अखिलेश राज की रणनीति – आतंकियों पर नरम सत्याग्रहियों पर गरम?

सरकार को जनता का ध्यान रखना चाहिए, क्योंकि उसे मुसीबतों से बचाने के लिए रणनीति एवं योजनाएं बनाना उसी की

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जल,जंगल और ज़मीन – आखिर सरकार किसके लिए कानून बनाती है?

जल, जंगल और ज़मीन ऐसे प्राकृतिक संसाधन हैं, जो इस देश के करोड़ों लोगों के जीवन का मूलभूत आधार हैं.

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मेवात के जोहड़ और गंवई दस्तूर

भारत एक कृषि प्रधान देश है. इसलिए प्राचीनकाल से ही यहां तालाबों का महत्वपूर्ण स्थान रहा है. तालाब उपयोगी होने

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जल, जंगल और ज़मीन बचाने में जुटे आदिवासी

आदिवासियों की पहचान जल, जंगल और ज़मीन से ज़रूर है, लेकिन प्राकृतिक संसाधनों के अत्यधिक दोहन के कारण उन्हें इन

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एक आंदोलन- ताकि यमुना कैदमुक्त हो

1990 में शुरू हुआ आर्थिक उदारीकरण अब अपना असर दिखा रहा है. ख़ुशहाली से भरे सपनों का गुब्बारा फटने लगा

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नया भूमि अधिग्रहण विधेयक किसानों के खिलाफ साजिश

भूमि अधिग्रहण एवं पुनर्स्थापना एवं पुनर्वास विधेयक संसद के मॉनसून सत्र में भी पेश नहीं हो सका. यह विधेयक कब पेश होगा और देश के करोड़ों किसानों की परेशानियां कब खत्म होंगी, यह कोई नहीं बता सकता. मौजूदा समय में देश के अंदर जबरन भूमि अधिग्रहण के विरोध में छोटे-बड़े सैकड़ों आंदोलन चल रहे हैं. अब नंदीग्राम, सिंगुर, भट्टा पारसौल, नगड़ी, जैतापुर और कुडनकुलम जैसे हालात कई राज्यों में पैदा हो गए हैं.

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भूमि अधिग्रहण और पुनर्वास व पुनर्स्‍थापन अधिनियम (संशोधन) 2011 : नई हांडी में पुरानी खिचड़ी

नए भूमि अधिग्रहण क़ानून को लेकर देश भर की निगाहें संसद और केंद्र सरकार पर टिकी हुई हैं. जबरन भूमि अधिग्रहण के विरोध में आंदोलित कई राज्यों में सैकड़ों ग़रीब किसानों एवं आदिवासियों को पुलिस की गोलियों का शिकार होना पड़ा. उनका दोष स़िर्फ इतना था कि वे किसी भी क़ीमत पर अपनी पुश्तैनी ज़मीन देने के लिए तैयार नहीं थे. ब्रिटिश शासन के दौरान अंग्रेजों ने भूमि अधिग्रहण अधिनियम 1894 बनाया था.

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पूंजी-विकास के माध्यम

इस परिस्थिति को संभालने के लिए, जैसा स्वाभाविक है, एक तीसरी श्रेणी, जो इन दो श्रेणियों का जोड़-तोड़ बैठा सके, खड़ी हुई. यह तीसरी श्रेणी मध्यम श्रेणी के नाम से पुकारी जाती है. यह मध्यम श्रेणी किस तरह से उत्पन्न हुई, इसका भी विचित्र इतिहास है. राजा, ठाकुर या जमींदार भूमि के स्वामी थे.

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जान देंगे, ज़मीन नहीं

बिहार राज्य विद्युत बोर्ड द्वारा बरौनी ताप विद्युत संयंत्र का विस्तारीकरण किया जाना है. राज्य मंत्रिमंडल ने 3666 करोड़ रुपये की इस योजना को स्वीकृति प्रदान कर दी है. सरकार का कहना है कि फिलहाल 2250 मेगावॉट क्षमता वाले कोयला आधारित विद्युत संयंत्र की स्थापना होगी.

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अलिराजपुरः बांध के बंधक : विस्थापितों का ज़मीन हक़ सत्याग्रह

ज़मीन जीवन का आधार है और इस नव उदारवादी समाज का सबसे महंगा उत्पाद भी. ज़मीन किसानों, आदिवासियों और मजदूरों के घरों के चूल्हों की आग गर्म बनाए रखने के लिए ज़रूरी है, पूंजीपतियों के लिए यह कुबेर का खजाना पाने का एक साधन है और सरकार के लिए लोगों को विकास का सपना दिखाने के लिए एक संसाधन.

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कटनीः सजा ली चिता, अब ज़मीन लेंगे या जान देंगे

कटनी के विजय राघवगढ़ एवं बरही तहसीलों के दो गांवों डोकरिया और बुजबुजा के किसानों की दो फसली खेतिहर ज़मीनें वेलस्पन नामक कंपनी के ऊर्जा उत्पादक उद्योग हेतु अधिग्रहीत करने के संबंध में दाखिल सैकड़ों आपत्तियों एवं असहमति को शासन ने दरकिनार कर दिया.

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फालतू धन की माया

ज़मीन या मकान ही ऐसी निजी संपत्ति नहीं थी जिसकी आय पर आदमी बिना कुछ करे घर बैठे खाता-पीता रहे. किराये के धन से भी कहीं ज़्यादा जो फालतू धन लोगों के पास पड़ा है, उसका किराया पूंजीवादियों की दूसरी निजी संपत्ति है. फालतू धन के किराये को हम ब्याज़ के नाम से पुकारते हैं.

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महाराष्‍ट्रः राजनाथ का विदर्भ दौरा सवालों के घेरे में

भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता एवं पूर्व अध्यक्ष राजनाथ सिंह की विदर्भ यात्रा पर अब सवाल उठाए जा रहे हैं. उनकी इस यात्रा को कुछ संगठन व्यक्तिगत यात्रा तक क़रार दे रहे हैं और पार्टी की नीति पर भी प्रश्नचिन्ह लग रहे हैं. भाजपा नेताओं की औद्योगिक इकाइयों द्वारा भी किसानों की ज़मीन हड़पने का आरोप लगाया जा रहा है. इससे राजनाथ की विदर्भ यात्रा विफल होती लग रही है.

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नया ज़मीन घोटाला

ऐसा नहीं है कि भारत में स़िर्फ लालची बिल्डरों ने ही मुना़फे के लिए उम्दा ज़मीनों का अधिग्रहण किया है. अगर सरकार को भी मौक़ा मिला है तो वह भी ऐसा करने से नहीं चूकती.

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