दवा कंपनियां, डॉक्‍टर और दुकानदार: आखिर इस मर्ज की दवा क्‍या है

दवा, डॉक्टर एवं दुकानदार के प्रति भोली-भाली जनता इतना विश्वास रखती है कि डॉक्टर साहब जितनी फीस मांगते हैं, दुकानदार जितने का बिल बनाता है, को वह बिना किसी लाग-लपेट के अपना घर गिरवी रखकर भी चुकाती है. क्या आप बता सकते हैं कि कोई घर ऐसा है, जहां कोई बीमार नहीं पड़ता, जहां दवाओं की ज़रूरत नहीं पड़ती? यानी दवा इस्तेमाल करने वालों की संख्या सबसे अधिक है. किसी न किसी रूप में लगभग सभी लोगों को दवा का इस्तेमाल करना पड़ता है, कभी बदन दर्द के नाम पर तो कभी सिर दर्द के नाम पर.

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जेलों में बढ़ती मुसलमानों की आबादी

आज से 65 वर्ष पूर्व जब देश स्वतंत्र हुआ था तो सबने सोचा था कि अब हम विकास करेंगे. आज़ाद देश में नागरिकों के अधिकारों की सुरक्षा की जाएगी. छुआछूत, जाति-पांत और भेदभाव का अंत होगा. हर धर्म से जुड़े लोग एक भारतीय के रूप में आपस में भाईचारे का जीवन व्यतीत करेंगे. धार्मिक घृणा को धर्मनिरपेक्ष देश में कोई स्थान प्राप्त नहीं होगा. यही ख्वाब राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने देखा था और यही आश्वासन संविधान निर्माताओं ने संविधान में दिया था, लेकिन आज 65 साल बीत जाने के बाद यह देखकर पीड़ा होती है कि जाति-पांत की सियासत हमारे देश की नियति बन चुकी है.

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नो टेंशन, मोटापा

स्पेनिश नेशनल कैंसर रिसर्च सेंटर ने प्टेन जीन को लेकर काम तो यह शुरू किया था, ताकि कैंसर सेल पर शोध की जा सके. शोध आगे बढ़ा तो पता चला कि इस जीन को यदि थोड़ा-सा बदल दिया जाए तो कैंसर के साथ मोटापे की समस्या से भी निजात पाई जा सकती है.

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पेट में क़लम

रोज़मर्रा की ज़िंदगी में कुछ न कुछ नया होता दिखाई या सुनाई पड़ जाता है. दुनिया अजीबोग़रीब ख़बरों से भरी पड़ी है. ऐसी ही एक घटना लंदन में हुई, जहां एक 76 वर्षीय महिला के पेट से 25 सालों बाद पेन निकाला गया. कुछ दिनों पहले इस महिला के पेट में तेज़ दर्द उठा था.

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चिकित्सा अब समाजसेवा नहीं

कुछ दिनों पहले उत्तर प्रदेश के बिजनौर ज़िले के भोगनवाला गांव निवासी शमशाद (25) को उसके परिवारीजन इलाज के लिए ज़िला अस्पताल लेकर पहुंचे, जहां डॉक्टरों ने उसके फेफड़ों में पानी होने की बात कहते हुए भर्ती करने से इंकार कर दिया. मरीज के परिवारीजन डॉक्टरों से घंटों मिन्नतें करते रहे, मगर अस्पताल प्रशासन अपने रवैये पर अड़ा रहा.

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कलम का कमाल

एक ख़बर के मुताबिक़, एक महिला के पेट में 25 वर्षों तक रहने के बावजूद एक कलम अभी भी काम कर रही है. यह 76 वर्षीय महिला लगातार कम हो रहे वजन और डायरिया से परेशान होकर डॉक्टर के पास पहुंची.

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बढ़ती हुई पूंजी का अप्रत्यक्ष रूप

आप अपने से पहला प्रश्न यह पूछिए कि दैनिक जीवन में यह असमान वित्त वितरण आपको खटकता कहां है? उत्तर स्पष्ट है. आप आवश्यक सामान ख़रीदने बाज़ार जाते हैं. वहां आप आटा, दाल, गोभी, मटर, घी, तेल इत्यादि खाने का सामान खरीदते हैं.

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मौसम

एक एक्टर के रूप में पंकज कपूर कितने बेहतरीन हैं, यह बताने की ज़रूरत नहीं है. जाने भी दो यारों, एक डॉक्टर की मौत, एक रुका हुआ फैसला और धर्म जैसी कई फिल्में इस बात की गवाह हैं. टीवी धारावाहिक करमचंद और ऑफिस-ऑफिस के ज़रिए उन्होंने काफी लोकप्रियता हासिल की

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ईश्वरीय सेवा के निमित्त

कभी आपने सोचा कि कोई व्यक्ति महात्मा, साधु-संत क्यों बनता है और कोई गृहस्थ व्यापारी, चोर, डाकू, वैज्ञानिक, डॉक्टर या भिखारी क्यों बनता है?

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मगध मेडिकल कॉलेजः यहां इलाज नहीं बाकी सब होता है

सपना था, मगध मेडिकल कॉलेज अस्पताल को एशिया स्तर के अस्पतालों की सूची में सबसे अव्वल रखना, लेकिन सरकारीकरण होने के साथ ही मेडिकल कॉलेज की बुनियाद रखने वाले सदस्यों का सपना एक-एक कर टूटता चला गया. सेवा, सहिष्णुता और प्रेम का पाठ सिखलाने की बजाए यहां हिंसा का पाठ प़ढाया जाने लगा.

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तिरुपति होम्स कैंसर अस्पताल बनाएगा

तिरुपति होम्स ने अपनी सामाजिक ज़िम्मेदारियों को पूरा करते हुए दरभंगा में एक कैंसर अस्पताल भवन के निर्माण की घोषणा की है. तिरुपति होम्स लिमिटेड के सीएमडी शशिभूषण सिन्हा ने बताया कि छह करोड़ की लागत से बनने वाले अस्पताल भवन का पूरा खर्चा कंपनी उठाएगी.

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लगन बनाम लालफीताशाहीः एक डॉक्‍टर की अजब कहानी

लगन और एकाग्रचित्तता बनाम तिकड़म और लालफीताशाही की यह नायाब कहानी है. कानपुर के प्रसिद्ध होम्योपैथिक चिकित्सक डॉ. पी के सचान ने दोबारा मेहनत कर के सीपीएमटी की परीक्षा केवल इसलिए पास की थी, क्योंकि उन्हें फार्माकोलॉजी की पढ़ाई पूरी करनी थी.

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नेचुरोपैथीः दिल्ली का एक अस्पताल ऐसा भी…

फादर ऑफ मेडिसिन हिप्पोक्रेट्‌स ने कहा है कि एक बीमार आदमी को प्रकृति ठीक करती है न कि एक डॉक्टर. आज हालात ठीक इसके उलट हैं. आज इंसान प्रकृति से दूर हो गया है. डॉक्टरों की संख्या और दवाइयों की खोज तो बढ़ती गई, लेकिन उसी अनुपात में बीमारियां भी बढ़ती जा रही हैं. एलोपैथी दवा खा-खाकर भी आज इंसान रोगमुक्त नहीं हो पा रहा है.

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सरकारी अस्पताल में दवाई नहीं मिलती!

देश के कुछ राज्यों में सरकारी अस्पताल का नाम लेते ही एक बदहाल सी इमारत की तस्वीर जेहन में आ आती है. डॉक्टरों की लापरवाही, बिस्तरों एवं दवाइयों की कमी, चारों तऱफ फैली गंदगी के बारे में सोच कर आम आदमी अपना इलाज सरकारी अस्पताल के बजाय किसी निजी नर्सिंग होम में कराने का फैसला ले लेता है.

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सार-संक्षेप

आय से अधिक संपत्ति रखने और सरकारी नियमों के अनुसार उसका खुलासा न करने के आरोप में लोक निर्माण विभाग के कार्यपालन यंत्री महेंद्र सिंह चौहान को विशेष न्यायालय जबलपुर ने एक वर्ष के सश्रम कारावास और 50 हज़ार रुपये के ज़ुर्माने से दंडित किया है. महेंद्र सिंह चौहान जब जबलपुर में इंजीनियर पद पर कार्यरत थे, तब 24 फरवरी 1995 को लोकायुक्त-पुलिस ने उनके आवास पर छापा मारकर लाखों रुपये की अघोषित चल-अचल संपत्ति का पता लगाया था.

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