पहले सीडब्लूजी, 2-जी, कोयला और अब सीएजी की एक और रिपोर्ट. न तो घोटालों का सिलसिला थमने का नाम ले रहा है और न ही घोटालेबाज़ों की बेशर्मी कम होने का नाम ले रही है. घोटालेबाज़ों की बेशर्मी की बात इसलिए, क्योंकि इस बार उन लोगों के हिस्से का पैसा लूटा गया है, जो दिन-रात [...]
Tags: क़र्ज़ माफ, कांग्रेस, किसानों, कृषि ऋण, ग़रीब किसानों, घोटाला, घोटालेबाज़ों, घोषणा, चुनाव, बेईमान, बैंक अधिकारियों, मनमोहन सिंह, माफ़ी, यूपीए सरकार, राजनीतिक, राजनीतिक कार्यकर्ताओं, रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया, लोकसभा चुनाव, सत्तर हजार करोड़, सरकार, सीएजी Posted in कवर स्टोरी-2, राजनीति by Author: चौथी दुनिया ब्यूरो | No Comments » | Read More... |
वित्त मंत्री ने बहुप्रतिक्षित वार्षिक बजट की घोषणा कर दी. वर्ष 1991 के बाद बजट ने अपने महत्व खो दिए, क्योंकि अर्थव्यवस्था को बाजार के हवाले कर दिया गया है. पश्चिमी देशों में वार्षिक बजट अकाउंट के स्टेटमेंट के अलावा कुछ नहीं होता है. भारत में, विशेषकर 1991 के पहले बजट का एक औचित्य होता [...]
Tags: अमीर लोगों, अर्थव्यवस्था, आयकर, कारपोरेट टैक्स, किरोसीन, गरीब लोगों, घोषणा, ज्यादा टैक्स, पेट्रोल और डीजल, बजट, बहुप्रतिक्षित, बीमा, भारत, रिटर्न टैक्स, रेल मंत्री, वित्त मंत्री, विपक्षी दल, वेतनभोगी, व्यक्ति, व्यवस्था, व्यापार, शिक्षा और स्वास्थ्य, सरकार Posted in आर्थिक, कवर स्टोरी-2 by Author: कमल मोरारका | No Comments » | Read More... |
पिछले दिनों वर्ष 2013-14 का बजट वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने पेश किया. मीडिया से लेकर अर्थशास्त्रियों की पैनी नज़र इस पर रही. हालांकि इस बजट ने किसानों को ज़्यादा खुश होने का मौक़ा नहीं दिया. जैसी कि उम्मीद थी कि वित्त मंत्री अपने बजट में किसानों के लिए हर स्तर पर मदद पहुंचाने की [...]
Tags: . मीडिया, किसानों, कृषि क्षेत्र, ग़रीबों, घोषणा, पी चिदंबरम, बजट, बेघरों, मज़दूरों, यूपीए सरकार, योजना, राष्ट्रीय, र्थशास्त्रियों, विकास, वित्तमंत्री, विपक्षी पार्टियां, समस्याओं, सरकार, हरित क्रांति Posted in राजनीति, स्टोरी-6 by Author: अभिषेक रंजन सिंह | No Comments » | Read More... |
जन सत्याग्रह मार्च ग्वालियर से 3 अक्टूबर को शुरू हुआ. योजना के मुताबिक़, क़रीब एक लाख किसान ग्वालियर से चलकर दिल्ली पहुंचने वाले थे. इस मार्च में शामिल होने वालों में सभी जाति-संप्रदाय के अदिवासी, भूमिहीन एवं ग़रीब किसान थे. ग्वालियर से आगरा की दूरी 350 किलोमीटर है. हर दिन लगभग दस से पंद्रह किलोमीटर की दूरी तय करता हुआ यह मार्च दिल्ली की तऱफ बढ़ रहा था.
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हाल में देश में हुए बदलावों ने एक आधारभूत सवाल पूछने के लिए मजबूर कर दिया है. सवाल है कि आखिर यह देश किसका है? सरकार द्वारा देश के लिए बनाई गई आर्थिक नीतियां और राजनीतिक वातावरण समाज के किस वर्ग के लोगों के फायदे के लिए होनी चाहिए? लाजिमी जवाब होगा कि सरकार को हर वर्ग का ख्याल रखना चाहिए. आज भी देश के साठ प्रतिशत लोग खेती पर निर्भर हैं. मुख्य रूप से सरकारी और निजी क्षेत्र में काम कर रहा संगठित मज़दूर वर्ग भी महत्वपूर्ण है.
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अचानक ऐसी क्या बात हो गई कि टीम अन्ना और अन्ना के बीच मतभेद सामने आ गए, ऐसा क्या हो गया कि अन्ना इतने नाराज़ हो गए कि उन्होंने अरविंद केजरीवाल और टीम अन्ना के लोगों से कहा कि न तो आप मेरे नाम का और न मेरे फोटो का इस्तेमाल कर सकते हैं. इसमें दो बातें हैं. राजनीतिक दल बनाने की घोषणा जंतर-मंतर के आंदोलन के दौरान नहीं हुई थी.
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इस साल के अंत में गुजरात में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं, जिसके लिए राज्य की हर राजनीतिक पार्टी कमर कस चुकी है. एक ओर जहां सत्तारूढ़ भाजपा से अलग होकर राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री केशुभाई पटेल ने गुजरात परिवर्तन पार्टी नामक अपनी अलग पार्टी बनाकर वर्तमान मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की परेशानियां बढ़ा दी हैं, वहीं कांग्रेस पार्टी भी गुजरात का गढ़ जीतने के लिए कोई कोताही नहीं बरत रही है.
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यह हमेशा विवाद का विषय रहा है कि विधानसभा का चुनाव मुख्यमंत्री पद का प्रत्याशी घोषित करके लड़ा जाए या चुनाव के बाद मुख्यमंत्री चुना जाए. ठीक उसी तरह, जैसे लोकसभा चुनाव में कुछ पार्टियां प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार की घोषणा करके लड़ती हैं, कुछ पार्टियां ऐसा नहीं करती हैं. 2004 में भाजपा ने आडवाणी जी को प्राइम मिनिस्टर इन वेटिंग कहकर चुनाव लड़ा था, जबकि कांग्रेस ने किसी को भी अपना उम्मीदवार नहीं बनाया था.
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यह एक महज़ संयोग नहीं था कि जिस दिन बिहार विधानसभा चुनावों के परिणाम आ रहे थे, ठीक उसी दिन बंगाल की वाममोर्चा सरकार ने राज्य में पंचायतों की 50 फीसदी सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित करने का फैसला लिया. तमाम झिझक के बावजूद बांग्ला मीडिया के एक हलके में इस बात पर चर्चा हुई कि कामयाबी का बिहार मॉडल बंगाल में भी कारगर हो सकता है.
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बीती 14 जनवरी को असम सरकार ने अपनी वेबसाइट पर राज्य के सभी मंत्रियों की संपत्तियों का विवरण सार्वजनिक कर दिया. काफी समय पहले असम के मुख्यमंत्री तरुण गोगोई ने वादा किया था कि वह और उनके मंत्रिमंडल के सभी सहयोगी अपनी-अपनी संपत्ति की घोषणा करेंगे, लेकिन कई बार समय सीमा तय करने के बावजूद ऐसा नहीं हो सका.
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वर्ष 2010 में अवैध रूप से 280 करोड़ रुपये की संपत्ति जमा करने के मामले में एक आईएएस अधिकारी का नाम आने के बाद अब लगता है कि 2011 में बाबुओं को अपनी संपत्ति की सार्वजनिक घोषणा करने के लिए कहा जा सकता है. नीतीश कुमार बिहार में यह अभियान शुरू भी कर चुके हैं और सफल होते दिख रहे हैं.
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व्यवस्था संविधान को धोखा देकर बनी है |
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