समस्या का समाधान खोजने की ज़रूरत

छत्तीसगढ़ नरसंहार और आईपीएल मैचों में सट्टेबाजी एवं फिक्सिंग की ख़बरें जनसामान्य में चर्चा का विषय बनी हुई हैं. ऐसी

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अराजकतावादी नक्सलवाद : पुनर्विचार की ज़रूरत

नक्सलवादियों की हाल-फिलहाल की गतिविधियों से ऐसा लगता है कि वे अपने उद्देश्यों से भटकते जा रहे हैं. कुछ समय पहले मलकानगिरी के ज़िलाधिकारी का अपहरण कर लिया गया, उड़ीसा में एक विधायक और इटली के दो नागरिकों का अपहरण कर लिया गया.

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यह बजट खतरनाक है

16 मार्च को प्रणब मुखर्जी लोकसभा में भाषण दे रहे थे. यह आम भाषण नहीं था, बल्कि 2012-13 का बजट भाषण था. सारा देश इस भाषण को ध्यान से सुन रहा था. हम भी इस भाषण को सुन रहे थे. इस भाषण को जब हमने सुनना शुरू किया तो हमें बहुत आशा थी कि प्रणब मुखर्जी इस देश के सामने आने वाली तकलीफ़ों को ध्यान में रखकर अपना बजट भाषण रखेंगे.

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कॉरपोरेट सेक्टर अपनी सामाजिक ज़िम्मेदारी को समझे

बीती 27 फरवरी को बंगलुरू में ईटीवी उर्दू और ईटीवी कन्नड़ ने एक सेमिनार किया, जिसका विषय था-फ्यूचर ऑफ कॉरपोरेट्‌स इन इंडिया. मुख्य वक्ता कंपनी मामलों के केंद्रीय मंत्री वीरप्पा मोइली थे और मुख्य अतिथि थे कर्नाटक के मुख्यमंत्री सदानंद गौड़ा. सेमिनार में जाफर शरीफ, एम वी राजशेखर एवं जमीर पाशा भी शामिल थे, जो कर्नाटक की बड़ी हस्तियां हैं.

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मध्य प्रदेश : नक्सल प्रभावित क्षेत्र घोषित होने का फ़ायदा किसे

राज्य में पूर्व के तीन ज़िलों मंडला, डिंडोरी एवं बालाघाट के मुक़ाबले 5 अन्य नए ज़िलों सीधी, सिंगरौली, उमरिया, शहडोल एवं अनूपपुर में नक्सलियों का प्रभाव बढ़ गया है. राज्य सरकार की लगातार कोशिशों के बाद प्रदेश के इन सभी आठ ज़िलों को नक्सल प्रभावित घोषित कराने में कामयाबी मिल गई और ऐसे प्रत्येक ज़िले के लिए 25 करोड़ रुपये की सालाना केंद्रीय सहायता हाल में शुरू भी हो गई है.

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सुशासन के बावजूद नक्‍सलवाद हावी

विकास और नक्सलवाद के बीच क्या संबंध हो सकता है? सरकारी जवाब तो यही होता है कि नक्सलवादी विकास की राह में सबसे बड़ी बाधा हैं, लेकिन चौथी दुनिया की तहक़ीक़ात से एक आश्चर्यजनक सत्य का ख़ुलासा होता है. वैसे तो देश के क़रीब 12 राज्य और लगभग 200 ज़िले नक्सलवाद की गिरफ़्त में हैं. बिहार के भी अधिकांश ज़िले नक्सलवाद की चपेट में हैं.

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प्रधानमंत्री काग़ज़ की नाव के कप्तान न बन जाएं

इसे मनमोहन सिंह का सबसे बड़ा विरोधाभास कहिए या फिर उनकी सबसे बड़ी मजबूरी, लेकिन सच्चाई यही है कि उनकी गठबंधन सरकार की शक्ति उनकी कमज़ोरी में ही निहित है. गठबंधन इसी वजह से टिका है कि प्रधानमंत्री का अपने सहयोगियों पर कोई नियंत्रण नहीं है. एक मंत्री के हाथ टेलीकॉम घोटाले में सने मिलते हैं, लेकिन वह बेशर्मी से आरोपों से इंकार कर देता है.

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चिदंबरम जी, आप किसके साथ हैं?

नक्सलियों के ख़िला़फ सेना उतारने पर आमादा केंद्रीय गृह मंत्रालय नक्सली संगठनों को अरबों रुपये का फंड देने वाले उद्योगपतियों और पूंजीपतियों की लिस्ट वर्ष 2007 से दबाए बैठा है और उस पर कोई कार्रवाई नहीं कर रहा. हैरत की बात यह है कि नक्सलियों को फंडिंग करने वालों में सरकारी महकमे और उपक्रम भी शामिल हैं.

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नक्‍सलवाद, मीडिया और पुलिसः मीडिया को धमकी हद में रहो

सीपीआई (माओवादी) के प्रवक्ता आज़ाद की मुठभेड़ के नाम पर आंध्र प्रदेश पुलिस द्वारा की गई हत्या के बाद अमन एवं इंसाफ़ के पैरोकार सदमे और गुस्से में हैं. इनमें बहुतेरे माओवादियों के हिंसा के रास्ते पर उंगली भी उठाते रहे हैं, लेकिन उससे पहले सरकारों की जनविरोधी नीतियों और उसके प्रतिरोध के बर्बर दमन को ज़रूर कठघरे में भी खड़ा करते रहे हैं.

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अवैध खनन के लिए नक्‍सली डर पैदा करने की कोशिश

कटनी ज़िले में नक्सलियों की उपस्थिति का दावा नहीं किया जा सकता है, यह भी नहीं कहा जा सकता है कि भविष्य में इस ज़िले में नक्सली अपनी धमक दे सकते हैं. हालांकि मध्य प्रदेश पुलिस द्वारा किए गए दावों पर भरोसा किया जाए तो कटनी नक्सलियों के लिए राज्य में पहली पसंदीदा जगह है.

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सार-संक्षेपः गृहयुद्ध का रूप है नक्सलवाद

पुरी पीठ के शंकराचार्य जगतगुरू निश्चलानंद सरस्वती देश में बढ़ते नक्सलवादी प्रभाव और आतंक को भारत में गृहयुद्ध का एक रूप मानते हैं. इनका कहना है कि नेपाल की तरह ही हिन्दू बहुल भारत राष्ट्र की एकता अखंडता और सुरक्षा को विदेशी षड़यंत्रकारी नष्ट करना चाहते हैं और इसके लिए वह नक्सलवादियों को खुला प्रोत्साहन देने के साथ हर तरह की मदद भी कर रहे हैं.

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भैरो सिंह शेखावत और आचार्य राममूर्ति का जाना

मई दो हज़ार दस ने दो ऐसे लोगों को हमसे छीन लिया, जिन्होंने भारत की राजनीति और सामाजिक विकास के संघर्ष में बड़ा योगदान दिया था. भैरो सिंह शेखावत ने राजस्थान की राजनीति में सामान्य परिवार के प्रतिनिधि के रूप में भाग लिया और रजवाड़ों तथा सामंतों की मानसिकता वाले प्रदेश में अपना ऐसा स्थान बना लिया, जो किसी के लिए भी ईर्ष्या का कारण बन सकता है.

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दो डीजीपी की जंग में शहीद हो रहे जवान

नक्सलवाद को नेस्तनाबूद करने की ख़ातिर छत्तीसगढ़ में तैनात किए गए दो पुलिस महानिदेशक नक्सलियों को मटियामेट करने के बजाय आपस में ही धींगामुश्ती कर रहे हैं. नक्सलियों का सफाया करने की जगह उनमें इस बात की होड़ मची है कि नक्सलियों के ख़िला़फ चल रहे ऑपरेशन ग्रीन हंट की डोर किसके हाथ रहे और इसका सेहरा किसके सिर बंधे.

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आंखों देखा नक्‍सलवाद

विदेशी हथियारों से लैस नक्सलवादी समूहों के पास सरकार से अधिक मज़बूत सूचनातंत्र है. गहराई तक जानें तो, इन नक्सलवादी समूहों के पास पैसा, हथियार, योजना सभी कुछ उम्मीदों से कहीं ज़्यादा है. लेकिन, ये समूह जन विश्वास और जन आस्था धीरे-धीरे खोते जा रहे हैं. उड़ीसा, आंध्र प्रदेश और छत्तीसगढ़ जैसे राज्य के मध्य पड़ने वाले कुछ ऐसे भूभाग हैं जहां से नक्सलवादियों को लगातार गुज़रना पड़ता है.

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नक्‍सल क्रांति का एक जनक हताशा से हार गया

हताशा ने न जाने कितनी जानें ली हैं, पर अभी हाल में इसने एक ऐसे नेता को अपना शिकार बनाया है, जिसने आज से 43 साल पहले हथियारों के बल पर उस व्यवस्था को बदलने का सपना देखा था, जो किसानों व मज़दूरों का शोषण करती है, उनका हक़ मारती है. इस हताशा के ताजा शिकार हैं, कानू सान्याल.

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मतदाताओं के साथ नक्सली भी रखेंगे वजन

सासाराम ज़िले के सात विधानसभा क्षेत्रों में से अनुसूचित जाति के लिए सुरक्षित, चेनारी विधानसभा का आगामी चुनाव किसी भी दल एवं प्रत्याशी के लिए आसान नहीं होगा. बात पहले वाली नहीं रही, क्योंकि नए परिसीमन में इस विधानसभा क्षेत्र से शिवसागर एवं कोचस का आधा हिस्सा तथा करगहर का पूरा प्रखंड कटकर अलग हो गया है.

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खून बहाने का जुनून

नक्सलियों के सिर पर रोज खून बहाने का जुनून सवार होता है, तो पुलिस के जवानों पर नक्सलवाद के नासूर को खत्म करने का. इसी चक्कर में शायद ही कोई ऐसा दिन गुजरता हो, जब निरीह जनता के खून से यहां की धरती लाल न होती हो. कहीं नक्सली मारे जा रहे हैं तो कहीं सुरक्षाबल के जवान शहीद हो रहे हैं. हालात यह हैं कि कुछ इलाक़ों में नक्सलियों को लेवी देने के बाद ही विकास के काम का पहला पत्थर लग पाता है. दोनों राज्यों के कई इलाक़ों में रेलगाड़ियों का परिचालन नक्सलियों की मर्ज़ी पर निर्भर है

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दर्द से कराहती ज़िंदगी दूषित पानी से विकलांग होते ग्रामीण

यूनीसेफ की सर्वेक्षण रिपोर्ट के मुताबिक़ पूरे भारत वर्ष के 20 राज्य के ग्रामीण अंचलों मे रहने वाले लाखों लोग फ्लोराइड युक्त पानी के सेवन से फ्लोरोसिस के शिकार हैं. सर्वाधिक प्रभावित राज्यों मे आंध्रप्रदेश, गुजरात एवं राजस्थान है, जहां 70 से 100 प्रतिशत ज़िले फ्लोरोसिस से प्रभावित हैं, जबकि बिहार, दिल्ली, हरियाणा, झारखंड कर्नाटक, महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, उड़ीसा, तमिलनाडु एवं उत्तरप्रदेश में फ्लोरोसिस प्रभावित जिले 40 से 70 प्रतिशत हैं.

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नक्सलवाद के विरुद्ध अहिंसा ही एकमात्र अस्त्र

आज जो हो रहा है, उससे मुझे घबराहट होती है. अहिंसात्मक आंदोलन का प्रयोग करने के पहले ही लोग मन बना लेते हैं कि अहिंसा से कुछ होने वाला नहीं है, इसलिए हिंसात्मक आंदोलन शुरू करो. अनुभव से लोगों ने सीखा है कि स़िर्फ हिंसा के सामने सरकारें झुकती हैं. नक्सली समस्या पर का़फी लिखा जा चुका है. पक्ष-विपक्ष में लिखा जा रहा है. ऐसा लगता है कि इस देश के लोग इस मुद्दे को लेकर दो भागों में बंट चुके हैं. एक समूह की मान्यता है कि देश में ग़रीबों के सामने का़फी परेशानियां हैं, इसलिए उन्होंने बंदूक़ उठा ली है तो ठीक ही किया है. दूसरे पक्ष की मान्यता है कि समस्या कितनी भी गंभीर हो, बंदूक़ उठाने का अधिकार आम जनता को नहीं है और स़िर्फ सरकार ही बंदूक़ उठा सकती है. मैं बार-बार इस कोशिश में लगा हूं कि इस खेल में जो तीसरा पक्ष है,

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बीते साल से ख़ुश होने की वजह

साल के अंत में जलसों की इन फज़ाओं में जो ख़ुशी हमारे हिस्से आई है, कुछ व़क्त के लिए हमें उसका जश्न मनाना चाहिए. मसलन अल्पसंख्यक विरोधी हिंसा में पहले की अपेक्षा कमी आई है. लेकिन एक ऐसा मसला जो एक आदर्श स्थिति और राज्य का पहला दायित्व होना चाहिए, उसके लिए हमें जश्न क्यों मनाना चाहिए? क्या भारतीय राज्य अल्पसंख्यकों सहित अपने नागरिकों की सुरक्षा के लिए संवैधानिक तौर पर जवाबदेह नहीं है?

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सीपीएम ने पश्चिम बंगाल का तबाह कर दियाःसुल्तान अहमद

आज देश जिस नक्सल समस्या से जूझ रहा है, वह सीपीएम की ही देन है. सीपीएम ही वह पार्टी है, जिसने पश्चिम बंगाल सहित अपने प्रभुत्व वाले अन्य राज्यों में युवाओं के भविष्य के साथ खिलवाड़ किया. तालीम से उन्हें महरूम रखा. उन्हें बुनियादी सुविधाएं नहीं दीं. उनके लिए दो व़क्त की रोटी का इंतज़ाम नहीं किया. नतीज़तन युवा गुमराह हो गए. अपना पेट भरने की ख़ातिर उन्होंने हथियार उठा लिया. तृणमूल कांग्रेस के युवा तुर्क सांसद और केंद्रीय पर्यटन राज्य मंत्री सुल्तान अहमद नक्सलवाद का ज़िक़्र होते ही सीपीएम पर बरस पड़ते हैं.

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माओवादियों का एक मोहरा भर है छत्रधर

पुलिस कुछ न करे तो मुश्किल, कर गुज़रे तो और ज़्यादा मुश्किल! माओवादियों के मोहरे छत्रधर की गिरफ़्तारी इसका जीता जागता प्रमाण है. यह दोहरापन आख़िर हमें कहां ले जाएगा?

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प्रधानमंत्री जी, अभी भी व़क्त है

हमारे गृह मंत्री नक्सलवाद को हथियारों से कुचलना चाहते हैं, वे कुचल सकते हैं, कम से कम कोशिश कर सकते हैं. आज तक का अनुभव बतलाता है कि ऐसी कोशिशें जब भी हुई हैं, निर्दोषों का ख़ून ज़्यादा बहा है. एक मरता है, चार खड़े हो जाते हैं. हमारे प्रधानमंत्री नक्सलवाद को सबसे बड़ा ख़तरा बताते हैं, पर अर्थशास्त्र के ज्ञाता यह भूल जाते हैं कि इसके कारण भी तो उन्हें बताने हैं.

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