोजन भी भ्रष्टाचारियों की गिद्ध दृष्टि से बच नहीं सका. लगातार आरोप लगते रहे हैं कि ग़रीबों के हिस्से का राशन अधिकारी से लेकर राशन दुकानदार तक मिल-बांट कर खा रहे हैं.

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ट्रक एंट्री का गोरखधंधा

नीतीश सरकार एक ओर जहां राज्य की माली हालत एवं राजस्व की कमी का रोना रोते हुए विकास के लिए केंद्र से अतिरिक्त सहायता और बिहार को विशेष राज्य का दर्ज़ा देने की मांग कर रही है, वहीं दूसरी तरफ परिवहन विभाग में व्याप्त भ्रष्टाचार एवं अधिकारी-दलाल गठजोड़ के कारण राज्य को प्रति वर्ष करोड़ों रुपये का चूना लग रहा है.

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प्रजातंत्र, तानाशाही और अन्न स्वराज

बीटी-बैगन के मुद्दे पर भारत में छिड़ी बहस ने यह स्पष्ट कर दिया है कि देश का कृषक और उपभोक्ता वर्ग जीएम फूड्‌स के पक्ष में नहीं है. सेंटर फॉर एंवायरमेंट एजूकेशन, जिसने पर्यावरण मंत्रालय की ओर से इस बहस का आयोजन किया, के अतुल पांड्या ने इससे संबंधित रिपोर्ट पेश की. बहस में देश भर के किसानों ने भाग लिया और अपने अनुभव बांटे.

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