सीएजी, संसद और सरकार

आज़ादी के बाद से, सिवाय 1975 में लगाए गए आपातकाल के, भारतीय लोकतांत्रिक संस्थाएं और संविधान कभी भी इतनी तनाव भरी स्थिति में नहीं रही हैं. श्रीमती इंदिरा गांधी ने संविधान के प्रावधान का इस्तेमाल वह सब काम करने के लिए किया, जो सा़फ तौर पर अनुचित था और अस्वीकार्य था. फिर भी वह इतनी सशक्त थीं कि आगे उन्होंने आने वाले सभी हालात का सामना किया. चुनाव की घोषणा की और फिर उन्हें हार का सामना करना पड़ा.

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संसद के समक्ष चुनौतियां

जनता महंगाई की मार से त्रस्त है. अशिक्षा और बेरोज़गारी ने जीवन दु:खद बना दिया है. ग़रीबी एक अभिशाप बनकर रह गई है. बच्चों के लिए शिक्षा तो एक सपना भर है, क्योंकि पेट भरने को भोजन ही नहीं है.

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चुनौतीयां अभी शेष हैं…

लंबी प्रतीक्षा के बाद संवैधानिक सुधारों को नेशनल एसेंबली और सीनेट की मंजूरी भले मिल गई हो, लेकिन चुनौतियां अभी बाक़ी हैं. सुधार प्रस्तावों पर काम करने के लिए सीनेटर रजा रब्बानी और समिति के दूसरे सदस्य तारी़फ के क़ाबिल ज़रूर हैं.

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