मध्य प्रदेश: तो कांग्रेस ने इसलिए नहीं किया बसपा से गठबंधन

भले मध्य प्रदेश में कांग्रेस का गठबन्धन बसपा के साथ नहीं हो सका है लेकिन कांग्रेस ने अब अपने लिए

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न कमलनाथ न सिंधिया, भाजपा को दिग्विजय सिंह पसंद हैं

राजनीति एक ऐसा खेल है, जिसमें चाहे-अनचाहे दुश्मन भी जरूरत बन जाते हैं. चुनाव के मुहाने पर खड़े मध्य प्रदेश

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सांगठनिक बदलाव के बावजूद नहीं सुधरे हालात, गुटबाज़ी कांग्रेस की सबसे बड़ी चुनौती

सांगठनिक बदलाव के बाद मध्य प्रदेश के कांग्रेसी नेताओं द्वारा दावा किया जा रहा था कि अब मध्य प्रदेश कांग्रेस

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छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव : कांग्रेस की कलह रमन सिंह की ताकत है

छत्तीसग़ढ में विधानसभा चुनाव मुख्यत: कांग्रेस और भाजपा के बीच ल़डा जाना है. भाजपा नेतृत्व सही समय पर दिल्ली से

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नरेंद्र मोदी बनाम राहुल

देश में इस वक़्त दो व्यक्ति प्रधानमंत्री पद के प्रमुख दावेदार हैं. राहुल गांधी और नरेन्द्र मोदी. लेकिन न तो

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सपा सरकार पर एक साल में 104 दंगों का कलंक

यूपी में छोटी-छोटी घटनाएं बड़े तनाव की वजह बन रही हैं, लेकिन दिल्ली की गद्दी के लिए उतावले सपा नेताओं

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मध्य प्रदेश : क्या सिंधिया मध्य प्रदेश कांग्रेस की कमान संभाल पाएंगे?

मध्य प्रदेश विधानसभा चुनावों में दो बार भाजपा से पटखनी खाने वाली कांग्रेस पार्टी भीतर की गुटबाजियों से निजात पाकर

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कांग्रेस में अपनी ढपली-अपना राग : राहुल गांधी की फिक्र किसी को नहीं

कांग्रेस में राहुल गांधी के भविष्य की चिंता किसी को नहीं है. अगर है, तो फिक़्र अपने-अपने मुस्तकबिल की. पार्टी में रणनीतिकार की भूमिका निभाने वाले कई नेताओं के लिए राहुल गांधी प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार की बजाय एक मोहरा भर हैं. राहुल गांधी की आड़ में उक्त नेता कांग्रेस पार्टी पर अपनी हुकूमत चलाना चाहते हैं. लिहाज़ा उनके बीच घमासान इस बात का नहीं है कि आम चुनावों से पहले पार्टी की साख कैसे बचाई जाए, बल्कि लड़ाई इस बात की है कि राहुल गांधी को अपने-अपने कब्ज़े में कैसे रखा जाए, ताकि सरकार और पार्टी उनके इशारों पर करतब दिखाए.

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यह खामोशी देश के लिए खतरनाक है

कोयला घोटाला अब स़िर्फ संसद के बीच बहस का विषय नहीं रह गया है, बल्कि पूरे देश का विषय हो गया है. सारे देश के लोग कोयला घोटाले को लेकर चिंतित हैं, क्योंकि इसमें पहली बार देश के सबसे शक्तिशाली पद पर बैठे व्यक्ति का नाम सामने आया है. मनमोहन सिंह कोयला मंत्री थे और यह फैसला चाहे स्क्रीनिंग कमेटी का रहा हो या सेक्रेट्रीज का, मनमोहन सिंह के दस्तखत किए बिना यह अमल में आ ही नहीं सकता था.

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कांग्रेस ऐसे हारी

दिग्विजय सिंह और परवेज़ हाशमी को फांसी की सज़ा सुनाने की तैयारी हो चुकी है. कांग्रेस हाईकमान ने इन दोनों की राजनीतिक ज़िंदगी पर एक लंबा पूर्ण विराम लगाने का फैसला ले लिया है. बस इसका औपचारिक ऐलान बाक़ी है. उत्तर प्रदेश के अधिकांश कांग्रेस कार्यकर्ता कह रहे हैं कि दिग्विजय सिंह ने पहले कांग्रेस का संगठन चौपट किया, ग़लत पीसीसी मेंबर बनाए.

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कांग्रेस की चार सदस्यीय कमेटी की अग्नि परीक्षा

श्रीमती सोनिया गांधी अमेरिका में अपनी बीमारी के बाद स्वास्थ्य लाभ कर रही हैं. उन्होंने हिंदुस्तान में कांग्रेस पार्टी को चलाने के लिए चार सदस्यीय कमेटी बनाई. उनकी अनुपस्थिति में पार्टी का सारा काम यह कमेटी देखने वाली है और महत्वपूर्ण फैसले लेने वाली है. इस कमेटी में राहुल गांधी, ए के एंटनी, जनार्दन द्विवेदी और अहमद पटेल हैं.

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राजनीति का पाखंडी और बनावटी चेहरा

कहते हैं, युद्ध के समय सबसे अधिक क्षति सत्य की ही होती है. भारतीय राजनीति में सत्य का समावेश नहीं रहा है. इसलिए हम इसे लेकर ज़्यादा चिंतित भी नहीं रहते, लेकिन पिछले दिनों हमें ज़बरदस्त रूप से छल कपट, बनावटीपन, आरोप-प्रत्यारोप और अतिश्योक्तिपूर्ण बातें देखने-सुनने को मिलीं.

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लगता है बाबा रामदेव से कांग्रेस डर गई

राजनीति और आध्यात्म में सबसे बड़ा फर्क़ यह है कि आध्यात्म मनुष्य को मौन कर देता है, जबकि राजनीति में मौन रखना सबसे बड़ा पाप साबित होता है. बाबा रामदेव के हमले के बाद कांग्रेस पार्टी आध्यात्म की ओर मुड़ गई है, उसने चुप्पी साध ली है.

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जूनियर दादा भी दंगल में

राजनीति के दंगल में स्व दिग्विजय सिंह के छोटे भाई कुमार त्रिपुरारी सिंह ने सादगी से मगर संभावनाओं से भरी इंट्री देकर सबको चौंका दिया है. जदयू में विधिवत शामिल होकर उन्होंने ऐलान किया कि दादा के अधूरे सपनों को पूरा करने के लिए ही उन्होंने राजनीति का रास्ता चुना है.

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पुतुल के कंधों पर दादा के ख्‍वाब

दिग्विजय सिंह, जिन्हें हर कोई प्यार से दादा कहकर बुलाता था, अक्सर कहा करते थे कि गुजरात क्यों, बिहार क्यों नहीं? क्या नहीं है बिहार में? बस, विकास का विजन होना चाहिए, सब कुछ पटरी पर दौड़ता दिखेगा. दादा नहीं रहे, पर सपनों की कोई उम्र नहीं होती, उन्हें तो बस देखने वाली आंखें और आगे ले जाने वाले कंधे चाहिए.

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दिग्विजय सिंह : बेहतरीन राजनीतिज्ञ-बेहतरीन इंसान

दिग्विजय सिंह को सबसे पहले मैंने 1983 के अप्रैल-मई महीने में उस व़क्तदेखा था, जब दिल्ली के जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय (जेएनयू) में छात्र आंदोलन चल रहा था. वह छात्र नेताओं को लेकर चंद्रशेखर जी और राजनारायण जी के पास आए थे और उनसे छात्र नेताओं की मदद करने का आग्रह किया.

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दिग्विजय सिंह का आखिरी इंटरव्‍यू

बांका (बिहार) के सांसद एवं पूर्व केंद्रीय मंत्री दिग्विजय सिंह अब हमारे बीच नहीं रहे. वह हमेशा देश के उन जुझारू, कर्मठ एवं ईमानदार नेताओं में शुमार किए जाते रहे, जो आम लोगों के हितों के लिए प्रयत्नशील रहते हैं. उनके निधन से स़िर्फ देश और समाज की वह क्षति हुई, जिसकी भरपाई संभव नहीं है.

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दिग्विजय सिंह तमाम उम्र याद रहेंगे

अभी एक महीना भी नहीं बीता. लोधी इस्टेट के पंद्रह नंबर के घर में बैठे हम दिग्विजय सिंह से बात कर रहे थे. हमने देश का पहला इंटरनेट टीवी चौथी दुनिया टीवी शुरू किया है, जिसमें हम भारत के राजनीतिक इतिहास को टीवी पर ला रहे हैं. इंदिरा गांधी के समय के लोग हमारे बीच हैं, जो राजनीतिक घटनाओं के पीछे की कहानी बता सकते हैं.

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श्रद्धांजलिः दिग्विजय सिंह (1955-2010)

दिग्विजय सिंह के निधन की खबर सुनते ही देश में शोक की लहर दौड़ गई. लगभग सभी दल के नेताओं ने उनके निधन को अपूरणीय क्षति बताया, जिसकी भरपाई मुश्किल है. दिग्विजय सिंह सबसे बेहतर संबंध बनाकर रहते थे, चाहे वह उनका विरोधी ही क्यों न हो. देश और अपने राज्य बिहार का दुनिया भर में सम्मान दर्ज कराने में दिग्विजय सिंह का महत्वपूर्ण योगदान है.

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सार-संक्षेपः गृहयुद्ध का रूप है नक्सलवाद

पुरी पीठ के शंकराचार्य जगतगुरू निश्चलानंद सरस्वती देश में बढ़ते नक्सलवादी प्रभाव और आतंक को भारत में गृहयुद्ध का एक रूप मानते हैं. इनका कहना है कि नेपाल की तरह ही हिन्दू बहुल भारत राष्ट्र की एकता अखंडता और सुरक्षा को विदेशी षड़यंत्रकारी नष्ट करना चाहते हैं और इसके लिए वह नक्सलवादियों को खुला प्रोत्साहन देने के साथ हर तरह की मदद भी कर रहे हैं.

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महाराजा के हाथ कमान

मध्य प्रदेश की सुस्त राजनीति में आने वाला समय काफी उथल-पुथल भरा हो सकता है. इसका अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि कांग्रेस एक महाराजा की ताजपोशी पर आमादा है. राष्ट्रीय स्तर पर यह अफवाहें गर्म हैं कि कांग्रेस हाईकमान मध्य प्रदेश में अग्रिम मुख्यमंत्री का चयन पहले ही कर चुका है.

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राजनीति के भैरो बाबा

वर्ष दो हज़ार पांच की सर्दियों की बात है. वरिष्ठ पत्रकार संतोष भारतीय की दो किताबें राधाकृष्ण प्रकाशन नई दिल्ली से प्रकाशित हुई थीं. तय हुआ कि दोनों किताबों का विमोचन भैरो सिंह शेखावत से कराया जाए. शुरू में मैंने इस बात का विरोध किया था कि जिस व्यवस्था और राजनीति के विरोध में ये दोनों किताबें हैं, जिनका लेखक लंबे समय से अपनी पत्रकारिता से राजनीतिक व्यवस्था की खामियों को लगातार उजागर करता रहा हो,

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नीतीश जी, यह खतरे की घंटी है

नौ मई को बिहार के लोगों की निगाहें पटना के गांधी मैदान पर टिकी थीं. बटाईदारी को लेकर बुलाई गई महापंचायत में आने वाली भीड़ पर हर दल के नेताओं और राजनीतिक विश्लेषकों की नजर थी. महापंचायत में शामिल नेता चिलचिलाती धूप एवं जाम की बातों से बेचैन होकर गांधी मैदान में अपने समर्थकों को तलाश रहे थे.

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बटाईदारी बिल भ्रम का भंवर

सरकार कहती है कि बटाईदारी बिल लागू नहीं होगा, लेकिन विपक्ष का दिल है कि मानता ही नहीं. सरकार कहती है कि जब बंगाल में बटाईदारी बिल लागू नहीं हुआ तो बिहार में कहां से लागू होगा. विपक्ष कहता है कि सरकार की नीयत में खोट है. अगर बिल लागू नहीं करना है तो फिर सरकार इसे पूरी तरह खारिज़ क्यों नहीं कर देती.

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उमा भारती वापसी की राह आसान नहीं

मध्य प्रदेश की राजनीति में इन दिनों उमा भारती फैक्टर की चर्चा ज़ोरों पर है. भारतीय जनता पार्टी की वर्तमान राज्य सरकार का हर नेता इस बात को लेकर चिंतित है कि उमा की वापसी मध्य प्रदेश की राजनीति को किस हद तक अस्थिर कर सकती है. उमा ने अपनी स्वयं की पार्टी से त्यागपत्र देकर भारतीय जनता पार्टी में वापसी के अंतिम प्रयास शुरू कर दिए हैं.

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