अन्ना हज़ारे की जनतंत्र यात्रा सुपर फ्लॉप हो सकती है, क्योंकि कई लोग यह मानते हैं कि हिंदुस्तान के लोगों को देश से कोई मतलब नहीं है. उन्हें अपने पेट के लिए रोटी और अपने भविष्य की चिंता ज़्यादा होती है. हर जगह लोग जाति और संप्रदाय में बंटे हैं. हर जगह बैकवर्ड-फॉरवर्ड की लड़ाई [...]
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प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने पंद्रह अगस्त को लाल क़िले से देश को संबोधित किया. संबोधन से पहले लोग आशा कर रहे थे कि वह उन सारे सवालों का जवाब देंगे, जो देश के सामने हैं या जिन्हें उनके सामने उठाया जा रहा है. विरोधी दल तो कोई सवाल उठा नहीं रहे हैं, सवाल स़िर्फ अन्ना हजारे और बाबा रामदेव उठा रहे हैं. उन सवालों को जनता का समर्थन भी हासिल है, जिनका जवाब प्रधानमंत्री को लाल क़िले से देना चाहिए था.
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यह कहना कि यूपीए सरकार अपनी दिशा खो रही है, कमबयानी होगा. लेकिन यही कमबयानी राजनीतिक और राष्ट्रीय स्तर पर कुछ महत्वपूर्ण सवालों को रेखांकित भी करती है. क्या हम भारतीय राजनीति में नेहरू-गांधी परिवार के प्रभाव के खत्म होने की शुरुआत तो नहीं देख रहे हैं? क्या लोगों की एक ब़डी संख्या, जो हमेशा से गांधी खानदान के प्रति व़फादार रही है, अब दूसरी पार्टियों की ओर रु़ख कर रही है? निश्चित तौर पर यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी के प्रभाव में कमी दिख रही है.
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मुझे लगता है कि यह सरकार एक मृतप्राय सरकार है. कोई लोगों ने सरकार से गुज़ारिश की कि गांधी जी की यादों से जुड़ी वस्तुओं की नीलामी रोकी जाए, लेकिन यह सरकार जब अपने रोजमर्रा के ही काम नहीं कर पा रही है, तो इसे गांधी जी की मेमोरीबिलिया लाने की फुर्सत भला कहां से मिलती! आर्मी चीफ की नियुक्ति से लेकर हर छोटी चीज तक, सरकार नाम की चीज आपको कहीं दिखती है?
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बोफोर्स का जिन्न एक बार फिर बाहर आया है, लेकिन स़िर्फ धुएं के रूप में. चौथी दुनिया ने बोफोर्स कांड की एक-एक परत को खुलते हुए क़रीब से देखा है और हर एक परत का विश्लेषण पाठकों के समक्ष रखा है. अभी स्वीडन के पूर्व पुलिस प्रमुख का एक बयान आया है, जिसमें कहा गया है कि अमिताभ बच्चन और राजीव गांधी ने बोफोर्स में रिश्वत नहीं ली थी.
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सही मायनों में अपनी आवाज़ को सीधे संवाद के ज़रिये जन-जन तक पहुंचाने का सर्वश्रेष्ठ माध्यम आज भी नाटक को ही माना जाता है. नाटक मंचन और इसी की एक विधा नुक्कड़ नाटकों के ज़रिये न स़िर्फ दर्शकों से सीधा संवाद होता है, बल्कि उसी व़क्त नाटक की विषयवस्तु से संबंधित सारी जानकारी भी मिल जाती है.
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इस व़क्त देश में यात्राओं का दौर चल रहा है. मुद्दे तमाम हैं, भ्रष्टाचार से लेकर राजनीति तक, लेकिन इसमें समाज का वह अंतिम व्यक्ति कहां है जिसके उत्थान के लिए गांधी जी ने इस देश को एक ताबीज दिया था?
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दो अक्टूबर को गांधी जयंती मनाई जाती है. यह दिन पाखंड, अतिशयोक्ति और बड़बोलेपन का होता है. इस दिन बड़ी-बड़ी बातें की जाती हैं. राष्ट्रपिता को हम लोग दो दिन ही याद रखते हैं, एक उनके जन्मदिवस पर और दूसरे जिस दिन उनकी मृत्यु हुई थी. इसके बाद गांधी जी नोटों पर विराजमान होकर हम पर हंसते हुए दिखाई देते हैं. ये वही नोट होते हैं, जिनका इस्तेमाल काले धन के तौर पर हमारी राजनीति को भ्रष्ट करने के लिए किया जाता है.
Tags: Anna, Gandhi, Narayan, Politics, birthday, father of Nation, अन्ना, गांधी, जन्मदिवस, नारायण, राजनीति, राष्ट्रपिता Posted in समाज, साहित्य, स्टोरी-6 by Author: मेघनाद देसाई | No Comments » | Read More... |
2 अक्टूबर बीत गया. पहली बार देश में 2 अक्टूबर सरकारी फाइलों और सरकारी समारोहों से बाहर निकल करके लोगों के बीच में रहा. लोगों ने गांधी टोपी लगाकर महात्मा गांधी को याद किया. न केवल महात्मा गांधी को याद किया, बल्कि उनके विचारों के ऊपर चर्चाएं कीं, सेमिनार किए. 2 अक्टूबर बीतने के बाद ऐसा लग रहा है कि इस देश में बहुत सालों के बाद गांधी का नाम गांधीवादियों द्वारा नहीं, बल्कि गांधी के विचारों की ताक़त के आधार पर लोगों के मन में घर कर रहा है.
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जब भगत सिंह और उनके साथियों को फांसी दी गई तो महात्मा गांधी ने कहा था, भगत सिंह और उनके साथियों को फांसी दे दी गई और वे शहीद हो गए. उनकी मौत कई लोगों के लिए व्यक्तिगत क्षति है.
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बापू जब मोहनदास करमचंद गांधी थे, नौजवान वकील थे और दक्षिण अफ्रीका में वकालत करने गए तो उनके साथ एक हादसा हुआ. गोरों ने उन्हें प्रथम श्रेणी में बैठने के लायक़ नहीं समझा और ज़बरदस्ती गाड़ी से धक्का देकर बाहर फेंक दिया. जब वह हिंदुस्तान वापस आए, उनके मन में हिंदुस्तान में कुछ काम करने की इच्छा जागी.
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अन्ना हजारे दूसरे गांधी के रूप में उभर रहे हैं. हर अख़बार उनके स्तुतिगान से लबरेज है. लोकपाल बिल का मसौदा तैयार करने वाली समिति में सिविल सोसायटी के प्रतिनिधियों को शामिल करने की अन्ना की मांग यूपीए सरकार ने मंजूर कर ली.
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जनता एक ज़िम्मेदार संसद का निर्माण करे |
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