छत्तीसगढ़ में विकास कार्यों में 2168 करोड़ रुपए की अनियमितता : ग़रीब प्रदेश में ‘विकास’ की लूट

बात एक ऐसे प्रदेश की जिसे प्रकृति ने समृद्ध-संपन्न बनाया, लेकिन प्रशासनिक अकुशलता, सरकारी काहिली, नीतियों और दूरदृष्टि के अभाव

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गंगा बचाओ अभियान : लौटा द नदिया हमार

बिहार के मुजफ्फरपुर स्थित लंगट सिंह कॉलेज में बीते दिनों गंगा समाज के प्रतिनिधियों, साहित्यकारों, कलाकारों, वैज्ञानिकों, इंजीनियरों, समाजशास्त्रियों, संस्कृतिकर्मियों,

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अखिलेश राज की रणनीति – आतंकियों पर नरम सत्याग्रहियों पर गरम?

सरकार को जनता का ध्यान रखना चाहिए, क्योंकि उसे मुसीबतों से बचाने के लिए रणनीति एवं योजनाएं बनाना उसी की

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जल, जंगल और ज़मीन बचाने में जुटे आदिवासी

आदिवासियों की पहचान जल, जंगल और ज़मीन से ज़रूर है, लेकिन प्राकृतिक संसाधनों के अत्यधिक दोहन के कारण उन्हें इन

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प्रकृति से जु़डी है हमारी संस्कृति

इंसान ही नहीं दुनिया की कोई भी नस्ल जल, जंगल और ज़मीन के बिना ज़िंदा नहीं रह सकती. ये तीनों हमारे जीवन का आधार हैं. यह भारतीय संस्कृति की विशेषता है कि उसने प्रकृति को विशेष महत्व दिया है. पहले जंगल पूज्य थे, श्रद्धेय थे. इसलिए उनकी पवित्रता को बनाए रखने के लिए मंत्रों का सहारा लिया गया. मगर गुज़रते व़क्त के साथ जंगल से जु़डी भावनाएं और संवेदनाएं भी बदल गई हैं.

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भारतीय जल नीति के खतरे

यूनेस्को ने यूनाइटेड नेशन्स वर्ल्ड वाटर डेवलपमेंट रिपोर्टः मैनेजिंग वाटर अंडर अनसर्टेंटी एंड रिस्क पेश की है. इस रिपोर्ट में 2009 के विश्व बैंक के दस्तावेज़ का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि भारत में विश्व बैंक के आर्थिक सहयोग से राष्ट्रीय गंगा नदी बेसिन प्राधिकरण ने 2009 में एक परियोजना चलाई थी, जिसका उद्देश्य 2020 तक बिना ट्रीटमेंट के नाली तथा उद्योगों के गंदे पानी को गंगा में छोड़े जाने से रोकना था, ताकि गंगा के पानी को सा़फ किया जा सके. गंगा के प्रदूषण के लिए खुली जल निकासी व्यवस्था सबसे अधिक ज़िम्मेदार है.

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सुनील कुमार जेएस एंड एफए बने

1981 बैच के आईडीएएस अधिकारी सुनील कुमार कोहली जल संसाधन मंत्रालय में संयुक्त सचिव और वित्तीय सलाहकार बनाया गया है. वह अनन्या रे की जगह लेंगे.

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जल संसाधन मंत्रालयः एनपीसीसी में यह क्‍या हो रहा है

जल, थल और नभ, भ्रष्टाचार के कैंसर ने किसी को नहीं छोड़ा. जहां उंगली रख दीजिए, वहीं भ्रष्टाचार का जिन्न निकल आता है. बड़े घोटालों की बात अलग है. ऐसे सरकारी संगठन भी हैं, जिनके बारे में अमूमन आम आदमी नहीं जानता और इसी का फायदा उठाकर वहां के बड़े अधिकारी वह सब कुछ कर रहे हैं, जिसे संस्थागत भ्रष्टाचार की श्रेणी में आसानी से रखा जा सकता है.

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पाठकों के पत्र समस्या और सुझाव

शहर हो या गांव, सरकारी विभागों को लेकर हर आदमी की परेशानी एक सी होती है. कभी बिजली विभाग, कभी जल विभाग, कभी टेलीफोन विभाग. चूंकि इन सभी विभागों से आपका साबका पड़ता है और जब कोई काम समय से न हो रहा हो, तब परेशान होना स्वाभाविक है.

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लद्दाख का बदलता पर्यावरण

प्रदूषण वायु, जल और धरती की भौतिक, रासायनिक और जैविक विशेषताओं का एक ऐसा अवांछनीय परिवर्तन है, जो जीवन को हानि पहुंचा सकता है. दुनिया भर में हो रहे तथाकथित विकास की प्रक्रिया ने प्रकृति एवं पर्यावरण के सामंजस्य को झकझोर दिया है. इस असंतुलन के चलते लद्दा़ख जैसे सुंदर क्षेत्र भी प्रदूषण जैसी समस्या से प्रभावित हुए हैं.

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मैली हो गई पतित पावनी सरयू नदी

अयोध्या-खिफैज़ाबाद शहरों को अपने आंचल में समेट, युगों-युगों से लोगों को पुण्य अर्जन कराती सरयू नदी की कोख भी अब मैली हो चली है. सरयू का पवित्र जल तो दूषित हुआ ही, भूजल में भी हानिकारक रसायनों की मात्रा बढ़ती जा रही है. दोनों शहरों के क़रीब दो दर्जन इंडिया मार्का हैंडपंपों में नाइट्रेट, आयरन आदि तत्वों की अधिकता पाई गई है.

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मरती नदियां, उजड़ता बुंदेलखंड

चंबल, नर्मदा, यमुना और टोंस आदि नदियों की सीमाओं में बसने वाला क्षेत्र बुंदेलखंड तेज़ी से रेगिस्तान बनने की दिशा में अग्रसर है. केन और बेतवा को जोड़कर इस क्षेत्र में पानी लाने की योजना मुश्किलों में फंस गई है. जो चंदेलकालीन हज़ारों तालाब बुंदेलखंड के भूगर्भ जल स्रोतों को मज़बूती प्रदान करते थे, वे पिछले दो दशकों के दौरान भू-मा़फिया की भेंट चढ़ गए हैं.

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पानी पर सबका हक़ है

जल ही जीवन है. वाक़ई पानी के बिना ज़िंदगी की कल्पना भी नहीं की जा सकती, लेकिन अ़फसोस की बात यह है कि जहां एक तऱफ करोड़ों लोग बूंद-बूंद पानी को तरस रहे हैं, वहीं इतने ही लोग ज़रूरत से ज़्यादा पानी का इस्तेमाल करके इसे बर्बाद करने पर आमादा हैं. जब हम पानी पैदा नहीं कर सकते तो फिर हमें इसे बर्बाद करने का क्या हक़ है?

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घटता पानी, बढ़ती प्यास

बेतवा, शहजाद, केन, धसान, मंदाकिनी, यमुना, जामनी, एवं सजनाम जैसी सदा नीरा नदियां होने के बावजूद पानी के लिए तरस रहे लोगों के दर्द को समझना बड़ा कठिन है. बुंदेलखंड में जल युद्ध होने से कोई रोक नहीं सकता.

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आगराः जल संकट और सरकारी भ्रष्‍टाचार

पश्चिमी उत्तर प्रदेश आज जल संकट की ज़बरदस्त मार झेल रहा है. यहां आज पीने और कृषि दोनों के लिए पानी की कमी है. जब पीने को पानी नहीं रहेगा और न ही कृषि के लिए, तो जनजीवन का क्या होगा? आज इसी सवाल से पश्चिमी उत्तर प्रदेश की जनता दो-दो हाथ कर रही है.

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गंगोत्री में ही गंगा मैली

हर धर्म की अपनी मान्यताएं-परंपराएं होती हैं. आस्था को विज्ञान की कसौटी पर नहीं कसा जा सकता, किंतु ऐसा भी नहीं कि उसमें कोई तर्क न हो. यदि धर्म न हो तो समाज में समरसता, भाईचारा और उल्लास देखने को न मिले.

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पूर्वोत्तर को रेगिस्‍तान बनाने की साजिश

ब्रह्मपुत्र पर पूर्ण नियंत्रण की चीनी साजिश को अगर भारत गंभीरता से नहीं लेगा तो आने वाले कुछ वर्षों में देश के पूर्वोत्तर क्षेत्र की जीवन रेखा कही जाने वाली ब्रह्मपुत्र नदी का अस्तित्व ही मिट सकता है. जाने-माने पर्यावरणविद् सुंदर लाल बहुगुणा एवं कई अन्य सामाजिक संगठनों ने चीन की इस नीयत को गंभीरता से लेते हुए इसके ख़िला़फ विश्व मंच पर आवाज़ उठाने की मुहिम शुरू करने का आह्वान भारत सरकार से किया है.

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भागीरथी में कम होता जल प्रवाह

देवभूमि हरिद्वार में गंगा का अभी से बुरा हाल हो गया है. गंगा की अविछिन्न आपूर्ति धारा में गंगाजल का प्रवाह न होने से धर्म नगरी में श्रद्धालुओं द्वारा बनाए गये दर्जन भर से अधिक घाट अभी से जलविहीन हो गये है.

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मनरेगा का काला सच

बीते तीन सालों से तमाम आशंकाओं और अटकलों के बीच देश में ठीक-ठाक बारिश होती रही है. औसत बारिश का 78 प्रतिशत, जैसा कि विशेषज्ञ बताते हैं. दैनिक ज़रूरतों और दूसरे कामों के लिए हमें जितना पानी चाहिए, उससे दोगुनी मात्रा में पानी बरस कर जल- संकायों एवं धरती के गर्भ में जमा हो रहा है.

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बैकफुट पर निशंक सरकार

उत्तराखंड सरकार ने विवादित जल विद्युत परियोजना रद्द कर दी है. सरकार के इस फैसले से विपक्ष खासा नाराज़ है. इसके पहले विपक्ष ने सदन के अंदर और बाहर आरोप लगाया था कि 54 जल विद्युत परियोजनाओं के आवंटन में मुख्यमंत्री निशंक एवं उनकी सरकार के हाथ भ्रष्टाचार में सने हुए हैं.

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जल, जंगल और जमीन बचाने की मुहिम

राज्य के 250 स्वयंसेवी संगठनों ने एक नई जल नीति बनाकर निशंक सरकार को उसका मसौदा सौंप दिया है. संगठनों का कहना है कि अगर सरकार पहाड़ के पानी को बचाना चाहती है तो उसे जल, जंगल एवं ज़मीन के संदर्भ में जनता की आकांक्षाओं के अनुरूप नीति बनानी और लागू करनी होगी.

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भूमाफिया लील रहे हैं तालाब

जल समस्या से निपटने के लिए मध्य प्रदेश सरकार की जल संवर्धन और जल संरक्षण नीति में करोड़ों रुपए खर्च करने के बाद सतना ज़िले को पानी की समस्या से उबारा नहीं जा सका है. ये सभी नीतियां फिलव़क्त तक अप्रभावी हैं. 25 जुलाई 2001 को सुप्रीम कोर्ट ने आज़ादी के पूर्व से अस्तित्व में रहे तालाबों को अतिक्रमणकारियों के क़ब्ज़े से मुक्त कराकर पुन: तालाब के रूप में विकसित किया जाने का फरमान जारी किया गया था.

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