दि अटैक ऑफ 26/11

काफ़ी समय से रामगोपाल वर्मा की फिल्में एक के बाद एक पिट रही हैं. अब मुंबई के आतंकवादी हमले पर

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प्रजातंत्र बना लाठीतंत्र

एक बार लखनऊ में मुख्यमंत्री कार्यालय के बाहर जबरदस्त प्रदर्शन हुआ. प्रदर्शनकारी पूर्वांचल के अलग-अलग शहरों से लखनऊ पहुंचे थे, उनकी संख्या क़रीब 1500 रही होगी, उनमें किसान, मज़दूर एवं छात्रनेता भी थे, जो अपने भाषणों में मुख्यमंत्री के ख़िलाफ़ आग उगल रहे थे. वे सब अपने भाषणों में सीधे मुख्यमंत्री पर निशाना साध रहे थे. उस प्रदर्शन का नेतृत्व समाजवादी नेता चंद्रशेखर कर रहे थे.

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प्रधानमंत्री के नाम अन्ना की चिट्ठी

सेवा में,

श्रीमान् डॉ. मनमोहन सिंह जी,

प्रधानमंत्री, भारत सरकार, नई दिल्ली.

विषय : गैंगरेप-मानवता को कलंकित करने वाली शर्मनाक घटना घटी और देश की जनता का आक्रोश सड़कों पर उतर आया. ऐसे हालात में आम जनता का क्या दोष है?

महोदय,

गैंगरेप की घटना से देशवासियों की गर्दन शर्म से झुक गई.

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मारुति, मजदूर और तालाबंदी : कामगारों की अनदेखी महंगी पड़ेगी

मज़दूरों की गहमागहमी और मशीनों की घरघराहट से गुलज़ार रहने वाले मानेसर (गुड़गांव) के मारुति सुजुकी प्लांट में इन दिनों सन्नाटा पसरा हुआ है. प्लांट के भीतर मशीनें बंद हैं और काम ठप पड़ा है. पिछले महीने मारुति सुजुकी प्रबंधन और मज़दूरों के बीच हुए विवाद में कंपनी के एचआर हेड की मौत हो जाने के बाद हिंसा भड़क उठी. दोनों पक्षों के बीच हुई मारपीट में कई दर्जन लोग घायल हो गए.

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असम : क्‍यों भड़की नफरत की आग

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का संसदीय क्षेत्र असम एक के बाद एक, कई घटनाओं के चलते इन दिनों लगातार सुर्खियों में है. महिला विधायक की सरेआम पिटाई, एक लड़की के साथ छेड़खानी और अब दो समुदायों के बीच हिंसा. कई दिनों तक लोग मरते रहे, घर जलते रहे. राज्य के मुख्यमंत्री केंद्र सरकार का मुंह ताकते रहे और हिंसा की चपेट में आए लोग उनकी तऱफ, लेकिन सेना के हाथ बंधे थे.

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एक दिन जिसने ओलंपिक की तस्‍वीर बदल दी

म्‍युनिख में 1972 में हुए ओलंपिक खेलों के दौरान छह फिलीस्तीनी आतंकवादी खेलगांव में घुस गए थे. इस दौरान उन्होंने इजराइल के दो खिलाड़ियों की हत्या कर दी थी और 9 खिलाड़ियों को बंधक बना लिया था. इस घटना को फिलीस्तीन के ब्लैक सितंबर नाम के संगठन ने अंजाम दिया था. यह पहला मौक़ा था, जब आतंकवादियों ने किसी अंतरराष्ट्रीय खेल स्पर्धा को अपना निशाना बनाया था.

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राजस्‍थान में मौत का पुल

न जांच, न कोई बातचीत सबसे पहले क्लीनचिट. लगता है सरकार ने ग़रीबों की लाशों पर भी निजी कंपनियों को फायदा पहुंचाने की नीति बना ली है. जब भी विवाद अमीर और ग़रीब के बीच का होता है, तो पूरी सत्ता अमीर के साथ खड़ी हो जाती है. ग़रीब मरते हैं तो सरकार को अ़फसोस नहीं होता. उसकी सुध लेने वाला कोई नहीं होता. एक निर्माणाधीन पुल ताश के पत्तों की तरह गिर जाता है. सौ से ज़्यादा लोग इसकी चपेट में आ जाते हैं. जांच का आदेश दे दिया जाता है, लेकिन जांच रिपोर्ट आने से पहले ही पुल बनाने वाली कंपनियों को देश के आलाधिकारी क्लीन चिट दे देते हैं.

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सच का सिपाही मारा गया

सच जीतता ज़रूर है, लेकिन कई बार इसकी क़ीमत जान देकर चुकानी पड़ती है. सत्येंद्र दुबे, मंजूनाथ, यशवंत सोणावने एवं नरेंद्र सिंह जैसे सरकारी अधिकारियों की हत्याएं उदाहरण भर हैं. इस फेहरिस्त में एक और नाम जुड़ गया है इंजीनियर संदीप सिंह का. संदीप एचसीसी (हिंदुस्तान कंस्ट्रक्शन कंपनी) में हो रहे घोटाले को उजागर करना चाहते थे.

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झारखंडः कोड़ा प्रकरण पर सियासत गरमाई

झारखंड के बिरसा मुंडा केंद्रीय कारागार में राज्य के पूर्व मंत्री मधु को़डा के साथ हुए हादसे के बाद सूबे में राजनीतिक हलचल तेज़ हो गई है. कभी अपने विधायकों का समर्थन देकर को़डा को मुख्यमंत्री का ताज पहनाने वाली कांग्रेस का भी पुराना को़डा प्रेम जाग उठा. बस फिर क्या था, को़डा प्रकरण पर राज्य के कांग्रेसी नेता सत्तासीन सरकार की खिंचाई करते नज़र आए.

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एक आदर्श लोकपाल बिल चाहिए

कई महीनों से भ्रष्टाचार समाप्त करने के लिए कड़े क़दम उठाने की आवश्यकता बड़ी शिद्दत से महसूस की जा रही है. यूं तो भ्रष्टाचार कोई नई घटना नहीं है, लेकिन 1991 के बाद जबसे नई आर्थिक नीति लागू हुई है, भ्रष्टाचार का स्तर का़फी बढ़ गया है, जिसे बर्दाश्त करना मुश्किल हो रहा है.

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ऐसे मारो घूस को घूंसा

घूसखोरी के बारे में कहा जाता है कि यह कैंसर जैसी लाइलाज बीमारी है. भ्रष्टाचार और घूसखोरी जैसा शब्द सुनकर अब किसी को आश्चर्य नहीं होता, क्योंकि यह हमारे समाज में शायद रोज ही घटित होने वाली एक घटना बन चुकी है.

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सुलगता लंदन और पुलिस की भूमिका

ब्रिटेन की राजधानी लंदन के कई शहरों में पिछले दिनों हुए दंगे बेहद दुखद नज़ारे बयां कर रहे थे. आश्चर्य की बात यह है कि मैंने दो हफ्ते पहले ही लंदन छोड़ दिया था. भीषण गर्मी से बचने के लिए हम सभी लंदन में शानदार मौसम का लुत्फ़ ले रहे थे. लंदन में हिंसा उस समय भड़की है, जब वहां ओलंपिक शुरू होने में महज एक साल का वक्त रह गया है. हालांकि लंदन पुलिस पर आरोप है कि उसकी गोलीबारी में मार्क दुग्गन नामक एक ब्रिटिश युवक की मौत हो गई.

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नार्वेः मौत का तांडव

विश्व के बेहद शांतिप्रिय देशों में शुमार नार्वे के लोगों को 22 जुलाई का दिन हमेशा याद रहेगा. यह नार्वे के लिए एक काला दिन था. द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद देश को पहली बार इतनी बड़ी त्रासदी का सामना करना पड़ा. इस दिन प्रधानमंत्री कार्यालय से महज़ कुछ दूर स्थित एक सरकारी भवन के पास एक ज़ोरदार बम धमाका हुआ. यह बम एक कार में रखा हुआ था.

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सरकार चुप क्यों है

26 नवंबर, 2008 की त्रासदी को मुंबई के लोग अभी भूल भी नहीं पाए थे कि 13 जुलाई, 2011 को फिर से दिल दहला देने वाली घटना घट गई. महाराष्ट्र में कांग्रेस की सरकार है, इसलिए कौन वहां की क़ानून व्यवस्था की स्थिति की आलोचना कर सकता है. बिना किसी सरकारी सहायता के मुंबई वालों को इस विपत्ति से उबरने में अपनी चिरपरिचित योग्यता का परिचय देना पड़ेगा.

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दंगों के इतिहास में हाशिमपुरा-मलियाना

भारतीय राजनीति में भ्रष्ट और पाक-साफ़ में फर्क़ नहीं है. भारत के नेताओं में मूढ़ और दूरदर्शी का फर्क़ नहीं है. भारत की सरकारों में सुशासक और कुशासक का भी फर्क़ नहीं है. फर्क़ स़िर्फ एक है और यही फर्क़ प्राथमिक है और पार्टियों को परिभाषित करता है. भाजपा सांप्रदायिक है, संघ सांप्रदायिक है और कांग्रेस, बहुजन समाज और पिछड़ी जातियों की पार्टियां और वामपंथी पार्टियां ग़ैर सांप्रदायिक.

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गठबंधन के खतरे और फायदे

शाही शादी दरअसल गंभीर राजनीतिक क्रियाकलापों से ध्यान हटाने या कहें कि मन बहलाने की एक घटना थी. जब कंजरवेटिव और लिबरल डेमोक्रेट के बीच गठबंधन के लिए समझौता चल रहा था, तब इसका परिणाम एक ऐसी औपचारिक सहमति के रूप में सामने आया, जिसके आधार पर उनकी सारी नीतियां निर्धारित होने वाली थीं.

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निशाने पर खिलाडी़

यह बिल्कुल वैसा है कि मंदिरों के नाम पर देश भर में दंगे होते हैं और भगवान को सच्चे मन से मानने वाला कोई नहीं मिलता. सब उनका नाम अपने-अपने स्वार्थ सिद्ध करने के लिए इस्तेमाल करते हैं. तीज-त्योहारों पर उनके नाम का हल्ला शुरू कर देते हैं. ऐसा ही कुछ हमारे देश में खेल प्रतिभाओं के साथ हो रहा है. हमारे देश में खेल को किसी धर्म से कम नहीं आंका जा सकता है.

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संडीला गैस कांडः गैस नहीं थी, वर्ना भोपाल बन जाता

संडीला के औद्योगिक क्षेत्र में ब्रिक फील्ड में हुई गैस के रिसाव के कारण कई लोगों की जान चली गई तो कई घायल हो गए. यह घटना भी दिसंबर 1984 में घटित भोपाल गैस त्रासदी के बराबर ही थी, जिसमें हज़ारों लोगों की जान चली गई थी.

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आप भी देखते हैं भविष्य!

अभी तक स़िर्फ कहानियों एवं फिल्मों में ही इसे सुना-देखा जाता रहा है कि लोगों के अंदर भविष्य देखने की क्षमता होती है, पर हक़ीक़त में ऐसा होता शायद ही किसी ने देखा हो. हालांकि इस बारे में लंबी बहस हो सकती है और इसे वैज्ञानिक दृष्टिकोण से खारिज भी किया जा सकता है.

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विकीलीक्‍स और कूटनीति

कूटनीति का कारोबार वैसे ही काफी संवेदनशील होता है और जब निजी एवं गोपनीय संवाद सार्वजनिक होने लगे तो यह और भी ज़्यादा मुश्किलें पैदा करता है. लेकिन विकीलीक्स द्वारा गोपनीय दस्तावेजों को लीक करने की ताजा घटना में जो चीज सबसे ज़्यादा ध्यान खींचती है और भरोसा भी दिलाती है, वह यह कि इसमें दस्तावेजों के साथ कोई चालबाज़ी नहीं की गई है.

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कोई सुरक्षित नहीं

उत्तर प्रदेश में आम आदमी के साथ मंत्री, सांसद, विधायक और सरकारी अधिकारी-कर्मचारी भी सुरक्षित नहीं हैं. आपराधिक घटनाओं के सरकारी आंकड़े भी इस बात की गवाही देते हैं. एक जनवरी, 2010 से 30 सितंबर, 2010 के दौरान नौ माह में प्रदेश में 3123 लोगों की हत्या कर दी गई.

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मीडिया की भूमिका को समझे सरकार

सियालकोट में हुई नरसंहार की घटना अपने नागरिकों को सुरक्षा उपलब्ध कराने में पाकिस्तान सरकार की असफलता का सबसे बड़ा उदाहरण है. भीड़ द्वारा पीट-पीट कर मार डालने के वीभत्स दृश्य हमारे टेलीविज़न स्क्रीन से भले दूर हो गए हैं, लेकिन दु:स्वप्न का सिलसिला अभी रुका नहीं है.

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पाकिस्‍तानः यह कैसा मुल्‍क है!

17 वर्षीय ह़फीज़ मुगीस और 15 वर्षीय मुनीब को बीते 15 अगस्त को गुस्साई भीड़ ने सियालकोट में मार डाला. उन पर डकैती और लूटमार का आरोप था. अगले दिन तक़रीबन हर न्यूज़ चैनल पर यह ख़बर सुर्ख़ियों में बनी रही. इस घटना को तात्कालिक न्याय के उदाहरण के रूप में देखा जा सकता है, लेकिन यह वास्तविकता नहीं है और न ही यह आम लोगों द्वारा तात्कालिक न्याय का एक उदाहरण भर है.

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संघ पर आखिर निर्णायक कार्रवाई कब?

हिंदुस्तानी अवाम को बरसों से सभ्यता और संस्कृति का पाठ पढ़ाने का दावा करने वाले संघ का असली चेहरा एक बार फिर सारे मुल्क के सामने उजागर हुआ है. अभी हाल ही में एक अंग्रेज़ी दैनिक के स्टिंग ऑपरेशन में संघ से मुताल्लिक जो सच्चाइयां निकल कर आई हैं, वे इतनी खतरनाक हैं कि हुकूमत के होश उड़ा दें.

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उपेक्षा की आग में झुलसते अग्नि पीडि़त

पश्चिम चंपारण ज़िले में आगजनी की घटनाओं ने लगभग दस हज़ार लोगों को बेघर कर इन्हें दर-दर भटकने के लिए मजबूर कर दिया है. सरकार ने सहयोग के नाम पर मात्र बाईस सौ पचास रुपये देकर अपना पल्ला झाड़ लिया. वहीं सांसद और विधायक बिहार सरकार से पैकेज मांगने के नाम पर अपनी जिम्मेदारी का इतिश्री पूरा कर लिया है.

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बढ़ रही हैं दुष्‍कर्म की घटनाएं

सरकार बालिकाओं को संरक्षण देने और उनके सर्वांगीण विकास के लिए अनेक कार्यक्रमों पर अमल कर रही है, लेकिन यह एक कटु सत्य है कि इस राज्य में बालिकाएं सुरक्षित नहीं हैं. प्रदेश में मासूम बच्चियों के उत्पीड़न की घटनाएं तेज़ी से बढ़ रही हैं. महज़ 100 दिन में तीस नाबालिग लड़कियां दुष्कर्म की शिकार हुई हैं. इससे सा़फ है कि हर तीसरे दिन एक लड़की दरिंदों की शिकार हो रही हैं.

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देश की आधी मुठभेड़ फर्जी हैं

सोलह साल में 2560 पुलिस और कथित अपराधी मुठभेड़. और इनमें से 1224 फर्ज़ी. यानी, भारत की हरेक दूसरी मुठभेड़ फर्ज़ी है. इतना ही नहीं, इस 1224 फर्जी मुठभेड़ की लिस्ट में बाटला हाउस मुठभेड़ का नाम भी शामिल हो गया है. हालांकि इस मामले में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) ने दिल्ली पुलिस को पहले क्लीन चिट दे दी थी.

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…ताकि आतंकवादी हमले न होने पाएं

पाक़िस्तान में आतंकवाद का एक और उत्पात. लाहौर छावनी में दो धमाके और रिहायशी इलाक़ों में छिटपुट विस्फोट. इन धमाकों ने चंद लम्हों में ही दर्ज़नों मासूमों को मौत के मुंह में धकेल दिया. इसके कुछ देर बाद ही मिन्गोरा में भी धमाका हुआ और फिर से कुछ मासूम ज़िंदगियां मौत के मुंह में समा गईं.

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नगर परिषद मोतिहारी : क्यों न सिर शर्म से झुका लें

तेईस मार्च को मोतिहारी नगर परिषद की बैठक में जो शर्मनाक घटना हुई वह शहर के इतिहास का काला अध्याय बन गई. नगर सभापति, उपसभापति और कार्यपालक पदाधिकारी के पी सिंह की मौजूदगी में नगर पार्षदों ने एक दूसरे पर कुर्सियां फेंकीं एवं मारपीट की, जिसमें कई पार्षद घायल हो गए.

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भूख ने एक और आदिवासी परिवार लीला

केंद्र एवं राज्य सरकार इस बात का दावा करती रही है कि देश में भूख और तंगहाली के कारण कोई मौत नहीं होती. लेकिन मंडला ज़िले के राष्ट्रीय मानव कहे जाने वाले बैगा जनजाति के एक दंपत्ति ने पांच बच्चों के भरण पोषण और भूख से तंग आकर, अपने आप को आग के हवाले कर दिया. मौके के गवाह रहे लोगों का कहना है कि दंपत्ति ने भूख से तंग आकर अपनी जान दी.

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