लाजवाब फनकार गुलज़ार

गीतकार, निर्देशक एवं पटकथा लेखक गुलज़ार को फिल्म जगत के सर्वोच्च सम्मान दादा साहब फाल्के अवॉर्ड-2013 के लिए चुना गया

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कामयाब कलाकार नायब इंसान

जगजीत सिंह उस शख्सियत का नाम है, जिसने ग़म में भी मुस्कराना सिखाया. वह एक मिशाल थे कि किस तरह

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एक असाधारण सृजनशील कलाकार रबीन्द्रनाथ ठाकुर

साहित्यकार अपनी लेखनी के ज़रिए समाज को नई दिशा देता है. लेकिन अ़फसोस की बात यह है कि हमारे देश

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अ़खबारों से ग़ायब होता साहित्य

साहित्य समाज का आईना होता है. जिस समाज में जो घटता है, वही उस समाज के साहित्य में दिखलाई देता है. साहित्य के ज़रिये ही लोगों को समाज की उस सच्चाई का पता चलता है, जिसका अनुभव उसे खुद नहीं हुआ है. साथ ही उस समाज की संस्कृति और सभ्यता का भी पता चलता है. जिस समाज का साहित्य जितना ज़्यादा उत्कृष्ट होगा, वह समाज उतना ही ज़्यादा सुसंस्कृत और समृद्ध होगा.

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ये इल्म का सौदा, ये रिसाले, ये किताबें

बीसवीं सदी के मशहूर शायरों में जां निसार अख्तर को शुमार किया जाता है. उनका जन्म 14 फरवरी, 1914 को मध्य प्रदेश के ग्वालियर में एक सुन्नी मुस्लिम परिवार में हुआ. उनके पिता मुज़्तर खैराबादी मशहूर शायर थे. उनके दादा फज़ले-हक़ खैराबादी मशहूर इस्लामी विद्वान थे. जां निसार अख्तर ने ग्वालियर के विक्टोरिया हाई स्कूल से दसवीं पास की. इसके बाद आगे की प़ढाई के लिए वह अलीग़ढ चले गए, जहां उन्होंने अलीग़ढ मुस्लिम विश्वविद्यालय से एमए की डिग्री हासिल की.

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दिल ढूंढता है फिर वही फुर्सत के रात-दिन

भारतीय सिनेमा में कई ऐसी हस्तियां हुई हैं, जिन्होंने विभिन्न क्षेत्रों में अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया है. इन्हीं में से एक हैं गुलज़ार. गीतकार से लेकर, पटकथा लेखन, संवाद लेखन और फिल्म निर्देशन तक के अपने लंबे स़फर में उन्होंने शानदार कामयाबी हासिल की. मृदुभाषी और सादगी पसंद गुलज़ार का व्यक्तित्व उनके लेखन में सा़फ झलकता है. आज वह जिस मुक़ाम पर हैं, उस तक पहुंचने के लिए उन्हें संघर्ष के कई प़डावों को पार करना प़डा.

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पप्पू कांट डांस साला

फिल्म जाने तू या जाने ना का एक गीत पप्पू कांट डांस साला काफी हिट हुआ. इसी मुखड़े पर सौरभ शुक्ला ने एक फिल्म बनाई है. सौरभ शुक्ला न केवल उम्दा कलाकार, बल्कि बेहतरीन निर्देशक, संवाद लेखक, स्क्रिप्ट राइटर एवं गीतकार हैं.

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रहें न रहें हम, महका करेंगे…

मशहूर शायर एवं गीतकार मजरूह सुल्तानपुरी का असली नाम असरारुल हसन खान था. उनका जन्म एक अक्टूबर, 1919 को उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर जनपद में हुआ था. उनके पिता पुलिस विभाग में उपनिरीक्षक थे. मजरूह ने दरसे-निज़ामी का कोर्स किया. इसके बाद उन्होंने लखनऊ के तकमील उल तिब कॉलेज से यूनानी पद्धति की डॉक्टरी की डिग्री हासिल की.

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पुण्यतिथि पर विशेष : ऐसे थे इ़कबाल

जब मैं नहीं रहूंगा तो लोग मेरी कविताएं प़ढेंगे, उसे समझेंगे और फिर कहेंगे, खुद को पहचान कर उसने दुनिया को बदल दिया. यह कहना था मोहम्मद इ़कबाल का. 9 दिसंबर, 1877 को अविभाजित भारत में सियालकोट के एक कश्मीरी परिवार में पैदा हुए इ़कबाल बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे.

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स्मृति शेष: गुलशन बावरा : मेरे देश की धरती सोना…

वर्ष 1973 में आई फिल्म जंजीर का वह दृश्य याद कीजिए, जिसमें एक जोशीला नौजवान पुलिस इंस्पेक्टर (अमिताभ बच्चन) सड़क हादसे में स्कूली बच्चों की मौत की गवाह एवं चाकू-छुरी में धार रखकर अपना जीवनयापन करने वाली लड़की (जया भादुड़ी) को अपने घर में शरण देता है.

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