किसान क़र्ज़ माफ़ी घोटाला : सच साबित हुई चौथी दुनिया की रिपोर्ट

पहले सीडब्लूजी, 2-जी, कोयला और अब सीएजी की एक और रिपोर्ट. न तो घोटालों का सिलसिला थमने का नाम ले

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किसानों की मूल समस्याओं की उपेक्षा

पिछले दिनों वर्ष 2013-14 का बजट वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने पेश किया. मीडिया से लेकर अर्थशास्त्रियों की पैनी नज़र

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रंगराजन समिति की सिफारिश किसान विरोधी

पिछले दिनों राजधानी दिल्ली में गन्ना उत्पादक किसानों ने संसद का घेराव किया. आंदोलनकारी किसानों के समर्थन में पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल वीके सिंह, हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री ओमप्रकाश चौटाला, तृणमूल कांग्रेस के सांसद सुल्तान अहमद भी खुलकर सामने आए. देश के अलग-अलग राज्यों से आए किसान जब संसद के बाहर आंदोलन कर रहे थे, उसी दिन संसद के भीतर माननीय सदस्य एफडीआई के मुद्दे पर बहस कर रहे थे.

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जन सत्‍याग्रह- 2012 अब सरकार के पास विकल्‍प नहीं है

जन सत्याग्रह मार्च ग्वालियर से 3 अक्टूबर को शुरू हुआ. योजना के मुताबिक़, क़रीब एक लाख किसान ग्वालियर से चलकर दिल्ली पहुंचने वाले थे. इस मार्च में शामिल होने वालों में सभी जाति-संप्रदाय के अदिवासी, भूमिहीन एवं ग़रीब किसान थे. ग्वालियर से आगरा की दूरी 350 किलोमीटर है. हर दिन लगभग दस से पंद्रह किलोमीटर की दूरी तय करता हुआ यह मार्च दिल्ली की तऱफ बढ़ रहा था.

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सरकार जवाब दे यह देश किसका है

हाल में देश में हुए बदलावों ने एक आधारभूत सवाल पूछने के लिए मजबूर कर दिया है. सवाल है कि आखिर यह देश किसका है? सरकार द्वारा देश के लिए बनाई गई आर्थिक नीतियां और राजनीतिक वातावरण समाज के किस वर्ग के लोगों के फायदे के लिए होनी चाहिए? लाजिमी जवाब होगा कि सरकार को हर वर्ग का ख्याल रखना चाहिए. आज भी देश के साठ प्रतिशत लोग खेती पर निर्भर हैं. मुख्य रूप से सरकारी और निजी क्षेत्र में काम कर रहा संगठित मज़दूर वर्ग भी महत्वपूर्ण है.

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अन्‍ना हजारे की नाराजगी का मतलब

अचानक ऐसी क्या बात हो गई कि टीम अन्ना और अन्ना के बीच मतभेद सामने आ गए, ऐसा क्या हो गया कि अन्ना इतने नाराज़ हो गए कि उन्होंने अरविंद केजरीवाल और टीम अन्ना के लोगों से कहा कि न तो आप मेरे नाम का और न मेरे फोटो का इस्तेमाल कर सकते हैं. इसमें दो बातें हैं. राजनीतिक दल बनाने की घोषणा जंतर-मंतर के आंदोलन के दौरान नहीं हुई थी.

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गुजरात जीतने को कांग्रेस बेकरार

इस साल के अंत में गुजरात में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं, जिसके लिए राज्य की हर राजनीतिक पार्टी कमर कस चुकी है. एक ओर जहां सत्तारूढ़ भाजपा से अलग होकर राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री केशुभाई पटेल ने गुजरात परिवर्तन पार्टी नामक अपनी अलग पार्टी बनाकर वर्तमान मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की परेशानियां बढ़ा दी हैं, वहीं कांग्रेस पार्टी भी गुजरात का गढ़ जीतने के लिए कोई कोताही नहीं बरत रही है.

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संघ नहीं चाहता भाजपा मज़बूत हो

यह हमेशा विवाद का विषय रहा है कि विधानसभा का चुनाव मुख्यमंत्री पद का प्रत्याशी घोषित करके लड़ा जाए या चुनाव के बाद मुख्यमंत्री चुना जाए. ठीक उसी तरह, जैसे लोकसभा चुनाव में कुछ पार्टियां प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार की घोषणा करके लड़ती हैं, कुछ पार्टियां ऐसा नहीं करती हैं. 2004 में भाजपा ने आडवाणी जी को प्राइम मिनिस्टर इन वेटिंग कहकर चुनाव लड़ा था, जबकि कांग्रेस ने किसी को भी अपना उम्मीदवार नहीं बनाया था.

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पश्चिम बंगालः वाममोर्चा की विदाई आसान नहीं

यह एक महज़ संयोग नहीं था कि जिस दिन बिहार विधानसभा चुनावों के परिणाम आ रहे थे, ठीक उसी दिन बंगाल की वाममोर्चा सरकार ने राज्य में पंचायतों की 50 फीसदी सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित करने का फैसला लिया. तमाम झिझक के बावजूद बांग्ला मीडिया के एक हलके में इस बात पर चर्चा हुई कि कामयाबी का बिहार मॉडल बंगाल में भी कारगर हो सकता है.

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असमः मंत्रियों की संप‍त्ति की घोषणा पर सवाल

बीती 14 जनवरी को असम सरकार ने अपनी वेबसाइट पर राज्य के सभी मंत्रियों की संपत्तियों का विवरण सार्वजनिक कर दिया. काफी समय पहले असम के मुख्यमंत्री तरुण गोगोई ने वादा किया था कि वह और उनके मंत्रिमंडल के सभी सहयोगी अपनी-अपनी संपत्ति की घोषणा करेंगे, लेकिन कई बार समय सीमा तय करने के बावजूद ऐसा नहीं हो सका.

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दिल्‍ली का बाबूः बाबू अपनी संपत्ति की घोषणा करें

वर्ष 2010 में अवैध रूप से 280 करोड़ रुपये की संपत्ति जमा करने के मामले में एक आईएएस अधिकारी का नाम आने के बाद अब लगता है कि 2011 में बाबुओं को अपनी संपत्ति की सार्वजनिक घोषणा करने के लिए कहा जा सकता है. नीतीश कुमार बिहार में यह अभियान शुरू भी कर चुके हैं और सफल होते दिख रहे हैं.

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बिहार विधानसभा चुनाव छह चरणों में: नीतीश-लालू को बोनस

बिहार विधानसभा चुनाव छह चरणों में कराने की घोषणा ने एक साथ दो सवालों को जन्म दिया. पहला यह कि क्या इतनी लंबी चुनावी प्रक्रिया नक्सलियों के मंसूबों को नाकाम करने का कदम है और दूसरा यह कि कहीं इस थकाऊ कार्यक्रम से कुछ राजनीतिक दलों को जाने-अनजाने फायदा तो नहीं मिल जाएगा?

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वायदों के भ्रमजाल में मुसलमान

बरसात के इस मौसम में बिहार के मुसलमानों के लिए नीतीश सरकार ने घोषणाओं की बारिश शुरू कर दी है. व़क्त चुनाव का है और मसला धर्मनिरपेक्ष छवि का. इस वजह से दिल और खजाना दोनों खोलने का ऐलान हो रहा है. यह सिलसिला पिछले साढ़े चार सालों से जारी है.

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मुंगेर में धरे रह गए विकास के वादे

राज्य की सुशासन सरकार अब अपने पांचवें वर्ष अर्थात चुनावी वर्ष में पहुंच चुकी है. लिहाज़ा अपने कार्यों को लेकर लोगों का विश्वास प्राप्त करने के लिए सुशासन के मुखिया नीतीश कुमार विश्वास यात्रा पर निकल पड़े हैं. साढ़ चार वर्ष के कार्यकाल में विकास की क्या रूप-रेखा बनी, सरकार की कितनी योजनाएं सरज़मीं पर उतरीं और मुख्यमंत्री की घोषणाओं पर कितना अमल हुआ.

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सरकारी घोषणाएं कहां और क्यों गुम हो जाती हैं?

आमतौर पर एक सरकार जनता की सुविधाओं के लिए कोई योजना बनाती है या उसकी घोषणा करती है और बाद की कोई सरकार आकर उस योजना को ठंडे बस्ते में डाल देती है. इसके अलावा कई मौक़ों पर (ख़ासकर किसी आपदा के व़क्त) सरकार की तऱफ से मदद की घोषणा की जाती है, लेकिन व़क्त बीतने के साथ ही वह अपना वायदा भूल जाती है.

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विकास का वादा बनाम विनाश का भय

बलूचिस्तान ऑपरेशन की शुरुआत तो ग्वाडोर परियोजना की घोषणा के साथ हुई थी, लेकिन इसकी बुनियाद रखी गई हत्या, अपहरण और दिल को दहला देने जैसी वारदातों के साथ. ग्वाडोर बंदरगाह की बात तो की गई, लेकिन वादा केवल वादा ही बनकर रह गया.

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