न्‍याय के लिए हम कहां जाएं

कुछ ही दिन पहले की बात है, जब सुबह-सुबह मेरे पास एक फोन आया. गुजरात के मुंद्रा समुद्र तट से मेरे एक मित्र ने फोन किया और एक ऐसा सवाल किया, जिसका जवाब हमें पहले ही मिल गया होना चाहिए था. कच्छ के मुंद्रा तटीय क्षेत्र की पारिस्थितिकीय संरचना वैसे ही कमज़ोर हो चुकी है, इसके बावजूद इस इलाक़े में 300 मेगावाट के थर्मल पावर प्लांट को ग़लत तरीक़े से एन्वॉयरोंमेंटल क्लियरेंस दे दिया गया. स्थानीय मछुआरे समुदायों ने इसके विरोध में अपनी सारी ताक़त लगा दी, लेकिन मेरे मित्र ने सूचना दी कि प्लांट को लेकर काम शुरू किया जा रहा है. उसने मुझसे यह भी पूछा कि मामले की अगली सुनवाई कब होनी है. मैंने उसे यह समझाने की भरपूर कोशिश की कि हम आज असहाय होकर क्यों रह गए हैं, लेकिन मेरा अंदाज़ा है कि ऐसी परिस्थितियों से रूबरू लोगों को समझाना खासा मुश्किल होता है, खासकर यदि वे ऐसी परियोजनाओं से सीधे तौर पर प्रभावित हो रहे हों. मैं उसे यह कैसे समझा सकती थी कि थर्मल प्लांट को पर्यावरणीय क्लियरेंस दिए जाने के ख़िला़फ जिस संस्थान में मामला दर्ज किया गया है, वह अब अस्तित्व में ही नहीं है. फिर उन्हें यह भी कैसे समझाया जा सकता है कि पुराने निकाय की जगह जिस नए निकाय का गठन किया जाना है और जहां इस मामले की सुनवाई होनी है, उसका गठन अभी तक नहीं किया गया है.

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कंधमाल हिंसा: यह आग कब और कैसे बुझेगी?

ईसा मसीह की टूटी मूर्ति, अधजले धर्मग्रंथ, जले घर, घर से बाहर झांकता एक मासूम चेहरा और तिलक-चंदन लगाकर लोगों को फिर से हिंदू बनाने का आयोजन. यह कहानी वे तस्वीरें ख़ुद बयां करती हैं, जो कंधमाल में अल्पसंख्यक ईसाइयों के ख़िला़फ हिंसा के दौरान या उसके बाद ली गई हैं.

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जैव विविधता क़ानून में बदलाव और ग्रीन ट्रिब्यूनल

दो जून 2010 को भारत का ग्रीन ट्रिब्यूनल क़ानून अस्तित्व में आ गया. 1992 में रियो में हुई ग्लोबल यूनाइटेड नेशंस कॉन्फ्रेंस ऑन एन्वॉयरमेंट एंड डेवलपमेंट के फैसले को स्वीकार करने के बाद से ही देश में इस क़ानून का निर्माण ज़रूरी हो गया था.

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