सरकार को जनता का ध्यान रखना चाहिए, क्योंकि उसे मुसीबतों से बचाने के लिए रणनीति एवं योजनाएं बनाना उसी की ज़िम्मेदारी है. संविधान का अक्षरश: पालन हो, यह भी सुनिश्चित होना चाहिए. किसी भी सरकार या राजनीतिक दल को राजनीति देश एवं समाज को बांटने के लिए नहीं, बल्कि जोड़ने, विकास, जनता को रोजी-रोटी मुहैय्या [...]
Tags: अखिलेश यादव, खुफिया एजेंसी, गोरखपुर, जंगल, जल, ज़मीन, न्यायपालिका, पुल निर्माण, मुलायम सिंह यादव, वोट बैंक, सत्याग्रहियों पर गरम, सीरियल ब्लास्ट Posted in राजनीति, स्टोरी-6 by Author: अजय कुमार | No Comments » | Read More... |
जल, जंगल और ज़मीन ऐसे प्राकृतिक संसाधन हैं, जो इस देश के करोड़ों लोगों के जीवन का मूलभूत आधार हैं. सदियों से नदी के किनारे और जंगल में बसे लोगों का इन संसाधनों पर नैसर्गिक अधिकार रहा है. लेकिन सरकार नव-उदारवादी व्यवस्था की आड़ में आम आदमी को उसके इस अधिकार से वंचित करने की [...]
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आदिवासियों की पहचान जल, जंगल और ज़मीन से ज़रूर है, लेकिन प्राकृतिक संसाधनों के अत्यधिक दोहन के कारण उन्हें इन दिनों अपने मूल स्थान से विस्थापित होना प़ड रहा है. हालांकि वे अपने अधिकारों के लिए आवाज़ बुलंद कर रहे हैं, लेकिन अफ़सोस कि उनकी आवाज़ नक्कारख़ाने में तूती की आवाज़ ही साबित हो रही [...]
Tags: आज़ादी, आदिवासी, इतिहास, उच्च गुणवत्ता, कंपनियों, काठीकुंड, खनिज, जंगल, जल, ज़मीन, झारखंड, दुमका, देश, पदार्थ, पावर प्लांट, प्रकृति, प्राकृतिक संसाधनों, बिहार, राजनीतिक, राज्य, विरोध, विश्व, सरकारी मशीनरी, स्टील प्लांट Posted in कवर स्टोरी-2, पर्यावरण, राज्य by Author: शैलेंद्र सिन्हा | No Comments » | Read More... |
1990 में शुरू हुआ आर्थिक उदारीकरण अब अपना असर दिखा रहा है. ख़ुशहाली से भरे सपनों का गुब्बारा फटने लगा है. व्यवस्था के ख़िलाफ़ आक्रोश और व्यवस्था के प्रति नाराज़गी बढ़ती ही जा रही है. देश भर में हज़ारों आंदोलन चल रहे हैं और सभी आंदोलनों का मूल मुद्दा एक ही है, जल, जंगल और [...]
Tags: आंदोलन, आर्थिक उदारीकरण, उत्तर प्रदेश, किसान, कैदमुक्त, जंगल, जल, जवान, ज़मीन, दिल्ली, दिल्ली-मथुरा, देश, बच्चे, बुजुर्ग, ब्रजवासियों, भक्तों, महिलाएं, यमुना, यमुना रक्षक दल, रमेश बाबा, राजमार्ग, व्यवस्था, साधु-संत, सामाजिक, स्वच्छ जल, हथिनी कुंड, हरियाणा Posted in Crousel2, आंदोलन, कवर स्टोरी-2, राजनीति by Author: शशि शेखर | No Comments » | Read More... |
दुनिया की तमाम सभ्यताएं नदियों के किनारे ही परवान चढ़ी हैं, क्योंकि पानी के बिना ज़िंदगी का तसव्वुर भी नहीं किया जा सकता. हिंदुस्तान में भी नदियों के किनारे बस्तियां बसीं और कई सभ्यताएं फली-फूलीं. ख़ास बात तो यह है कि यहां के बाशिंदों ने नदियों को देवी मानकर उनकी पूजा तक की. इलाहाबाद में गंगा, [...]
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इंसान ही नहीं दुनिया की कोई भी नस्ल जल, जंगल और ज़मीन के बिना ज़िंदा नहीं रह सकती. ये तीनों हमारे जीवन का आधार हैं. यह भारतीय संस्कृति की विशेषता है कि उसने प्रकृति को विशेष महत्व दिया है. पहले जंगल पूज्य थे, श्रद्धेय थे. इसलिए उनकी पवित्रता को बनाए रखने के लिए मंत्रों का सहारा लिया गया. मगर गुज़रते व़क्त के साथ जंगल से जु़डी भावनाएं और संवेदनाएं भी बदल गई हैं.
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यूनेस्को ने यूनाइटेड नेशन्स वर्ल्ड वाटर डेवलपमेंट रिपोर्टः मैनेजिंग वाटर अंडर अनसर्टेंटी एंड रिस्क पेश की है. इस रिपोर्ट में 2009 के विश्व बैंक के दस्तावेज़ का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि भारत में विश्व बैंक के आर्थिक सहयोग से राष्ट्रीय गंगा नदी बेसिन प्राधिकरण ने 2009 में एक परियोजना चलाई थी, जिसका उद्देश्य 2020 तक बिना ट्रीटमेंट के नाली तथा उद्योगों के गंदे पानी को गंगा में छोड़े जाने से रोकना था, ताकि गंगा के पानी को सा़फ किया जा सके. गंगा के प्रदूषण के लिए खुली जल निकासी व्यवस्था सबसे अधिक ज़िम्मेदार है.
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1981 बैच के आईडीएएस अधिकारी सुनील कुमार कोहली जल संसाधन मंत्रालय में संयुक्त सचिव और वित्तीय सलाहकार बनाया गया है. वह अनन्या रे की जगह लेंगे.
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जल, थल और नभ, भ्रष्टाचार के कैंसर ने किसी को नहीं छोड़ा. जहां उंगली रख दीजिए, वहीं भ्रष्टाचार का जिन्न निकल आता है. बड़े घोटालों की बात अलग है. ऐसे सरकारी संगठन भी हैं, जिनके बारे में अमूमन आम आदमी नहीं जानता और इसी का फायदा उठाकर वहां के बड़े अधिकारी वह सब कुछ कर रहे हैं, जिसे संस्थागत भ्रष्टाचार की श्रेणी में आसानी से रखा जा सकता है.
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शहर हो या गांव, सरकारी विभागों को लेकर हर आदमी की परेशानी एक सी होती है. कभी बिजली विभाग, कभी जल विभाग, कभी टेलीफोन विभाग. चूंकि इन सभी विभागों से आपका साबका पड़ता है और जब कोई काम समय से न हो रहा हो, तब परेशान होना स्वाभाविक है.
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प्रदूषण वायु, जल और धरती की भौतिक, रासायनिक और जैविक विशेषताओं का एक ऐसा अवांछनीय परिवर्तन है, जो जीवन को हानि पहुंचा सकता है. दुनिया भर में हो रहे तथाकथित विकास की प्रक्रिया ने प्रकृति एवं पर्यावरण के सामंजस्य को झकझोर दिया है. इस असंतुलन के चलते लद्दा़ख जैसे सुंदर क्षेत्र भी प्रदूषण जैसी समस्या से प्रभावित हुए हैं.
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अयोध्या-खिफैज़ाबाद शहरों को अपने आंचल में समेट, युगों-युगों से लोगों को पुण्य अर्जन कराती सरयू नदी की कोख भी अब मैली हो चली है. सरयू का पवित्र जल तो दूषित हुआ ही, भूजल में भी हानिकारक रसायनों की मात्रा बढ़ती जा रही है. दोनों शहरों के क़रीब दो दर्जन इंडिया मार्का हैंडपंपों में नाइट्रेट, आयरन आदि तत्वों की अधिकता पाई गई है.
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जनता एक ज़िम्मेदार संसद का निर्माण करे |
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