सरकार को पैसा कौन देता है

आज देश में अंतर्विरोध की कई रेखाएं हैं. जैसे कि गांव में किसान मज़दूर का शोषण करता है, बड़ा छोटे

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क्या करें ऐसे प्रधानमंत्री का?

एक फिल्म आई थी, जिसका एक बहुत मशहूर संवाद था, तारीख़ पर तारीख़, तारीख़ पर तारीख़, तारीख़ पर तारीख़. दरअसल,

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क्या छत्तीसग़ढ में लोकतंत्र नहीं है

दिल्ली के उन नेताओं को धन्यवाद देना चाहिए, जो पत्रकारिता जगत का नेतृत्व करते हैं. इनके लिए सारा देश दिल्ली है. अगर दिल्ली में किसी अख़बार के साथ कुछ ग़लत हो तो इनके लिए बहुत बड़ा सवाल बन जाता है. अगर किसी पत्रकार के साथ कुछ हो तो और भी बड़ा सवाल बन जाता है.

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ग़रीबी और अमीरी के बीच की खाई बढ़ी है

आजकल 9 फीसदी से कम विकास दर पर काफी चर्चा की जा रही है. हालांकि विकास दर महत्वपूर्ण है, लेकिन इससे अधिक महत्वपूर्ण है कि विकास का विषय क्या है. 1991 में हमसे यह वादा किया गया था कि आर्थिक सुधार से विकास दर में वृद्धि होगी और इससे समृद्धि आएगी.

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टाटा स्टील और झारखंड सरकार की लूट

झारखंड खनिज संपदा से भरा पड़ा है. फिर भी वहां ग़रीबी है, नक्सलवाद है, बेरोज़गारी है और भुखमरी भी. बावजूद इसके कि इस राज्य में टाटा से लेकर मित्तल ग्रुप तक का अरबों का व्यापारिक साम्राज्य कायम है. समृद्धि की कौन कहे, ज़्यादातर वाशिंदों को दो व़क्त की रोटी भी मयस्सर नहीं. वजह यह कि अरबपति औद्योगिक घराने इनकी हक़मारी कर रहे हैं, अपनी जेबें भरने की खातिर इन ग़रीबों के पेट पर लात मार रहे हैं

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