सरकार का भोंपू : दूरदर्शन और आकाशवाणी

देश एक ब़डे क्रांति के मुहाने पर है. सूचना क्रांति के तहत आकाशवाणी और दूरदर्शन को जब इसमें ब़ढ-च़ढ कर

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जब तोप मुकाबिल हो : समाचारों का स्थानीयकरण बेहद चिंताजनक

कुछ अख़बारों ने पैसे लेकर चुनाव में ख़बरें छापने की परंपरा क्या चलाई कि हर अख़बार को आम पाठक शक

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पत्रकार जिन्होंने लोकतंत्र की हत्या की

पत्रकारिता की संवैधानिक मान्यता नहीं है, लेकिन हमारे देश के लोग पत्रकारिता से जुड़े लोगों पर संसद, नौकरशाही और न्यायपालिका से जुड़े लोगों से ज़्यादा भरोसा करते हैं. हमारे देश के लोग आज भी अ़खबारों और टेलीविजन की खबरों पर धार्मिक ग्रंथों के शब्दों की तरह विश्वास करते हैं.

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रेखा गूंगी गुड़िया नहीं हैं

कुछ लोगों का व्यक्तित्व आग की तरह होता है. वे जहां जाते हैं या तो लोगों को तपिश का अनुभव कराते हैं या झुलसा देते हैं और जिन्हें झुलसा नहीं पाते, उन्हें जला देते हैं. रेखा एक आग का नाम है और रेखा का संपूर्ण व्यक्तित्व ऐसा ही व्यक्तित्व है. रेखा राज्यसभा की मनोनीत सदस्य हैं.

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सिनेमा के बाजार में फंसा मीडिया

मीडिया की गिरती साख पर चिंता जताते हुए लिखा गया कि पत्रकारिता और मीडिया तो बाज़ार की नब्ज़ नहीं पकड़ पाए, उल्टे बाज़ार ने मीडिया की नब्ज़ पकड़ ली. बात का़फी हद तक सही भी है. आज अ़खबार का हर पन्ना और टीवी कार्यक्रम कोई खबर दिखाने से पहले प्रायोजकों को खुश करता है.

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स्त्री के विद्रोह की कहानियां

बात अस्सी के शुरुआती दशक की है. उस व़क्त मैं बिहार के जमालपुर के रेलवे हाईस्कूल का छात्र था. यह वह दौर था, जब टेलीविज़न सुदूर शहरी और ग्रामीण इलाक़ों में नहीं पहुंच पाया था. ख़बरों के लिए हम लोग आकाशवाणी के पटना और दिल्ली केंद्र पर निर्भर रहते थे.

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जनता को ठगने का महामुकाबला

क्‍या सरकार टीवी चैनलों को इसलिए लाइसेंस देती है कि वे जनता को बेवकूफ बनाकर पैसे कमाएं? क्या सरकारी अधिकारियों को पता नहीं है कि उनके द्वारा जारी लाइसेंस का इस्तेमाल देश की जनता को मूर्ख बनाने में किया जा रहा है? रात के बारह बजते ही कई चैनलों पर ऐसे कार्यक्रम चलाए जाते हैं, जिन पर लाइव लिखा होता है.

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