राजनीतिक दलों का रवैया गुस्सा दिलाता है

महाभारत शायद आज की सबसे बड़ी वास्तविकता है. इस महाभारत की तैयारी अलग-अलग स्थलों पर अलग तरह से होती है और लड़ाई भी अलग से लड़ी जाती है, लेकिन 2013 और 2014 का महाभारत कैसे लड़ा जाएगा, इसका अंदाज़ा कुछ-कुछ लगाया जा सकता है, क्योंकि सत्ता में जो बैठे हुए लोग हैं या जो सत्ता के आसपास के लोग हैं, वे धीरे-धीरे इस बात के संकेत दे रहे हैं कि वे किन हथियारों से लड़ना चाहते हैं.

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क्षेत्रीय दलों का गठबंधन एक विकल्प है

जब जवाहर लाल नेहरू सत्तर साल के हो गए तो उन्होंने सेवानिवृत होना चाहा. लेकिन उनकी पार्टी ने उन्हें ऐसा करने नहीं दिया. उनके अंतिम पांच साल का़फी कठिनाइयों भरे रहे. विशेष तौर पर चीन द्वारा भारत पर आक्रमण करने के मुद्दे और रक्षा मंत्री पर लगने वाले आरोपों के कारण. नेहरू की ताक़त खत्म होने के साथ ही क्षेत्रीय नेताओं के सिंडिकेट का उदय हुआ.

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सरकार आर्थिक अत्याचार बंद करे

हिंदुस्तान में एक अजीब चीज है. महंगाई बढ़ाने में सरकार को बहुत मज़ा आता है. सरकार जानबूझ कर महंगाई बढ़ाती है या ऐसा करना सरकार की मजबूरी है, यह सरकार जाने, वे अर्थशास्त्री जानें, जो झूठे आंकड़े तैयार करते हैं, लेकिन हिंदुस्तान के लोगों की ज़िंदगी कितनी मुश्किल हो रही है, यह बात न राजनीतिक दल समझ रहे हैं और न सरकार समझ रही है.

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असमः हर दल की प्रतिष्‍ठा दांव पर

राज्य में विधानसभा चुनाव के परिणाम को लेकर जो अनुमान लगाए जा रहे हैं, उनके मुताबिक़ कांग्रेस पार्टी बहुमत से पिछड़ रही है और अन्य दलों को भी का़फी कम सीटें मिलेंगी. ऐसे में राज्य में त्रिशंकु विधानसभा के आसार बढ़ गए हैं और चुनाव परिणाम चौंकाने वाले हो सकते हैं. इस बार राज्य विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने अपनी पूरी ताक़त झोंक दी है.

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उत्तराखंड क्रांति दल की कलह सतह पर

उत्तराखंड राज्य निर्माण में महती भूमिका निभाने वाला, अपने जन आंदोलनों के लिए विख्यात उक्रांद अब अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है. राज्य में भारतीय जनता पार्टी सरकार के गठन में पार्टनर की भूमिका अदा कर सत्ता का सुख भोगने वाले इस दल के नेता इन दिनों अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे है.

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सियासी दोस्ती में दरार विपक्षी दलों में बहार

सियासत और सत्ता भी अजीब शतरंजी होती है. समय के साथ शह और मात के इस खेल में दोस्त और दुश्मन के बीच की दूरियां मिटती, घटती हैं तो कभी अधिक बढ़ती जाती हैं. सीवान की सियासत का एक बड़ा घटक भी इसी हाल से दो-चार हो गया है. जिस राजग के बड़े नेता साथ चले थे, वही चार साल के दौरान ही त्रिपथ के पथिक बन गए हैं.

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