नया भूमि अधिग्रहण विधेयक किसानों के खिलाफ साजिश

भूमि अधिग्रहण एवं पुनर्स्थापना एवं पुनर्वास विधेयक संसद के मॉनसून सत्र में भी पेश नहीं हो सका. यह विधेयक कब पेश होगा और देश के करोड़ों किसानों की परेशानियां कब खत्म होंगी, यह कोई नहीं बता सकता. मौजूदा समय में देश के अंदर जबरन भूमि अधिग्रहण के विरोध में छोटे-बड़े सैकड़ों आंदोलन चल रहे हैं. अब नंदीग्राम, सिंगुर, भट्टा पारसौल, नगड़ी, जैतापुर और कुडनकुलम जैसे हालात कई राज्यों में पैदा हो गए हैं.

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कांग्रेस पार्टी कंफ्यूजन में है

मंत्रिमंडल में हुए व्यापक फेरबदल से जनता को कोई फायदा नहीं हुआ. उल्टा यह संदेश गया है कि सरकार या कांग्रेस पार्टी कंफ्यूजन में है. उसके सामने कोई रोडमैप नहीं है. देश को चलाने के लिए किस तरह के लोग ज़रूरी हैं और पार्टी को चुनाव में जिताने के लिए किस तरह के लोग चाहिए, यह भी कांग्रेस के सामने कुछ साफ़ नहीं है.

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बीटी बीज यानी किसानों की बर्बादी

संप्रग सरकार की जो प्रतिबद्धता किसान और खेती से जुड़े स्थानीय संसाधनों के प्रति होनी चाहिए, वह विदेशी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के प्रति दिखाई दे रही है. इस मानसिकता से उपजे हालात कालांतर में देश की बहुसंख्यक आबादी की आत्मनिर्भरता को परावलंबी बना देने के उपाय हैं.

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भोपाल का फैसला राजनीतिक-न्यायिक-सामाजिक धो़खा

भोपाल मामले का निर्णय 7 जून, 2010 को नहीं हुआ, इसका फैसला तो दिसंबर, 1984 में हुए हादसे के चार दिनों बाद ही हो गया था, जब एंडरसन को चोरी-छुपे राज्य सरकार के एक विमान में बैठा कर पहले भोपाल से बाहर और फिर देश से भी बाहर अमेरिका भेज दिया गया था. तबसे लेकर अब तक हम न्याय के नाम पर खेले जा रहे इस गंदे खेल को अपनी आंखों से देख रहे हैं, जिसमें सरकार, पुलिस और सुप्रीम कोर्ट सहित पूरा न्यायिक तंत्र शामिल है. इस खेल में सुप्रीम कोर्ट का शामिल होना सबसे ज़्यादा चौंकाता है, क्योंकि किसी राजनीतिज्ञ या पुलिस अधिकारी के मुक़ाबले एएम अहमदी जैसे मुख्य न्यायाधीश से हम ज़्यादा पारदर्शी आचरण की अपेक्षा रखते हैं.

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बीटी बैगन पर रोक के वैज्ञानिक और लोकतांत्रिक पहलू

बीटी बैगन के इस्तेमाल पर पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने फिलहाल रोक की घोषणा की तो मीडिया में उसके ख़िला़फ आलोचनाओं का अंबार लग गया. कई लोगों ने तर्क दिए कि ऐसे फैसले वैज्ञानिकों के लिए छोड़ दिए जाने चाहिए. लेकिन यह मामला विज्ञान और विज्ञान विरोध का नहीं है.

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