गांधी की विरासत नहीं बदल सकी अमेठी की किस्मत

अमेठी संसदीय क्षेत्र से नेहरू-गांधी परिवार का रिश्ता बहुत पुराना है. अमेठी में इस परिवार का आगमन 1975 में हुआ

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सत्ता के पूर्ण विकेंद्रीकरण से संभव है : पार्टीविहीन लोकतंत्र

गांधी और जेपी की सोच पार्टीविहीन लोकतंत्र को कभी उभरने नहीं दिया गया, क्योंकि अगर ऐसा होता, तो आज जो

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जनतंत्र यात्रा 2013 – अब बदलाव ज़रूरी है

अन्ना हज़ारे की जनतंत्र यात्रा सुपर फ्लॉप हो सकती है, क्योंकि कई लोग यह मानते हैं कि हिंदुस्तान के लोगों

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इतिहास कभी मा़फ नहीं करता

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने पंद्रह अगस्त को लाल क़िले से देश को संबोधित किया. संबोधन से पहले लोग आशा कर रहे थे कि वह उन सारे सवालों का जवाब देंगे, जो देश के सामने हैं या जिन्हें उनके सामने उठाया जा रहा है. विरोधी दल तो कोई सवाल उठा नहीं रहे हैं, सवाल स़िर्फ अन्ना हजारे और बाबा रामदेव उठा रहे हैं. उन सवालों को जनता का समर्थन भी हासिल है, जिनका जवाब प्रधानमंत्री को लाल क़िले से देना चाहिए था.

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गांधी परिवार का प्रभाव घट रहा है

यह कहना कि यूपीए सरकार अपनी दिशा खो रही है, कमबयानी होगा. लेकिन यही कमबयानी राजनीतिक और राष्ट्रीय स्तर पर कुछ महत्वपूर्ण सवालों को रेखांकित भी करती है. क्या हम भारतीय राजनीति में नेहरू-गांधी परिवार के प्रभाव के खत्म होने की शुरुआत तो नहीं देख रहे हैं? क्या लोगों की एक ब़डी संख्या, जो हमेशा से गांधी खानदान के प्रति व़फादार रही है, अब दूसरी पार्टियों की ओर रु़ख कर रही है? निश्चित तौर पर यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी के प्रभाव में कमी दिख रही है.

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कांग्रेस और भाजपा में कोई फर्क नहीं

मुझे लगता है कि यह सरकार एक मृतप्राय सरकार है. कोई लोगों ने सरकार से गुज़ारिश की कि गांधी जी की यादों से जुड़ी वस्तुओं की नीलामी रोकी जाए, लेकिन यह सरकार जब अपने रोजमर्रा के ही काम नहीं कर पा रही है, तो इसे गांधी जी की मेमोरीबिलिया लाने की फुर्सत भला कहां से मिलती! आर्मी चीफ की नियुक्ति से लेकर हर छोटी चीज तक, सरकार नाम की चीज आपको कहीं दिखती है?

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बोफोर्स का पूरा सच

बोफोर्स का जिन्न एक बार फिर बाहर आया है, लेकिन स़िर्फ धुएं के रूप में. चौथी दुनिया ने बोफोर्स कांड की एक-एक परत को खुलते हुए क़रीब से देखा है और हर एक परत का विश्लेषण पाठकों के समक्ष रखा है. अभी स्वीडन के पूर्व पुलिस प्रमुख का एक बयान आया है, जिसमें कहा गया है कि अमिताभ बच्चन और राजीव गांधी ने बोफोर्स में रिश्वत नहीं ली थी.

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भ्रष्टाचार का चस्का और आम आदमी

सही मायनों में अपनी आवाज़ को सीधे संवाद के ज़रिये जन-जन तक पहुंचाने का सर्वश्रेष्ठ माध्यम आज भी नाटक को ही माना जाता है. नाटक मंचन और इसी की एक विधा नुक्कड़ नाटकों के ज़रिये न स़िर्फ दर्शकों से सीधा संवाद होता है, बल्कि उसी व़क्त नाटक की विषयवस्तु से संबंधित सारी जानकारी भी मिल जाती है.

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जन संवाद यात्रा : अब गांधी और मार्क्स नहीं, ज़मीन चाहिए

इस व़क्त देश में यात्राओं का दौर चल रहा है. मुद्दे तमाम हैं, भ्रष्टाचार से लेकर राजनीति तक, लेकिन इसमें समाज का वह अंतिम व्यक्ति कहां है जिसके उत्थान के लिए गांधी जी ने इस देश को एक ताबीज दिया था?

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गांधी-नेहरू ज़िंदाबाद

दो अक्टूबर को गांधी जयंती मनाई जाती है. यह दिन पाखंड, अतिशयोक्ति और बड़बोलेपन का होता है. इस दिन बड़ी-बड़ी बातें की जाती हैं. राष्ट्रपिता को हम लोग दो दिन ही याद रखते हैं, एक उनके जन्मदिवस पर और दूसरे जिस दिन उनकी मृत्यु हुई थी. इसके बाद गांधी जी नोटों पर विराजमान होकर हम पर हंसते हुए दिखाई देते हैं. ये वही नोट होते हैं, जिनका इस्तेमाल काले धन के तौर पर हमारी राजनीति को भ्रष्ट करने के लिए किया जाता है.

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वक्त की नज़ाकत को समझने की ज़रूरत

2 अक्टूबर बीत गया. पहली बार देश में 2 अक्टूबर सरकारी फाइलों और सरकारी समारोहों से बाहर निकल करके लोगों के बीच में रहा. लोगों ने गांधी टोपी लगाकर महात्मा गांधी को याद किया. न केवल महात्मा गांधी को याद किया, बल्कि उनके विचारों के ऊपर चर्चाएं कीं, सेमिनार किए. 2 अक्टूबर बीतने के बाद ऐसा लग रहा है कि इस देश में बहुत सालों के बाद गांधी का नाम गांधीवादियों द्वारा नहीं, बल्कि गांधी के विचारों की ताक़त के आधार पर लोगों के मन में घर कर रहा है.

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इतिहास के आईने में

जब भगत सिंह और उनके साथियों को फांसी दी गई तो महात्मा गांधी ने कहा था, भगत सिंह और उनके साथियों को फांसी दे दी गई और वे शहीद हो गए. उनकी मौत कई लोगों के लिए व्यक्तिगत क्षति है.

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राहुल जी, गांव में आपने क्या सीखा

बापू जब मोहनदास करमचंद गांधी थे, नौजवान वकील थे और दक्षिण अफ्रीका में वकालत करने गए तो उनके साथ एक हादसा हुआ. गोरों ने उन्हें प्रथम श्रेणी में बैठने के लायक़ नहीं समझा और ज़बरदस्ती गाड़ी से धक्का देकर बाहर फेंक दिया. जब वह हिंदुस्तान वापस आए, उनके मन में हिंदुस्तान में कुछ काम करने की इच्छा जागी.

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गांधी, हजारे और भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग

अन्ना हजारे दूसरे गांधी के रूप में उभर रहे हैं. हर अख़बार उनके स्तुतिगान से लबरेज है. लोकपाल बिल का मसौदा तैयार करने वाली समिति में सिविल सोसायटी के प्रतिनिधियों को शामिल करने की अन्ना की मांग यूपीए सरकार ने मंजूर कर ली.

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दून कोबाड गांधी भी पैदा करता है

दून स्कूल का शीर्ष प्रबंधन इस बात को लेकर चिंता में है कि स्कूल के बच्चों के शिक्षण में कौन सी वर्गीय-खोट है जो कोबाड गांधी को पैदा करती है. दून स्कूल के उच्च वर्गीय चरित्र पर कोबाड गांधी एक सवाल की तरह चस्पा है, जिसने उच्च वर्ग में पैदा होते हुए भी उच्च कुलीन वर्ग का चरित्र नहीं अपनाया और शोषितों-उत्पीड़ितों के हित के संघर्ष के लिए अपना जीवन अति-वामपंथ को न्यौछावर कर दिया. लेकिन दून स्कूल के प्रोडक्ट के रूप में निकले कोबाड गांधी ने स्कूल प्रबंधन के उच्च वर्गीय चरित्र को ज़रूर हिला कर रख दिया है.

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सुदर्शन का साइड इफेक्‍ट

विदेशी मूल से लेकर पति-सास की हत्या में संलिप्तता के आरोपों से घिरा सोनिया गांधी का कथित लांछनीय सियासी सफर हर दृष्टिकोण से सफल रहा है. यद्यपि उनके विरोधियों ने उक्त आरोपों के सहारे उनके सियासी क़दम को रोकने की पूरी कोशिश की, लेकिन उसका साइड इफेक्ट सोनिया गांधी के अनुकूल रहा.

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सेंसर बोर्ड, फिल्‍में और राजनीति-3: मापदंड बदलने की जरूरत

गांधी जी ने एक बार सेंसरशिप को अपने अंदाज़ में परिभाषित करते हुए कहा था, इफ यू डोंट लाइक समथिंग, क्लोज़ योर आइज़. साउथ फिल्मों का सेंसर बोर्ड इस फलसफे के दोनों पहलुओं का इस्तेमाल करता है.

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ज़िंदा होते तो गांधी पेन पर हंसते बापू

दुनिया की सबसे मशहूर और सबसे क़ीमती कलमें बनाने वाली कंपनी ने एक ऐसे आदमी के नाम पर एक लाख रुपये की कलम बनाने का फैसला क्यों किया, जिसने सारी उम्र हाथ से बने कपड़ों के अलावा और कुछ नहीं पहना? कंपनी ने महात्मा गांधी का सम्मान करने का फैसला इसलिए नहीं किया कि किसी नए सर्वे में यह कहा गया हो कि दुनिया भर के करोड़पति-अरबपति अचानक अहिंसा के अग्रदूत बन गए हों.

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स्‍वाधीनता संग्राम और मुसलमान

इस साल कांग्रेस अपना 125वां स्थापना दिवस मना रही है. भारत के सभी धर्मों के नागरिकों ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के ज़रिए स्वतंत्रता आंदोलन में अपना योगदान दिया, परंतु हमारे नेताओं की बहुसंख्यकवादी मानसिकता और स्कूली पाठ्‌यक्रम तैयार करने वालों के संकीर्ण दृष्टिकोण के चलते भारतीय स्वाधीनता आंदोलन में अल्पसंख्यकों की भूमिका को पूरी तरह से नज़रअंदाज़ कर दिया गया है.

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कांग्रेस जुआ न खेले तो अच्छा

कांग्रेस को थोड़ी सावधानी बरतनी चाहिए. बजट सत्र के इस द्वितीय चरण में उसके सामने ख़तरा पैदा हो सकता है. महिला आरक्षण बिल राज्यसभा के बाद लोकसभा में पास होना है. श्रीमती सोनिया गांधी का स्पष्ट निर्देश है कि इसे हर हालत में पास कराना है. उन्हें वृंदा करात, सुषमा स्वराज जैसी शुभचिंतकों ने समझा दिया है कि वह इतिहास में अमर हो जाएंगी.

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पुस्‍तक अंशः मुन्‍नी मोबाइल – 16

नाव परिणामों से सब स्तब्ध थे. बुद्धिजीवी और धर्म निरपेक्ष ताक़तें सकते में थीं. वे मतदाताओं का मूड भांप नहीं पाए. सांप्रदायिक ताक़तों को हराने की उनकी सारी अवधारणाएं हवाई साबित हुईं. उनकी मान्यता थी कि गांधी का गुजरात धर्म के आधार पर नहीं बंटेगा, पर ऐसा हुआ.

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अमिताभ को अपमानित मत करो

अमिताभ बच्चन को अभी और अपमान सहने पड़ सकते हैं. एक व्यक्ति के नाते उनकी व्यथा को कोई समझना नहीं चाहता. कोई से हमारा मतलब आम जनता से नहीं, बल्कि खास लोगों से है. ये खास लोग कांग्रेस से रिश्ता रखते हैं और किसी हद तक जा सकते हैं, क्योंकि इन्हें लगता है कि इनकी हरकतों से सोनिया गांधी और राहुल गांधी खुश होकर इन्हें शाबाशी देंगे.

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मनरेगा रोजगार नहीं, धोखा है

मध्य प्रदेश में महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी योजना को लेकर सरकार भले ही बड़े-बड़े दावे करती हो, लेकिन हक़ीक़त यही है कि राज्य में कहीं भी ग्रामीण श्रमिकों को औसतन 60 दिन का काम भी नहीं मिल रहा है. जबकि क़ानूनी तौर पर श्रमिकों को कम से कम 100 दिन का रोज़गार मिलना चाहिए.

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आचार्य राममूर्ति जीवित इतिहास हैं

आचार्य राममूर्ति हमारे बीच में हैं और उसी शिद्दत के साथ हैं, जैसे 1954 में थे. 1938 में लखनऊ विश्वविद्यालय से एमए इतिहास में प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण होकर उन्होंने बनारस के क्वींस कॉलेज में अध्यापन कार्य किया. 1954 में कॉलेज की नौकरी छोड़कर वह श्री धीरेंद्र मजूमदार के आह्वान पर श्रमभारती खादीग्राम (मुंगेर, बिहार) पहुंचे, जहां उन्होंने श्रम-साधना, जीवन-शिक्षण और सादा जीवन के अभ्यास के साथ एक नए जीवन की शुरुआत की.

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हक़ीक़त है, जिन्ना में जादू था

यदि गांधी अभी जीवित होते तो 2 अक्टूबर 2009 को अपने 140वें जन्मदिन पर कहां होते? बेशक़, वह महाराष्ट्र में अनशन कर रहे होते. आख़िर क्यों? यदि आंकड़ों के मुताबिक़ देखें तो राज्य पुलिस का आम नागरिक जीवन में दख़ल पहले की अपेक्षा कहीं अधिक बढ़ा है, जो बेहद ही आक्रोशित करने वाला है.

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