गांवों की पुरातन व्यवस्था

गांधी जी ने दक्षिण अफ्रीका से लौटकर भारत का वर्ष भर दौरा किया. भारत के ग्रामीणों की दुर्दशा देखी. उनके

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मणिपुर जमीन की एक लड़ाई यहां भी

क्या पूर्वोत्तर को तभी याद किया जाएगा, जब कोई सांप्रदायिक हिंसा होगी, जब लोगों का खून पानी बनकर बहेगा? या तब भी उनके संघर्ष को वह जगह मिलेगी, उनकी आवाज़ सुनी-सुनाई जाएगी, जब वे अपने जल, जंगल एवं ज़मीन की लड़ाई के लिए शांतिपूर्ण तरीक़े से विरोध करेंगे? मणिपुर में तेल उत्खनन के मसले पर जारी जनसंघर्ष की धमक आखिर तथाकथित भारतीय मीडिया में क्यों नहीं सुनाई दे रही है? एस बिजेन सिंह की खास रिपोर्ट :-

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संशोधित भूमि अधिग्रहण बिलः ग्रामीण विकास या ग्रामीण विनाश

ओडिसा के जगतसिंहपुर से लेकर हरियाणा के फतेहाबाद में ग्रामीण भूमि अधिग्रहण का विरोध कर रहे हैं. दूसरी ओर झारखंड के कांके-नग़डी में आईआईएम के निर्माण के लिए हो रहे भूमि अधिग्रहण का लोग विरोध कर रहे हैं. इस पर सरकार का कहना है कि देश को विकास पथ पर बनाए रखने के लिए भूमि अधिग्रहण आवश्यक है.

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दिल्‍ली का बाबूः ईमानदारी की सज़ा

हरियाणा कैडर के भारतीय वन सेवा के अधिकारी संजीव चतुर्वेदी को भ्रष्टाचार उजागर करने की क़ीमत चुकानी पड़ रही है. संजीव चतुर्वेदी ने पिछले साल ही केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर जाने के लिए राज्य सरकार से अनुमति मांगी थी, लेकिन हरियाणा सरकार ने उन्हें अनुमति नहीं दी, जबकि केंद्र सरकार ने हरियाणा सरकार से उन्हें अनुमति देने के लिए कहा था.

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भजनपुर के मुसलमानों को इंसाफ़ कब मिलेगा

बिहार के फारबिसगंज के भजनपुर गांव में पुलिस फायरिंग में पांच लोगों के मारे जाने की घटना को एक साल पूरा हो गया है, लेकिन हैरत की बात यह है कि अभी तक कोई कार्रवाई नहीं की गई. घटना के सूत्रधार खुलेआम घूम रहे हैं, वहीं जिन निर्दोष लोगों ने अन्याय के खिलाफ संघर्ष करते हुए अपनी जान गंवा दी, उनके परिवारीजन इंसा़फ न मिलने से दु:खी हैं.

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सरकार आदिवासियों की सुध कब लेगी

छत्तीसगढ़ को क़ुदरत ने अपार संपदा से नवाज़ा है, जिसका उपयोग यदि सही ढंग से किया जाए तो यह क्षेत्र के विकास में का़फी सहायक सिद्ध हो सकता है. इस नक्सल प्रभावित क्षेत्र में नाममात्र विकास हो पा रहा है.

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ग्रामीण विकास और महिला जनप्रतिनिधि

एक बार फिर हमेशा की तरह महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण से जुड़ा बिल ठंडे बस्ते में रहा. सरकार भी आम सहमति बनाने के मूड में नज़र नहीं आई. सभी राजनीतिक दल एक सुर में महिला अधिकारों की बात करते हैं, परंतु बिल पारित कराने के विषय पर बंटे नज़र आते हैं. कुछ राजनीतिक दल आरक्षण में आरक्षण की मांग कर रहे हैं.

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बरुआ और कोचर निदेशक बने

1985 बैच के आईआईआरएस अधिकारी नीलिमेश बरुआ को कंपनी मामलों के मंत्रालय के अंतर्गत एसएफआईओ (सीरियस फ्रॉड इंवेस्टिगेशन ऑफिस) का निदेशक बनाया गया है. वह अनुज कुमार विश्नोई की जगह लेंगे, जिन्हें रक्षा मंत्रालय के अंतर्गत एक्स सर्विसमैन वेलफेयर में अतिरिक्त सचिव बनाया गया है.

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एक सीमावर्ती गांव की असली तस्वीर

भारत को गांवों का देश कहा जाता है, क्योंकि यहां की अधिकतर आबादी आज भी गांव में ही निवास करती है, प्रकृति की गोद में जीवन बसर करती है और प्राकृतिक संसाधनों के माध्यम से जीवन के साधन जुटाती है. शहरी सुख-सुविधाओं से दूर ज़िंदगी कितनी कठिनाइयों से गुज़रती है, इसका अंदाज़ा लगाना बड़े शहरों में रहने वालों के लिए मुश्किल है.

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अशोक कुमार एएस बने

1981 बैच के आईएएस अधिकारी अशोक कुमार को रक्षा उत्पाद विभाग में अतिरिक्त सचिव बनाया गया है. वह पहले इसी विभाग में संयुक्त सचिव के पद पर काम कर रहे थे.

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सुरेश पांडा अतिरिक्त सचिव बने

1981 बैच के आईएएस अधिकारी सुरेश चंद्र पांडा को गृह मंत्रालय में अतिरिक्त सचिव एवं एफए बनाया गया है. वह विश्वपति त्रिवेदी की जगह लेंगे, जिन्हें खनिज मंत्रालय में सचिव बनाया गया है.

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मिर्गी के साइड इफेक्ट

अज्ञानता, अंधविश्वास और जागरूकता न होना मिर्गी रोग के बढ़ने का सबसे बड़ा कारण है, जिसके चलते आज विश्व में लगभग सात करोड़ और भारत में एक करोड़ 20 लाख लोग इस रोग से पीड़ित हैं.

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आरटीआई, मनरेगा और जॉब कार्ड

ग्रामीण क्षेत्र में रोज़गार पैदा करने के लिए सरकार ने अपनी महत्वाकांक्षी योजना मनरेगा को सफल बनाने के लिए हज़ारों करो़ड रुपये खर्च करने की योजना बनाई. यह योजना गांवों तक पहुंची भी, लेकिन हर योजना की तरह मनरेगा भी भ्रष्टाचार का शिकार हो गई.

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एनआईआरडी को डीजी की तलाश

राष्ट्रीय ग्रामीण विकास संस्थान हैदराबाद में नए महानिदेशक की नियुक्ति होने वाली है. निवर्तमान महानिदेशक मैथ्यू सी कुन्नूमकल के बाद इस पद पर उपयुक्त चेहरे की तलाश जारी है.

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आईडीबीआई बैंक लिमिटेडः वित्तीय समावेशन की अनोखी पहल

पिछले दशक के दौरान भारत ने दुनिया में तेज़ी से बढ़ती हुई अर्थव्यवस्थाओं में ख़ुद को स्थापित किया है. ऐसे ही समय में वहां उच्च विकास दर की स्थिरता के बारे में एक नई बहस की शुरुआत भी हुई है. इस बहस में अमीरों और ग़रीबों के बीच बढ़ती खाई के बारे में एक रिपोर्ट भी जारी की गई है. दरअसल, विकास के मामले में भारत नए प्रतिमान स्थापित कर रहा है. देश हर क्षेत्र में आशातीत लक्ष्य हासिल कर रहा है.

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जज्बे को सलाम

राजधानी दिल्ली के नज़दीक ग्रामीणों ने ख़ुद पैसे एकत्र करके एक रेलवे स्टेशन बनाया है. सीमावर्ती गुड़गांव इलाक़े के गांव ताजनगर और आसपास के लोगों ने दो प्लेटफ़ॉर्म के निर्माण के लिए 20,80,786 रुपये का चंदा इकट्ठा किया. पूरा काम ख़त्म होने में सात महीने लगे.

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जनता बदलाव चाहती है

सत्ता की राजनीति में आरोप-प्रत्यारोप एक आम बात है, लेकिन जब समय चुनाव का हो तो इनकी अहमियत भी बढ़ जाती है. यही आरोप चुनावी मुद्दे तक बन जाते हैं. मसलन, पश्चिम बंगाल में चुनाव का शंखनाद हो चुका है और विपक्ष यानी तृणमूल कांग्रेस वामपंथी शासन की जमकर बखिया उधेड़ने में जुटी हुई है.

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क्‍या यही ग्राम स्‍वराज है?

मैं घूमने के लिए कई बार यहां-वहां जाती रहती हूं. कभी बड़े शहरों में तो कभी छोटे शहरों में और कई बार उत्तराखंड के पिछड़े ग्रामीण क्षेत्रों में भी. वैसे तो गांवों में भी अब बदलाव आने लगे हैं, पर कहने में संकोच नहीं होता कि ज़्यादातर बदलावों का परिणाम उल्टा ही हुआ है.

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खाद्य प्रसंस्‍करण उद्योग और ग्रामीण आत्‍मनिर्भरता

भारत गांवों का देश है, जिसकी अर्थव्यवस्था का मूल आधार कृषि को माना जाता है, लेकिन विडंबना यह है कि एक ओर जहां किसानों को बेहतर उत्पादन होने पर भी फसल की कम क़ीमत मिलती है, वहीं दूसरी तऱफ कम उत्पादन होने पर भी उन्हें घाटे का सामना करना पड़ता है.

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मनरेगा, जो मन में आए करो!

उत्तर प्रदेश में महात्मा गांधी राष्ट्रीय रोज़गार योजना (मनरेगा) ग़रीबों के लिए केंद्र सरकार की खास योजना है. लेकिन अधिकारियों ने इसे अपनी तरह से चलाने की मनमानी शुरू कर दी है. इस समय प्रदेश के अधिकारियों और कर्मचारियों के मन में जो आ रहा है वही, इस योजना के लिए भेजे गए फंड के साथ किया जा रहा है.

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कोटवारों को इंसाफ कब मिलेगा

कोटवार एक ऐसा शब्द जो दूर दराज में रहने वाले ग्रामीणों और प्रशासन के बीच सेतु का काम करता है. सालों से ग्रामीण प्रशासनिक सेवा में लगे ये लोग कोटवार कहे जाते हैं.

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मनरेगा मुर्दों ने की मजदूरी

प्रदेश में भ्रष्टाचार के नित नए कीर्तिमान कायम किए जा रहे हैं. महात्मा गांधी के नाम वाली राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी योजना तो सरकारी अमले के लिए अवैध कमाई की गंगा बन चुकी है. आए दिन कोई न कोई ऐसा उदाहरण सुनने या देखनों को मिल ही जाता है जब इस योजना का दुरूपयोग होता रहता है.

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मनरेगा रोजगार नहीं, धोखा है

मध्य प्रदेश में महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी योजना को लेकर सरकार भले ही बड़े-बड़े दावे करती हो, लेकिन हक़ीक़त यही है कि राज्य में कहीं भी ग्रामीण श्रमिकों को औसतन 60 दिन का काम भी नहीं मिल रहा है. जबकि क़ानूनी तौर पर श्रमिकों को कम से कम 100 दिन का रोज़गार मिलना चाहिए.

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बनते ही उखड़ती हैं सड़कें

मध्य प्रदेश में सड़कें बनने के तुरंत बाद टूटने लगती हैं. यह सिलसिला कांग्रेस और भाजपा, दोनों की सरकारों के दौरान बदस्तूर जारी है. इसका एक बड़ा कारण सरकारी निर्माण कार्यों में भ्रष्टाचार और घपले- घोटाले हैं जिसके कारण निर्माण के गुणवत्ता पर ध्यान नहीं दिया जाता है. आरोप है कि अधिकारी केवल सरकारी पैसे खर्च करने और जल्दी-जल्दी निर्माण कार्य पूरा करने पर ही ध्यान देते हैं.

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दर्द से कराहती ज़िंदगी दूषित पानी से विकलांग होते ग्रामीण

यूनीसेफ की सर्वेक्षण रिपोर्ट के मुताबिक़ पूरे भारत वर्ष के 20 राज्य के ग्रामीण अंचलों मे रहने वाले लाखों लोग फ्लोराइड युक्त पानी के सेवन से फ्लोरोसिस के शिकार हैं. सर्वाधिक प्रभावित राज्यों मे आंध्रप्रदेश, गुजरात एवं राजस्थान है, जहां 70 से 100 प्रतिशत ज़िले फ्लोरोसिस से प्रभावित हैं, जबकि बिहार, दिल्ली, हरियाणा, झारखंड कर्नाटक, महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, उड़ीसा, तमिलनाडु एवं उत्तरप्रदेश में फ्लोरोसिस प्रभावित जिले 40 से 70 प्रतिशत हैं.

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कुटीर उद्योगों को बढ़ावा देने की योजना फ्लॉप

ग्रामीण क्षेत्रों में कुटीर उद्योगों को बढ़ावा देने की योजनाएं सतना ज़िले में फ्लॉप शो साबित हुई हैं. कुटीर उद्योगों को बढ़ावा देने के उद्देश्य से मध्य प्रदेश शासन ने ग्रामोद्योग हथकरघा विभाग के अंतर्गत कुटीर ग्रामोद्योग योजना प्रारंभ की थी. इस योजना के तहत 30 लोगों का एक समूह बनाकर छोटे-छोटे उद्योग स्थापित कराने की मंशा सरकार की थी.

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