फर्रुख़ाबाद को बदनाम मत कीजिए

मैं अभी तक पसोपेश में था कि सलमान खुर्शीद के खिला़फ कुछ लिखना चाहिए या नहीं. मेरे लिखे को सलमान खुर्शीद या सलमान खुर्शीद की जहनियत वाले कुछ और लोग उसके सही अर्थ में शायद नहीं लें. इसलिए भी लिखने से मैं बचता था कि मेरा और सलमान खुर्शीद का एक अजीब रिश्ता है. फर्रुख़ाबाद में हम दोनों पहली बार लोकसभा के चुनाव में आमने-सामने थे और चुनाव में सलमान खुर्शीद की हार और मेरी जीत हुई थी.

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अन्‍ना की हार या जीत

अन्ना हजारे ने जैसे ही अनशन समाप्त करने की घोषणा की, वैसे ही लगा कि बहुत सारे लोगों की एक अतृप्त इच्छा पूरी नहीं हुई. इसकी वजह से मीडिया के एक बहुत बड़े हिस्से और राजनीतिक दलों में एक भूचाल सा आ गया. मीडिया में कहा जाने लगा, एक आंदोलन की मौत. सोलह महीने का आंदोलन, जो राजनीति में बदल गया. हम क्रांति चाहते थे, राजनीति नहीं जैसी बातें देश के सामने मज़बूती के साथ लाई जाने लगीं.

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पत्रकार जिन्होंने लोकतंत्र की हत्या की

पत्रकारिता की संवैधानिक मान्यता नहीं है, लेकिन हमारे देश के लोग पत्रकारिता से जुड़े लोगों पर संसद, नौकरशाही और न्यायपालिका से जुड़े लोगों से ज़्यादा भरोसा करते हैं. हमारे देश के लोग आज भी अ़खबारों और टेलीविजन की खबरों पर धार्मिक ग्रंथों के शब्दों की तरह विश्वास करते हैं.

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भारतीय मीडिया संकट के दौर से गुज़र रहा है

दुनिया के अन्य देशों की तरह भारत में भी पत्रकारिता साल दर साल परिवर्तित हुई है. अगर हम 1947 में देश को मिली आज़ादी के बाद पिछले 65 सालों की बात करें तो पत्रकारिता के क्षेत्र में बड़े परिवर्तन हुए हैं. 1995 के मध्य में सेटेलाइट टीवी हमारे देश में आया. उसके बाद से 24 घंटे चलाए जाने वाले समाचार चैनलों ने अपना एक ब्रांड बनाया है, जिसमें एक ही समाचार बार-बार दिखाया जाता है.

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फिल्म पर डर्टी सलाह

फिल्म डर्टी पिक्चर को एक निजी टेलीविजन चैनल पर प्रसारित न करने की सलाह देकर सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने एक नई बहस को जन्म दे दिया है. मंत्रालय ने निजी टेलीविजन चैनल को भेजी अपनी सलाह में केबल टेलीविजन नेटवर्क रूल 1994 का सहारा लिया और उसके सब-रूल 5 एवं 6 का हवाला देते हुए फिल्म का प्रसारण रात ग्यारह बजे के बाद करने की सलाह दी गई.

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ममता का तुगलकी रवैया

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी इन दिनों अजीबोग़रीब बयानों और फरमानों की वजह से चर्चा में हैं. ताजा बयान में उन्होंने लोगों से न्यूज चैनलों को न देखने और म्यूजिक चैनल देखने की सलाह दी है. ममता का कहना है कि न्यूज चैनलों में उनके खिला़फ ख़बरें दिखाई जाती हैं.

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हिंदी पत्रकारिता अपनी जिम्मेदारी समझे

यह महीना हलचल का महीना रहा है. मुझसे बहुत सारे लोगों ने सवाल पूछे, बहुत सारे लोगों ने जानकारियां लीं. लेकिन जिस जानकारी भरे सवाल ने मुझे थो़डा परेशान किया, वह सवाल पत्रकारिता के एक विद्यार्थी ने किया. उसने मुझसे पूछा कि क्या अंग्रेजी और हिंदी पत्रकारिता अलग-अलग हैं. मैंने पहले उससे प्रश्न किया कि आप यह सवाल क्यों पूछ रहे हैं.

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ब्रिटेन, रुपर्ट मार्डोक और डेविड कैमरुन

ब्रिटिश प्रधानमंत्री हेराल्ड मैकमिलन से जब पूछा गया कि आपको अपने कार्यकाल में सर्वाधिक भय किस बात का होता था तो उन्होंने उत्तर दिया कि घटनाओं से उन्हें सबसे अधिक भय लगता था. प्रधानमंत्री के रूप में उनके नौवें उत्तराधिकारी डेविड कैमरून भी इस बात से सहमत होंगे. अभी ब्रिटेन को जिस घटना ने सबसे अधिक परेशान किया है, उसकी शुरुआत रूपर्ट मार्डोक प्रकरण से नहीं हुई, बल्कि उसकी शुरुआत हुई मिली डाउलर की हत्या के मुक़दमे की जांच और उसके बाद उसके परिवार वालों को हुई परेशानी से.

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आज उदयन होते तो क्या करते

नई पीढ़ी के पत्रकारों और पाठकों के लिए उदयन शर्मा को जानना ज़रूरी है, क्योंकि ये दोनों वर्ग आज पत्रकारिता के उस स्वरूप से रूबरू हो रहे हैं, जहां स्थापित मूल्यों में क्षरण देखने को मिल रहा है. उद्देश्य में भटकाव और विचलन की स्थिति है. युवा वर्ग के साथ ही वह पीढ़ी भी, जिसने कभी रविवार और उदयन शर्मा के धारदार लेखन को पढ़ा, देखा या उसके बारे में जाना है, पत्रकारिता की वर्तमान स्थिति से संतुष्ट नज़र नहीं आ रही है.

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उत्तर प्रदेश में पत्रकारों पर हमलाः सच कहने की सजा

मायावती सरकार और उसके नुमाइंदों ने हर उस आवाज़ को कुचल देने की कसम खाई है, जो मुख्यमंत्री मायावती या उनके राजकाज के ख़िला़फ उठाई गई हो. विरोधियों पर लाठी-डंडों की बौछार और व्यापारियों का उत्पीड़न करने, क़ानून के रक्षकों एवं शिक्षा मित्रों को दौड़ा-दौड़ाकर पीटने वाले मायावती के कथित गुर्गों का निशाना अबकी बार मीडिया बना.

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समाचार बाज़ार की नैतिकता

जैसा कि किताब के नाम, समाचार बाज़ार की नैतिकता से ज़ाहिर है कि यह मीडिया से जुड़ी पुस्तक है और लेखक ने मीडिया को बाज़ार के बरक्श रखकर नैतिकता को कसौटी पर कसा होगा. दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में रीडर कुमुद शर्मा ने बेहद श्रमपूर्वक देश-विदेश के लेखकों एवं मीडिया पुरोधाओं के उद्धरणों के आधार पर भारतीय मीडिया के बदलते स्वरूप को सामने लाने की कोशिश की है.

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चुनावी तड़काः जाना था जापान पहुंच गए…

जाना था जापान पहुंच गए चीन समझ गए ना… यह गीत अक्सर किसी न किसी हस्ती पर लागू होता रहता है. हाल में यह दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित पर लागू हुआ. दरअसल हुआ यह कि शीला मोहिउद्दीन नगर विधानसभा क्षेत्र में कांगे्रस प्रत्याशी की सभा में प्रचार के लिए जा रही थीं, लेकिन रास्ते में उनका हेलीकॉप्टर भटक गया.

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बदल गई कॉमेडी

कॉमेडी बॉलीवुड फिल्मों का खास हिस्सा होती है. बदलते समय के साथ फिल्म इंडस्ट्री में कई प्रयोग हुए हैं, ऐसे में कॉमेडी को लेकर भी फिल्मकारों के नज़रिए में का़फी बदलाव आया है. पुरानी हिंदी फिल्मों में कॉमेडियन का एक किरदार होता था, जो कहानी के साथ-साथ चलता था. उस जमाने में कॉमेडियन और मुख्य अभिनेता के डायलॉग अलग-अलग होते थे.

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सामुदायिक रेडियो: आखिर किसके लिए

हाल ही में केंद्रीय सूचना और प्रसारण मंत्री अंबिका सोनी नेे 2012 तक देश भर में चार हज़ार से अधिक सामुदायिक रेडियो स्टेशन खोलने की घोषणा की. हमेशा की तरह जनहित में एक और योजना घोषित हो गई, पर शायद अंबिका जी को पता नहीं है कि इस देश में योजनाओं की घोषणा करना जितना आसान है, उन्हें कार्यान्वित कर पाना उससे कहीं ज़्यादा मुश्किल है.

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सेंसर बोर्ड, फिल्‍में और राजनीति-3: मापदंड बदलने की जरूरत

गांधी जी ने एक बार सेंसरशिप को अपने अंदाज़ में परिभाषित करते हुए कहा था, इफ यू डोंट लाइक समथिंग, क्लोज़ योर आइज़. साउथ फिल्मों का सेंसर बोर्ड इस फलसफे के दोनों पहलुओं का इस्तेमाल करता है.

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जनता को ठगने का महामुकाबला

क्‍या सरकार टीवी चैनलों को इसलिए लाइसेंस देती है कि वे जनता को बेवकूफ बनाकर पैसे कमाएं? क्या सरकारी अधिकारियों को पता नहीं है कि उनके द्वारा जारी लाइसेंस का इस्तेमाल देश की जनता को मूर्ख बनाने में किया जा रहा है? रात के बारह बजते ही कई चैनलों पर ऐसे कार्यक्रम चलाए जाते हैं, जिन पर लाइव लिखा होता है.

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मेरे खिलाफ लिखना मना है

सरकार की योजनाओं और कामों को प्रचारित करने के लिए जनसंपर्क विभाग होता है. हर सरकार यही चाहती है कि उसके अच्छे कामों का प्रचार हो और सरकार की कमज़ोरियां बाहर न आएं. सरकार की विफलताओं और कमज़ोरियों को जनता के सामने लाना मीडिया का काम है. लेकिन बिहार में स्थिति अलग है.

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पाकिस्तान अपना नज़रिया बदले

पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में सड़कों के किनारे नज़र आते पोस्टर्स और टेलीविज़न चैनलों पर प्रसारित किए जा रहे विज्ञापनों में पिछले दो साल के दौरान सरकार की उपलब्धियों को गिनाया जा रहा है. सरकार द्वारा प्रायोजित इन विज्ञापनों में इसकी तथाकथित कामयाबियों को ख़ूब ब़ढा-च़ढाकर पेश किया जा रहा है.

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प्रधानमंत्री पद की दौड़ में बाबा रामदेव

जिस काम को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ नहीं कर सका, जिसे करने की आस लिए विश्व हिंदू परिषद बू़ढी होने लगी है और भाजपा भावी प्रधानमंत्री का नाम घोषित करने के बाद भी इस सपने की ओर एक क़दम नहीं बढ़ पाई, उस काम को अब एक बाबा पूरा करना चाहता है. इस बाबा ने इंग्लैंड में एक पूरा आइलैंड ख़रीद लिया है, इसने अमेरिका के ह्यूस्टन में लगभग तीन सौ एकड़ ज़मीन ख़रीद ली है.

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शाहरूख खान और फॉक्‍स ने ठाकरे और पूरे देश को मूर्ख बनाया

फिल्म के प्रमोशन दो तरह के होते हैं. एक अच्छा प्रमोशन और दूसरा बुरा. अच्छा प्रमोशन वह है, जिसमें लोगों में ख़ुशियां बांटी जाती हैं, सकारात्मक मनोरंजन होता है और जिसमें लोग ख़ुशी-ख़ुशी शरीक होते हैं. बुरा प्रमोशन वह होता है, जिससे समाज में कलह, धार्मिक द्वेष और हिंसा फैलती है. अच्छे और बुरे प्रमोशन में यही फर्क़ होता है. फिल्म माई नेम इज ख़ान ने इतिहास में अपना नाम दर्ज़ करा लिया.

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