जनतंत्र यात्रा 2013 – अब बदलाव ज़रूरी है

अन्ना हज़ारे की जनतंत्र यात्रा सुपर फ्लॉप हो सकती है, क्योंकि कई लोग यह मानते हैं कि हिंदुस्तान के लोगों

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जनरल की जंग जारी है

जनरल वी के सिंह भारतीय सेना के इतिहास के एक ऐसे सिपाही साबित हुए हैं, जिसने सेना में रहते हुए भी देश हित में भ्रष्टाचार के खिला़फ जंग लड़ी और सेना से रिटायर होने के बाद भी अपनी उस लड़ाई को जारी रखा. जनरल वी के सिंह जब तक सेना में रहे, वहां व्याप्त भ्रष्टाचार के खिला़फ आवाज़ उठाते रहे और पहली बार ऐसा हुआ कि सेना में बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार और अनियमितताओं के बारे में उस आम आदमी को पता चला, जिसके पैसों की खुली लूट सेना में मची हुई थी तथा अभी भी जारी है.

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पंसारी पंचायत : जिसने लोगों की ज़िंदगी बदल दी

गांव के विकास में पंचायत की महत्वपूर्ण भूमिका होती है, लेकिन अक्सर यह देखा जाता है कि पंचायतें अपनी भूमिका का निर्वहन सही तरीक़े से नहीं करती हैं, जिसके कारण लोगों के मन में यह धारणा घर कर गई है कि पंचायत के स्तर पर कुछ नहीं किया जा सकता है.

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कटनीः सजा ली चिता, अब ज़मीन लेंगे या जान देंगे

कटनी के विजय राघवगढ़ एवं बरही तहसीलों के दो गांवों डोकरिया और बुजबुजा के किसानों की दो फसली खेतिहर ज़मीनें वेलस्पन नामक कंपनी के ऊर्जा उत्पादक उद्योग हेतु अधिग्रहीत करने के संबंध में दाखिल सैकड़ों आपत्तियों एवं असहमति को शासन ने दरकिनार कर दिया.

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पाठकों के पत्र समस्या और सुझाव

शहर हो या गांव, सरकारी विभागों को लेकर हर आदमी की परेशानी एक सी होती है. कभी बिजली विभाग, कभी जल विभाग, कभी टेलीफोन विभाग. चूंकि इन सभी विभागों से आपका साबका पड़ता है और जब कोई काम समय से न हो रहा हो, तब परेशान होना स्वाभाविक है.

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इक और जहां मुमकिन है

कैमूर क्षेत्र के जनपद सोनभद्र, मिर्जापुर एवं चंदौली के दलितों-आदिवासियों ने पिछले 8 वर्षों में जंगल की खाली और बंजर पड़ी क़रीब 30,000 एकड़ ज़मीन पर दोबारा अपना दख़ल क़ायम करते हुए 25 से ज़्यादा नए गांव बसाकर एक नया इतिहास रचने का काम कर दिया है.

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उत्तर प्रदेश: हर तरफ पानी ही पानी

बाढ़ और पानी से शहरी जनता हलकान है, वहीं किसान परेशान. किसी के खेत पानी में डूब गए हैं तो किसी का घर-मकान और राशन-पानी बाढ़ लील गई. क़रीब 24 ज़िले बाढ़ से प्रभावित हैं. लोग छतों पर तिरपाल लगाकर, स्कूलों के बरामदों में, कुछ नहीं तो खुले में ही जीवनयापन कर रहे हैं.

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राहुल जी, गांव में आपने क्या सीखा

बापू जब मोहनदास करमचंद गांधी थे, नौजवान वकील थे और दक्षिण अफ्रीका में वकालत करने गए तो उनके साथ एक हादसा हुआ. गोरों ने उन्हें प्रथम श्रेणी में बैठने के लायक़ नहीं समझा और ज़बरदस्ती गाड़ी से धक्का देकर बाहर फेंक दिया. जब वह हिंदुस्तान वापस आए, उनके मन में हिंदुस्तान में कुछ काम करने की इच्छा जागी.

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जम्‍मू-कश्‍मीरः पंचायत चुनाव ने उम्‍मीद जगाई

हाल में जम्मू-कश्मीर में संपन्न हुए पंचायत चुनाव से राज्य में एक नई बयार देखने को मिली. बड़ी तादाद में घरों से निकल कर लोगों ने मतदान करके न स़िर्फ लोकतंत्र में अपनी आस्था व्यक्त की, बल्कि चुनाव बहिष्कार करने वालों को स्पष्ट संकेत भी दे दिया.

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कोस्का: खुद खोज ली जीवन की राह

देश भर के जंगली क्षेत्रों में स्व:शासन और वर्चस्व के सवाल पर वनवासियों और वन विभाग में छिड़ी जंग के बीच उड़ीसा में एक ऐसा गांव भी है, जिसने अपने हज़ारों हेक्टेयर जंगल को आबाद करके न स़िर्फ पर्यावरण और आजीविका को नई ज़िंदगी दी है, बल्कि वन विभाग और वन वैज्ञानिकों को चुनौती देकर सरकारों के सामने एक नज़ीर पेश की है.

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सूरमा देश का पहला वनग्राम बनाः अब बाघ और इंसान साथ रहेंगे

उत्तर प्रदेश के खीरी ज़िले का सूरमा वनग्राम देश का ऐसा पहला वनग्राम बन गया है, जिसके बाशिंदे थारू आदिवासियों ने पर्यावरण बचाने की जंग अभिजात्य वर्ग द्वारा स्थापित मानकों और अंग्रेज़ों द्वारा स्थापित वन विभाग से जीत ली है. बड़े शहरों में रहने वाले पर्यावरणविदों, वन्यजीव प्रेमियों, अभिजात्य वर्ग और वन विभाग का मानना है कि आदिवासियों के रहने से जंगलों का विनाश होता है, इसलिए उन्हें बेदख़ल कर दिया जाना चाहिए.

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घटता पानी, बढ़ती प्यास

बेतवा, शहजाद, केन, धसान, मंदाकिनी, यमुना, जामनी, एवं सजनाम जैसी सदा नीरा नदियां होने के बावजूद पानी के लिए तरस रहे लोगों के दर्द को समझना बड़ा कठिन है. बुंदेलखंड में जल युद्ध होने से कोई रोक नहीं सकता.

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इज्जत की जमींदारी

शादी के ग्यारह साल बाद ससुराल जाने का मौक़ा मिला. लंबा अंतराल इस वजह से कि ससुराल के सब लोग बिहार के ऐतिहासिक शहर गया में बस गए थे. शादी भी वहीं से हुई और जब भी जाना हुआ गया ही गया. पत्नी के पैतृक गांव यानी अपनी असली ससुराल जाने का अवसर, जैसा कि ऊपर बता चुका हूं, शादी के ग्यारह साल बाद मिला.

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कुटुंबक्‍कमः एक गांव, जो विकास का मॉडल है

वर्ष 1857 के आंदोलन को अंग्रेजों ने किसी तरह दबा तो दिया, लेकिन यह बात उनकी समझ से बाहर थी कि आख़िर यह सब हुआ कैसे. यह आंदोलन कैसे हुआ, कैसे इतना फैला और किसी को इसकी भनक तक नहीं लगी. ये सारी बातें समझने के लिए अंग्रेजों ने एक आयोग बनाया, जिसकी अध्यक्षता सर ए ओ ह्यूम को सौंपी गई.

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गंगादेवी पल्‍ली में बही विकास की गंगा

आंध्र प्रदेश के वारंगल ज़िले की मचापुर ग्राम पंचायत का एक छोटा सा क्षेत्र था गंगादेवी पल्ली. ग्राम पंचायत से दूर और अलग होने के चलते विकास की हवा या कोई सरकारी योजना यहां के लोगों तक कभी नहीं पहुंची. बहुत सी चीजें बदल सकती थीं, लेकिन नहीं बदलीं, क्योंकि लोग प्रतीक्षा कर रहे थे कि कोई आएगा और उनकी ज़िंदगी संवारेगा, बदलाव की नई हवा लाएगा.

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आदिवासी महिलाओं ने बदली गांव की तस्‍वीर

आदिवासी समुदाय के हौसले को तो हमेशा ही सराहा जाता रहा है. एक बार फिर से उन्होंने कुछ ऐसा कर दिखाया है, जो काबिले तारी़फ है. हम बात कर रहे हैं मिर्जापुर ज़िले की आदिवासी महिलाओं की. जी हां मिर्जापुर ज़िले के लालगंज क्षेत्र की आदिवासी महिलाओं ने अपनी मेहनत और लगन से इस गांव की तस्वीर बदल दी है.

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गांव से सबक लें शहरवाले

एक समय था जब भारत को गांवों को देश कहा जाता था. किसान और ज़मीन से ही देश की अर्थव्यवस्था जुड़ी हुई थी. लेकिन समय बदला और शहरों के विकास की आंधी में गांव कहीं पीछे छूट गए. कहा जाने लगा कि शहर के लोग गांव के लोगों से हर हाल में बेहतर हैं. लेकिन नोएडा से लिए गए आंकड़े कुछ और ही कहानी बयां करते हैं.

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नदी के कटान से किसान हुए बेघर

पूर्वी उत्तर प्रदेश के बहराईच ज़िले के कई गांव ऐसे हैं जहां नदी के कटान से कई घर उजड़ जाते हैं. यह स्थिति वहां के गांवों के हर घर की है. इस स्थिति में गांव वाले अपना सामान समेट कर किसी अन्य स्थान पर चले जाते हैं. नदी के तेजी से होते कटान में जिन परिवारों का घर आ रहा होता है वे स्वयं अपने घर को उजा़डते जिसे कभी मेहनत करके उन्होंने बनाया था.

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मुस्‍कराएं, आप बख्‍तावरपुरा में हैं

ग्रामसभाओं की निष्क्रियता के कारण सरकारी पंचायतों में काफी भ्रष्टाचार है. ग्रामसभा के नाम पर कुछ लोगों के हस्ताक्षर करा लिए जाते हैं और खानापूर्ति हो जाती है. वास्तविक ग्रामसभा बैठती ही नहीं है. लेकिन देश के कुछ ऐसे गांव हैं, जो इस स्थिति को बदलने की कोशिश में लगे हुए हैं.

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सोड़ा गांवः फिर से सजने लगी चौपाल

भारत में लोकतंत्र का अर्थ लोक नियुक्त तंत्र बना दिया गया है, जबकि इसे लोक नियंत्रित तंत्र होना चाहिए था. संविधान द्वारा तंत्र संरक्षक की भूमिका में स्थापित है, जबकि उसे प्रबंधक की भूमिका में होना चाहिए था. ज़ाहिर है, संरक्षक लगातार शक्तिशाली होता चला गया और धीरे-धीरे समाज को ग़ुलाम समझने लगा.

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गोपालपुरा: सामूहिक निर्णय प्रक्रिया से बदली तस्वीर

राज्य कभी नहीं चाहता कि समाज एकजुट, मज़बूत और आर्थिक रूप से संपन्न हो. वह हमेशा चाहता है कि समाज बंटा रहे, टूटा रहे, इस पर आश्रित रहे और गुलाम मानसिकता में जीना सीख ले. यहां तक कि गुलामी के दिनों में भी समाज के मामलों में राज्य का इतना हस्तक्षेप नहीं था, जितना स्वतंत्रता के बाद लोकतांत्रिक भारत में बढ़ता चला गया.

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अजब-ग़ज़ब गांव

यह दिलचस्प कहानी उत्तर प्रदेश के कुशीनगर ज़िले की है, जहां का मुंडेरा गांव अजीब प्रथा या अंधविश्वास के चलते एक दिन पूरी तरह खाली हो जाता है, दिन निकलने से पहले सारे लोग गांव की सीमा से बाहर चले जाते हैं और दिन ढलने के बाद वापस लौटते हैं. इस दौरान घरों में ताले भी नहीं लगाए जाते. हर तीसरे साल जेठ महीने के शुक्ल पक्ष के शुक्रवार या सोमवार को इस अजीब परंपरा को निभाया जाता है.

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सांप और आदमी साथ-साथ रहते हैं

सांप एक ऐसा जानवर है जिसका नाम सुनकर ही लोगों के रोंगटे खड़े हो जाते हैं, जिसे अनायास देखकर लोगों के मुंह से अक्सर चीख निकल जाती है. मगर, एक ऐसा गांव भी है जहां के निवासी इसी सांप के साथ रहते हैं. यह प़ढकर आप सोच में पड़ जाएंगे,

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सार-संक्षेप : रीवा में फिर बसेगा स़फेद बाघ

दुनिया में स़फेद बाघ, रीवा की ही देन है, लेकिन मध्य प्रदेश के वन्यप्राणी संरक्षण और वन प्रबंधन कार्यक्रमों की खामियों के कारण अब सफेद बाघ अपनी जन्मभूमि में ही अस्तित्वहीन हो चुका हैं, लेकिन चार दशक बाद अब एक बार फिर सफेद बाघ को रीवा में बसाने के लिए भारत सरकार और राज्य सरकार तैयारी कर रही हैं.

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