राजस्‍थान में मौत का पुल

न जांच, न कोई बातचीत सबसे पहले क्लीनचिट. लगता है सरकार ने ग़रीबों की लाशों पर भी निजी कंपनियों को फायदा पहुंचाने की नीति बना ली है. जब भी विवाद अमीर और ग़रीब के बीच का होता है, तो पूरी सत्ता अमीर के साथ खड़ी हो जाती है. ग़रीब मरते हैं तो सरकार को अ़फसोस नहीं होता. उसकी सुध लेने वाला कोई नहीं होता. एक निर्माणाधीन पुल ताश के पत्तों की तरह गिर जाता है. सौ से ज़्यादा लोग इसकी चपेट में आ जाते हैं. जांच का आदेश दे दिया जाता है, लेकिन जांच रिपोर्ट आने से पहले ही पुल बनाने वाली कंपनियों को देश के आलाधिकारी क्लीन चिट दे देते हैं.

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चिकित्सा अब समाजसेवा नहीं

कुछ दिनों पहले उत्तर प्रदेश के बिजनौर ज़िले के भोगनवाला गांव निवासी शमशाद (25) को उसके परिवारीजन इलाज के लिए ज़िला अस्पताल लेकर पहुंचे, जहां डॉक्टरों ने उसके फेफड़ों में पानी होने की बात कहते हुए भर्ती करने से इंकार कर दिया. मरीज के परिवारीजन डॉक्टरों से घंटों मिन्नतें करते रहे, मगर अस्पताल प्रशासन अपने रवैये पर अड़ा रहा.

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खांडू की मौत से उपजे सवाल

बीते 30 अप्रैल को हेलीकाप्टर दुर्घटनाग्रस्त हो जाने से अरुणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री दोरजी खांडू की असामयिक मृत्यु हो गई. इससे भी ज़्यादा दु:ख की बात यह है कि इस तरह की दुर्घटनाएं बार-बार हो रही हैं.

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निशाने पर खिलाडी़

यह बिल्कुल वैसा है कि मंदिरों के नाम पर देश भर में दंगे होते हैं और भगवान को सच्चे मन से मानने वाला कोई नहीं मिलता. सब उनका नाम अपने-अपने स्वार्थ सिद्ध करने के लिए इस्तेमाल करते हैं. तीज-त्योहारों पर उनके नाम का हल्ला शुरू कर देते हैं. ऐसा ही कुछ हमारे देश में खेल प्रतिभाओं के साथ हो रहा है. हमारे देश में खेल को किसी धर्म से कम नहीं आंका जा सकता है.

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बरेली-शाहजहांपुर हादसाः सावधानी हटी, दुर्घटना घटी

सावधानी शासन की, सावधानी प्रशासन की, सावधानी उस व्यवस्था की, जिसका यह आयोजन था. दुर्घटना अल्हड़ नौजवानों की, दुर्घटना देश के भविष्य की, दुर्घटना परिवार के उस चिराग़ की, जिसके भरोसे अंधेरे से उजाले की ओर जाने का सपना देखा गया था.

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गैजेट हैं दुर्घटनाओं का सबब

हाल में हुई विमान दुर्घटनाओं में ज़्यादातर की वजह तकनीकी खामी या आतंकवादी वारदातें रही हैं, लेकिन कई और प्रश्न भी उठे हैं.

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नौका दुर्घटनाएं कब रुकेंगी

सात नदियों से घिरे खगड़िया ज़िले में लगातार नौका दुर्घटनाएं हो रही है, अभी तक न जाने कितनों की मांग उजड़ चुकी है तो किसी की गोद सूनी हो चुकी है. किसी के माथे से मां का साया छिन गया तो किसी ने अपने बाप को खो दिया है, लेकिन प्रशासनिक महकमे के लोगों की नींद तक नहीं खुल रही है.

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पत्रकार की हत्‍या को दुर्घटना साबित करने की कोशिश

फर्ज़ी मुठभेड़ों में दर्जनों बेगुनाह लोगों को मौत के घाट उतारने और फर्ज़ी मुक़दमों में जेल भेजने वाली सोनभद्र पुलिस इन दिनों एक पत्रकार की हत्या को दुर्घटना साबित करने में जुटी है. इस कार्रवाई से क्षुब्ध पत्रकारों ने प्रशासन के ख़िला़फ मोर्चा खोल दिया है.

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छोटे कपड़े-बड़े एक्सीडेंट

गर्मी में होने वाली कार दुर्घटनाओं में ज़्यादातर मौत पुरुषों की होती है. इसका खुलासा लंदन में हुए एक सर्वे में किया गया है. गर्मी में ज़्यादातर लड़कियां मिनी स्कर्ट और टॉप पहनती हैं, जिसके चलते कार ड्राइव करने वाले पुरुषों की नज़र बरबस ही उनकी तऱफ चली जाती है और वे दुर्घटनाग्रस्त हो जाते हैं.

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मध्‍यप्रदेश आर्थिक उपनिवेश बन गया है

दुनिया में 1990 का दशक एक परिवर्तनकारी दौर रहा है. इसी समय में समाजवादी सोवियत संघ का विखंडन हुआ और कई समाजवादी देशों ने खुशी-खुशी पूंजीवाद को अपना लिया. चीन भी इस प्रक्रिया से अछूता नहीं रहा. दुनिया के मज़दूरों, एक हो जाओ का नारा लगाने वाले समाजवादी, कम्युनिस्ट संगठन और देश कमज़ोर हो गए,

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सार–संक्षेपः सुंदरी, ब्लैकमेलिंग और अ़फसरशाह

प्रदेश के नौकरशाह तमाम प्रकार के भ्रष्टाचार में तो लिप्त हैं ही, पर अ़फसरों का एक वर्ग सुरासुंदरी के मोह में भी फंसा हुआ है. एक मामला हाल ही में उजागर हुआ है. राजधानी भोपाल के समीप औबेदुल्लागंज में पुलिस के आतंकवादी निरोधक दस्ते ने जबलपुर के एक ऐसे गिरोह को पकड़ने में सफलता पाई है, यह गिरोह सुंदर लड़कियों को अ़फसरों के पास भेजकर उनके अंतरंग संबंधों को खुफिया कैमरे में क़ैद कर अश्लील फिल्में बनाता था.

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सार-संक्षेप: मध्य प्रदेश-अंधेर नगरी, चौपट राजा

मध्य प्रदेश सरकार में कुछ भी अजूबा नहीं है. हाल ही में खंडवा के विकास आयुक्त कार्यालय के मुख्य कार्यपालन अधिकारी के स्टेनों ने 32 कर्मचारियों की अवैध रूप से नियुक्ति कर उनसे लाखों रुपयों की अवैध कमाई कर ली, लेकिन मामला प्रकाश में आते ही इसे दबा दिया गया. खंडवा से प्राप्त जानकारी के अनुसार पिछले 14 नवंबर 2008 को विकास आयुक्त कार्यालय भोपाल से संयुक्त आयुक्त के नाम से एक आदेश जारी हुआ,

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सरकार फिर जनता के खिला़फ

बजट सत्र के पूर्वार्ध में लोकसभा में परमाणु दायित्व विधेयक (न्यूक्लियर लाइबिलिटी बिल) आना था, लेकिन विरोधी दल के सदस्यों के दबाव की वजह से यह संभव नहीं हो पाया. अ़खबारों में यह खबर पहले छप गई, जिसकी वजह से संसद सदस्यों को लगा कि उन्हें इसका विरोध करना चाहिए.

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