मुस्लिम मतदाता पर उलेमा एवं संगठनों की अपीलें बेअसर

कहने को तो भारत जैसे बड़ी जनसंख्या वाले राष्ट्र में मुसलमान 13.4 प्रतिशत है. मगर तमाम स्थानों पर कहीं अधिक

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मस्न्युलर डिस्ट्रॉफी- एक गंभीर, लेकिन अनजान रोग

दुनिया भर में एड्स को फैलने से बचाने के लिए तमाम मुहिमें चल रही हैं. वैज्ञानिक इसका इलाज ढूंढने के

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सरकार जवाब दे यह देश किसका है

हाल में देश में हुए बदलावों ने एक आधारभूत सवाल पूछने के लिए मजबूर कर दिया है. सवाल है कि आखिर यह देश किसका है? सरकार द्वारा देश के लिए बनाई गई आर्थिक नीतियां और राजनीतिक वातावरण समाज के किस वर्ग के लोगों के फायदे के लिए होनी चाहिए? लाजिमी जवाब होगा कि सरकार को हर वर्ग का ख्याल रखना चाहिए. आज भी देश के साठ प्रतिशत लोग खेती पर निर्भर हैं. मुख्य रूप से सरकारी और निजी क्षेत्र में काम कर रहा संगठित मज़दूर वर्ग भी महत्वपूर्ण है.

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बढ़ती जनसंख्या अभिशाप नहीं

आम तौर पर यह धारणा बनी हुई है कि जनसंख्या वृद्धि हानिकारक है. इससे किसी भी देश की अर्थव्यवस्था चरमरा जाती है. आर्थिक दृष्टिकोण के सभी पैमाने भी इसी की पुष्टि करते हैं. अर्थशास्त्रियों की परिभाषा का निष्कर्ष यही है कि जनसंख्या वृद्धि के कारण ही खाद्यान्न की कमी होती है, क्योंकि जिस अनुपात में आबादी में इज़ा़फा होता, उस अनुपात में पैदावार नहीं हो पाती है.

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सर्वोदय अर्थव्यवस्था

राष्ट्र पिता महात्मा गांधी ने अपनी अर्थव्यवस्था का जो स्वरूप बतलाया था, उसे सर्वोदय अर्थव्यवस्था की संज्ञा मिली है. शायद यह व्यवस्था भारत की दयनीय दशा को देखते हुए इस देश के लिए उपयुक्त और आदर्श मान भी ली जाए.

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संतति नियमन आवश्यक

बढ़ी हुई जनसंख्या निश्चय ही देश का धन है, पर कब और किस हालत में? ज़रा ग़ौर कीजिए. एक दंपत्ति समृद्ध हैं, अपनी परिचर्या के लिए दो नौकर रखे हुए हैं, सब काम उनके वे दोनों नौकर आराम से कर लेते हैं. एक दूसरे दंपत्ति ने अपनी परिचर्या के लिए, अलग-अलग कामों के लिए 9 नौकर तैनात किए हैं. काम इनका भी आराम से हो जाता है. अब बताइए, वे 9 आदमी विशेष काम करते हैं क्या? नहीं.

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शरणार्थी समस्या : सकारात्मक पहल की ज़रुरत

जनसंख्या विस्थापन के क्षेत्र में दक्षिण एशिया का एक अनूठा इतिहास रहा है. यहां युद्ध के बाद लोग या तो अपने देश की सीमाओं से बाहर निकाल दिए गए अथवा वे जाति, नस्ल या धर्म के आधार पर देश छोड़ने के लिए मजबूर हो गए. इसके बाद पर्यावरणीय या विकासात्मक प्रक्रिया भी विस्थापन की एक वजह बनी.

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जनगणना के साथ नज़रिया बदलने की जरुरत

पच्चीस फीट ऊंची रस्सी पर चलता एक इंसान, सड़क के किनारे करतब दिखाता एक बच्चा. शहर के किनारे तंबू डाले कुछ परिवार. आज यहां, कल कहीं और. बिस्तर के नाम पर ज़मीन, छत आसमान. महीने-दो महीने पर शहर बदल जाता है और शायद ज़िंदगी के रंग भी, लेकिन यह कहानी सैकड़ों सालों से बदस्तूर जारी है. यह कहानी है भारत के उन 6 करोड़ घुमंतू और विमुक्त जनजातियों की, जिन्हें आम बोलचाल की भाषा में यायावर कहते हैं.

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