यह देश के लिए परीक्षा की घड़ी है

जितना हम अनुभव करते हैं, उससे ज़्यादा कठिन दौर से हमारा देश गुज़र रहा है. 1991 में हुए आर्थिक सुधारों ने ढेर सारी संभावनाएं पैदा कीं, जिन्होंने इस बात की उम्मीद बढ़ाई कि देश की आर्थिक विकास दर में वृद्धि होगी. पिछले बीस सालों में बहुत सारी घटनाएं घटीं. आर्थिक विकास दर में लगातार वृद्धि हुई, जिसे विभिन्न क्षेत्रों में होने वाले विकास में देखा जा सकता है.

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सरकार ग़रीबों को तमाचा मारना बंद करे

पश्चिम बंगाल में सत्ता परिवर्तन के बाद कई बच्चों की मौत हो गई है, यूपीए-1 की तुलना में यूपीए-2 के कार्यकाल में रेल दुर्घटनाएं बढ़ गई हैं, पर इस तऱफ तृणमूल कांगे्रस के रेल मंत्री का ध्यान नहीं है, लेकिन शरद पवार को लगा एक थप्पड़ सबका ध्यान आकर्षित कर रहा है.

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ग़रीबों के हितैषी होने का भ्रम

सवाल उठता है कि धनिकों का प्रभाव जब इस तरह से प्रजा के दिमाग़ पर ठोक-पीटकर बैठाया जाता है और वह अवांछनीय भी है तो लोग इसे बर्दाश्त क्यों करते हैं? क्यों न इसके विरुद्ध विद्रोह खड़ा होता है? ठीक है, पर यह पूंजीवादी ज़हर आपको, हमको इस तरह पिलाया जा रहा है

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आखिर कैसे बचेगा पाकिस्तान

हर ज़ुबान पर क्रांति और इंकलाब जैसे शब्द हैं. ग़रीब इससे कुछ हासिल होने की उम्मीद कर रहे हैं, जबकि अमीर डरे हुए हैं. पंजाब के गवर्नर सलमान तासीर और अब अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री शहबाज भट्टी की हत्या ने अवाम के बीच सिहरन पैदा कर दी है.

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उम्‍मीद की रोशनी

एक तो ग़रीब, ऊपर से विकलांग. ज़मीन के नाम पर स़िर्फ उतना, जिस पर झोपड़ीनुमा घर बना हुआ है. बेरोज़गारी और मु़फलिसी इनकी नियति बन चुकी थी. कल तक कालू भाट और राधेश्याम की ज़िंदगी की कहानी कुछ ऐसी ही थी, लेकिन यह कल की कहानी है. आज कालू भाट और राधेश्याम की ज़िंदगी में रोशनी है, आंखों में चमक है, उम्मीद की किरण है, एक सपना है बेहतर भविष्य का.

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