आसान नहीं है फिल्म निर्माण

फिल्म निर्माण आसान काम नहीं है. यह काफी जोखिम भरा है. विशेषकर, कम बजट की बिना स्टार वाली फिल्में ज़्यादातर

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कई देशों में सत्ता परिवर्तन कर चुका है सीआईए

भारत में फोर्ड फाउंडेशन द्वारा पोषित और संचालित  संगठनों और उससे जुड़े सामाजिक कार्यकर्ताओं को बड़ी इज्जत दी जाती है.

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बिना ब्‍याज का कर्ज और सस्‍ती जमीन: यह रिश्‍वत नहीं तो क्‍या है

नए-नए बने राजनीतिक दल (अरविंद केजरीवाल द्वारा घोषित) ने सोनिया गांधी के दामाद रॉबर्ट वाड्रा पर एक साथ कई आरोप लगाए हैं. इन तमाम आरोपों में कई चीजें शामिल हैं और इनमें कई तथ्य एवं आंकड़े बहुत ही बड़े हैं, लेकिन इस सबके बीच अगर सिद्धांत की बात की जाए तो दो चीजें एकदम स्पष्ट हैं. पहला यह कि रॉबर्ट वाड्रा की कुल पहचान यही है कि वह सोनिया गांधी के दामाद हैं.

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मणिपुर जमीन की एक लड़ाई यहां भी

क्या पूर्वोत्तर को तभी याद किया जाएगा, जब कोई सांप्रदायिक हिंसा होगी, जब लोगों का खून पानी बनकर बहेगा? या तब भी उनके संघर्ष को वह जगह मिलेगी, उनकी आवाज़ सुनी-सुनाई जाएगी, जब वे अपने जल, जंगल एवं ज़मीन की लड़ाई के लिए शांतिपूर्ण तरीक़े से विरोध करेंगे? मणिपुर में तेल उत्खनन के मसले पर जारी जनसंघर्ष की धमक आखिर तथाकथित भारतीय मीडिया में क्यों नहीं सुनाई दे रही है? एस बिजेन सिंह की खास रिपोर्ट :-

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सायन-कोलीवाड़ाः मुंबई, जमीन हड़पने की राजधानी बनती जा रही है

उदारीकरण के दौर में ज़मीन सबसे क़ीमती संसाधन बन चुकी है और जहां-जहां लालची बिल्डरों को ज़मीन दिख रही है और यह भी दिख रहा है कि उस ज़मीन पर आम और कमज़ोर आदमी रह रहे हैं, उसे हड़पने के लिए वे पूरी ताक़त लगा रहे हैं. उनके इस कार्य में सरकार से लेकर सरकारी अधिकारी तक उनका साथ दे रहे हैं. सरकार की जनकल्याणकारी योजनाओं की जगह बिल्डर्स कल्याण ने ले ली है.

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सरकारी दमन के शिकार आदिवासी: नगड़ी को नंदीग्राम बनाने की तैयारी

नंदीग्राम और सिंगुर के जख्म अभी भरे नहीं हैं और देश में सैकड़ों ऐसे नंदीग्राम और सिंगुर की ज़मीन तैयार की जा रही है. मामला चाहे भट्टा पारसौल का हो या जैतापुर का या फिर कुडनकुलम का. इन सभी जगहों पर सरकार जबरन ज़मीन अधिग्रहण करने की ज़िद में किसानों-मज़दूरों की लाशें गिरा रही है.

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शिक्षा के अधिकार से गरीब क्यों वंचित हैं

खबर आई है कि बिहार सरकार संत विनोबा भावे का भूदान आंदोलन एक बार फिर शुरू करने जा रही है. फर्क़ स़िर्फ इतना है कि विनोबा भावे द्वारा चलाया गया भूदान आंदोलन भूमिहीन किसानों को ज़मीन दिलाने के लिए था, वहीं बिहार सरकार का आंदोलन स्कूलों को ज़मीन उपलब्ध कराने के लिए होगा. इस आंदोलन के माध्यम से राज्य सरकार लोगों से विद्यालयों के लिए ज़मीन मांगेगी.

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बिहारः जमीन आवंटन के नाम पर महादलितों के साथ धोखा

सूबे के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने अपने 6 साल के शासनकाल में महादलित आयोग क गठन किया. उसी तरह भूमि सुधार आयोग का भी गठन किया. इन आयोगों के अध्यक्षों द्वारा सरकार को भूमिहीन महादलितों को आवासीय भूमि देने की अनुशंसा की गई थी.

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भूदान आंदोलन के 60 वर्ष: सपनों का मर जाना खतरनाक होता है

आचार्य विनोबा भावे की अगुवाई में वर्ष 1951 में शुरू हुए भूदान आंदोलन के साठ वर्ष पूरे हो गए हैं. बिहार सहित देश के कई स्थानों पर विनोबा जी के आंदोलन की सराहना की गई, लेकिन इसके ठीक विपरीत बिहार में हज़ारों भूदान किसानों की जमीन खिसक रही है.

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गोपालगढ़ हत्याकांड : लाशें सड़ती रही, लेकिन इंसाफ नहीं मिला- सरकार से चूक हुई है

पुलिस का ख़ौ़फ अगर देखना हो तो गोपालगढ़ गांव में देखा जा सकता है. यहां सन्नाटा पसरा है. गांव के लोग बताते हैं कि पुलिस फायरिंग में 13 लोगों की जान गई. बताया गया कि तीन लाशों को पुलिस ने जला दिया और बाकी लाशें कई दिनों तक पड़ी रहीं. शायद यह पहली ऐसी घटना है, जहां मुसलमानों ने लाशों को द़फनाने से इंकार कर दिया. वे गुनाहगार पुलिस वालों की गिरफ्तारी की मांग कर रहे थे.

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पूर्वांचलः जान देंगे, जमीन नहीं

उत्तर प्रदेश सरकार आंख-कान बंद करके काम कर रही है. भूमि अधिग्रहण मामले में बार-बार अदालत में मुंह की खाने और कई स्थानों कृषि भूमि बचाने के लिए किसान आंदोलन के उग्र रूप धारण करने के बाद भी वह चेती नहीं है. यही वजह थी कि भट्टा-पारसौल में भूमि अधिग्रहण मामले की आग ठंडी भी नहीं हो पाई थी और सरकारी नुमाइंदे पूर्वांचल के चंदौली ज़िले के कटेसर और कोडोपुर गांव में ज़मीन अधिग्रहण के लिए पहुंच गए.

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शाहाबादः कहीं बंजर न हो जाए जमीन

सन 1857 की क्रांति के दौरान जब शाहाबाद की धरती ने आग उगलना शुरू किया तब यहां के लोगों को सिंचाई के संसाधन देकर कृषि कार्य कीतरफ मोड़ने के लिए ब्रिटिश हुकूमत ने एक बड़ी परियोजना की शुरूआत की थी. डेहरी के ऐनकार्ट में सोन नदी पर एक बांध बना और पूरे शाहाबाद में नहरों का जाल बिछाने की कवायद तेज़ हुई.

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सीएनटी एक्‍ट विवाद थमेगा नहीं

सीएनटी एक्ट को लेकर पिछले दिनों उठा विवाद फिलहाल थम गया है, लेकिन राख के नीचे चिंगारी दबी है. यह चिंगारी कभी भी भड़क सकती है. पिछले दिनों सीएनटी एक्ट के एक प्रावधान को लेकर नया विवाद खड़ा हो गया था.

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जमीन पर कब्‍जाः यह नेताओं का नया धंधा है

प्रदेश की राजनीति पर अपराधीकरण की छाप का असली चेहरा देखना है तो बुंदेलखंड का रुख करना पड़ेगा. यह वही बुंदेलखंड है जो पलायन, भुखमरी, सूखे और किसानों की आत्महत्याओं की वजह से बीते कई वर्षों से सूबे के राजनीति का केंद्र बिंदु है.

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जर और जमीन की बलि चढ़ती अबलाएं

छह सितंबर, 2010. पश्चिम बंगाल के उत्तर दिनाजपुर ज़िले का तिलना गांव. एक आदिवासी को गांव वाले पीट-पीटकर मौत के घाट उतार देते हैं. मृतक हेमब्रम सोम का कसूर यह था कि वह एक ऐसी महिला का पति है, जिसे गांव के लोग डायन मानते हैं. हेमब्रम की पत्नी है मालो हांसदा. गांव के एक तांत्रिक के मुताबिक़ वह डायन है.

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बुद्ध की नगरी सरकारी भूमि की लूट

दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों के लोग जीवन में कम से कम एक बार बोधगया की यात्रा ज़रूर करना चाहते हैं. बौद्ध धर्मावलंबियों के लिए बोधगया मक्का है. जबसे बोधगया का महाबोधि मंदिर वर्ल्ड हेरिटेज में शामिल हुआ है, तबसे बोधगया बौद्ध धर्मावलंबियों के लिए आकर्षण का केंद्र बन गया है.

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किसान आंदोलनः जमीन जाएगी तो नक्‍सली बनेंगे

किसान के लिए ज़मीन स़िर्फ ज़मीन का एक टुकड़ा नहीं होती. ज़मीन किसान की पहचान है, ज़मीन किसान के जीने का सहारा है, शायद इसीलिए बुद्ध सिंह ज़मीन को धरती मां कह रहे हैं. मथुरा के चौकरा गांव के किसान बुद्ध सिंह की उत्तेजना बोलते व़क्त अचानक बढ़ जाती है. कहते हैं, हम मर जाएंगे, लेकिन अपनी धरती मां को बिकने नहीं देंगे.

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पॉस्‍को परियोजनाः विरोध और स्‍वीकृतियों का इतिहास

कई बार कुछ खास तारीखें इतिहास में अहम बनकर रह जाती हैं. 28 जुलाई, 2010 को केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय ने मौजूदा दौर की सबसे ज्यादा विवादित रही औद्योगिक परियोजनाओं में से एक के प्रस्तावित स्थल पर अनुसूचित जनजातियों एवं अन्य वनवासियों के फॉरेस्ट राइट्‌स एक्ट 2006 के क्रियान्वयन की समीक्षा के लिए एक चार सदस्यीय कमेटी का गठन किया.

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जल, जंगल और जमीन बचाने की मुहिम

राज्य के 250 स्वयंसेवी संगठनों ने एक नई जल नीति बनाकर निशंक सरकार को उसका मसौदा सौंप दिया है. संगठनों का कहना है कि अगर सरकार पहाड़ के पानी को बचाना चाहती है तो उसे जल, जंगल एवं ज़मीन के संदर्भ में जनता की आकांक्षाओं के अनुरूप नीति बनानी और लागू करनी होगी.

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जमीन छीनकर मदजूर बनाया

कोरबा ज़िले के रैकी गांव के 360 भूविस्थापित खातेदार दो साल से इंतजार कर रहे हैं कि 126 मेगावॉट क्षमता के विद्युत संयंत्र वाले एस.व्ही. पॉवर प्लांट प्रबंधन उन्हें कब सहारा देता है.

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भारत की जमीन नेपाल के कब्‍जे में

आखिर कब तक भारत अपनी ज़मीन पर पड़ोसी देशों का अतिक्रमण का शिकार बनता रहेगा? कब तक प्रत्येक भारतीय यह समाचार सुनता रहेगा, कि प़डोसी मुल्क ने उसकी ज़मीन क़ब्ज़ा कर लिया है. कब तक यह सुनते रहेंगे कि सरकार उच्चाधिकारी स्तर की वार्ता कर रही है.

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सरकारी रिकॉर्ड से गायब बस स्‍टैंड और जमीन

बिलासपुर शहर के पंडरी स्थित नए बस स्टैंड का सरकारी रिकॉर्ड मे कोई अता-पता नहीं मिल रहा. आश्चर्य है कि नगर का एक बस स्टैंड सरकारी रिकॉर्ड में लापता है और राजस्व नजूल और लगभग सभी सरकारी विभाग इस बस स्टैंड को खोजने में लगे हुए हैं.

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