यह संसद संविधान विरोधी है

सरकार को आम जनता की कोई चिंता नहीं है. संविधान के मुताबिक़, भारत एक लोक कल्याणकारी राज्य है. इसका साफ़ मतलब है कि भारत का प्रजातंत्र और प्रजातांत्रिक ढंग से चुनी हुई सरकार आम आदमी के जीवन की रक्षा और उसकी बेहतरी के लिए वचनबद्ध है. लेकिन सरकार ने इस लोक कल्याणकारी चरित्र को ही बदल दिया है. सरकार बाज़ार के सामने समर्पण कर चुकी है, लेकिन संसद में किसी ने सवाल तक नहीं उठाया.

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पटना गांधी मैदान से शुरू होगी परिवर्तन की लड़ाई

भारतीय लोकतंत्र के लिए आने वाला समय काफी महत्वपूर्ण है. लोगों का इस व्यवस्था से भरोसा उठने और उसके नतीजे के तौर पर जनता के सड़क पर उतरने की घटनाएं लगातार जारी हैं. दामिनी वाली घटना में जिस तरह से युवा लगातार दिल्ली और देश के बाक़ी हिस्सों में आंदोलन कर रहे हैं, इसे भारतीय लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत माना जा सकता है.

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यह आम आदमी की पार्टी है

भारतीय राजनीति का एक शर्मनाक पहलू यह है कि देश के राष्ट्रीय एवं क्षेत्रीय दलों की कमान चंद परिवारों तक सीमित हो गई है. कुछ अपवाद हैं, लेकिन वे अपवाद ही हैं. अगर ऐसा ही चलता रहा तो देश के प्रजातंत्र के लिए खतरा पैदा हो जाएगा. राजनीतिक दलों और देश के महान नेताओं की कृपा से यह खतरा हमारी चौखट पर दस्तक दे रहा है, लेकिन वे देश की जनता का मजाक उड़ा रहे हैं.

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एक नहीं, देश को कई केजरीवाल चाहिए

साधारण पोशाक में किसी आम आदमी की तरह दुबला-पतला नज़र आने वाला शख्स, जो बगल से गुजर जाए तो शायद उस पर किसी की नज़र भी न पड़े, आज देश के करोड़ों लोगों की नज़रों में एक आशा बनकर उभरा है. तीखी बोली, तीखे तर्क और ज़िद्दी होने का एहसास दिलाने वाला शख्स अरविंद केजरीवाल आज घर-घर में एक चर्चा का विषय बन बैठा है. अरविंद केजरीवाल की कई अच्छाइयां हैं तो कुछ बुराइयां भी हैं. उनकी अच्छाइयों और बुराइयों का विश्लेषण किया जा सकता है, लेकिन इस बात पर दो राय नहीं है कि देश में आज भ्रष्टाचार के खिला़फ जो माहौल बना है, उसमें अरविंद केजरीवाल का बड़ा योगदान है.

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उठो जवानो तुम्‍हें जगाने क्रांति द्वार पर आई है

एक कहावत है, प्याज़ भी खाया और जूते भी खाए. ज़्यादातर लोग इस कहावत को जानते तो हैं, लेकिन बहुत कम लोगों को ही पता है कि इसके पीछे की कहानी क्या है. एक बार किसी अपराधी को बादशाह के सामने पेश किया गया. बादशाह ने सज़ा सुनाई कि ग़लती करने वाला या तो सौ प्याज़ खाए या सौ जूते. सज़ा चुनने का अवसर उसने ग़लती करने वाले को दिया.

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टीम अन्‍नाः मिलिए पर्दे के पीछे के नायकों से

आप जैसे ही अरविंद केजरीवाल के दफ्तर ग़ाज़ियाबाद के कौशांबी स्थित पीसीआरएफ पहुंचते हैं, वहां आपकों कई युवा लैपटॉप से जूझते नज़र आएंगे. कोई मोबाइल पर निर्देश देता नज़र आएगा तो कोई बैनर-पोस्टर संभालता हुआ. दरअसल ये सभी इंडिया अगेंस्ट करप्शन के बैनर तले चल रहे जन लोकपाल आंदोलन की तैयारी में व्यस्त हैं.

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यह पूरे देश का आंदोलन है

अन्ना हज़ारे इतिहास में सुनहरा पन्ना बनकर जुड़ गए हैं. आज़ादी के बाद कई नेताओं ने आंदोलन किए, लोग उनके साथ जुड़े, उन्होंने अपनी बातें भी मनवाईं. अनशन हुए, आमरण अनशन हुए, उनमें लोग शहीद भी हुए, लेकिन अन्ना का क़िस्सा इन सबसे अलग है. एक ऐसा आदमी, जो देश में कहीं घूमा नहीं, जिसने राज्यों में सभाएं नहीं कीं, लोगों को तैयार नहीं किया, उनके पास अपना मुद्दा नहीं पहुंचाया, कोई संगठन नहीं बनाया, उसके साथ आज़ादी के बाद का सबसे बड़ा जनसैलाब खड़ा है.

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जन लोकपाल इस सर्वे का नतीजा क्या निकलेगा

भारत में सर्वे अमूमन राजनीतिक पार्टियां या उपभोक्ता उत्पाद बेचने वाली कंपनियां करती हैं. मकसद साफ होता है, एक अपनी राजनीतिक ताक़त के आकलन के लिए तो दूसरा पैसा कमाने की संभावना तलाशने के लिए सर्वे कराता है. किसी जनांदोलन की ओर से सर्वे कराने की घटना शायद पहली बार देखने-सुनने को मिल रही है.

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अन्ना की लडा़ई और साजिश की सीडी

अन्ना हजारे की लड़ाई कठिन होती जा रही है, आशंका भी यही थी. संयुक्त समिति के सदस्य शांति भूषण के विरुद्ध पहले संपत्ति की ख़रीद में कम स्टांप शुल्क अदा करने का मामला और फिर एक सीडी के ज़रिए चार करोड़ रुपये रिश्वत लेने-देने की साज़िश का सामने आना इस बात के संकेत हैं कि जन लोकपाल विधेयक का प्रारूप बिना बाधा संपन्न न होने पाए.

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