यह ट्रंप शैली की तानाशाही है

कुछ समय से हम इस बात पर जोर दे रहे हैं कि शासन करने के डोनाल्ड ट्रंप के तरीके  का

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हमें किस हवा के साथ बहना चाहिए?

दुनिया में बहुत सारे देश हैं, जिनमें सरकार, पुलिस, सेना और अदालत एक तरह से सोचते हैं, एक तरह से फैसला लेते हैं और मिलजुल कर देश की संपदा और जनता पर राज करते हैं, लेकिन बहुत सारे देश ऐसे हैं, जहां एक-दूसरे के फैसलों के ऊपर गुण-दोष के आधार पर यह तय होता है कि एक पक्ष दूसरे का साथ दे या न दे.

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मिस्र : हमला लोकतांत्रिक रवैया नहीं

होस्नी मुबारक के विरोध में जब मिस्र में आंदोलन किया गया था, तब ऐसा लगा था कि इस देश में बदलाव आएगा, लोकतंत्र की बहाली होगी, लोगों की भावनाओं का आदर किया जाएगा, लोकतांत्रिक तरीके से चुनाव होंगे और चुनाव में जनता जिसे समर्थन देगी, उसे सभी दल के लोग मानेंगे, लेकिन राष्ट्रपति के चुनाव के साथ ही दलों की मानसिकता सामने आने लगी है.

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लीबिया पर हमलाः असली मंसूबे कुछ और हैं

अमेरिका, फ्रांस एवं इंग्लैंड ने लीबिया को हवाई उड़ान प्रतिबंधित क्षेत्र घोषित करने संबंधी संयुक्त राष्ट्र संघ के प्रस्ताव को लागू करने में जो तत्परता दिखाई, वह इन देशों के साम्राज्यवादी लक्ष्यों के अनुरूप है. इन्हीं तीनों देशों ने 19वीं एवं 20वीं सदी में लगभग आधी दुनिया को अपना ग़ुलाम बनाया था. इंग्लैंड एवं फ्रांस ने यह काम प्रत्यक्ष ढंग से किया था और अमेरिका ने अप्रत्यक्ष ढंग से.

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जनता की ताक़त सबसे बड़ा हथियार है

मध्य पूर्व और उत्तरी अफ्रीका में आए ख़ास सुनामी (जनांदोलन) का परिणाम अभी स्पष्ट नहीं है, लेकिन इसका असर गहरा होगा. अब तक ट्यूनीशिया और मिस्र ख़ुद को बदल चुके हैं. अब हम यमन, बहरीन और सीरिया में परिणाम की प्रतीक्षा कर रहे हैं. ओमान से भी ऐसी ही ख़बर आ रही है और सऊदी अरब में भी इसकी संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता.

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सेना मुग्ध, जनता क्षुब्ध

पहले ट्यूनीशिया, फिर मिस्र के बाद लीबिया में मोअम्मर गद्दा़फी के तानाशाही शासन के विरुद्ध जन विद्रोह भड़का तो लगा कि अब गद्दा़फी का हश्र भी ट्यूनीशिया और मिस्र के शासकों की तरह होगा, लेकिन यहां की कहानी लगातार बदलती जा रही है.

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मिस्र का सत्‍ता परिवर्तनः तानाशाही नहीं चलेगी

मिस्र के इतिहास में 11 फरवरी, 2011 का दिन उस समय दर्ज हो गया, जब देश की सत्ता पर 30 वर्षों तक क़ाबिज रहने वाले 82 वर्षीय राष्ट्रपति होस्नी मुबारक को भारी जनाक्रोश के चलते राजधानी काहिरा स्थित अपना आलीशान महल अर्थात राष्ट्रपति भवन छोड़कर शर्म-अल-शेख़ भागना पड़ा. तमाम अन्य देशों के स्वार्थी, क्रूर एवं सत्तालोभी तानाशाहों की तरह मिस्र में भी राष्ट्रपति होस्नी मुबारक ने अपनी प्रशासनिक पकड़ बेहद मज़बूत कर रखी थी.

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प्रजातंत्र, तानाशाही और अन्न स्वराज

बीटी-बैगन के मुद्दे पर भारत में छिड़ी बहस ने यह स्पष्ट कर दिया है कि देश का कृषक और उपभोक्ता वर्ग जीएम फूड्‌स के पक्ष में नहीं है. सेंटर फॉर एंवायरमेंट एजूकेशन, जिसने पर्यावरण मंत्रालय की ओर से इस बहस का आयोजन किया, के अतुल पांड्या ने इससे संबंधित रिपोर्ट पेश की. बहस में देश भर के किसानों ने भाग लिया और अपने अनुभव बांटे.

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