पांडुलिपियों में छिपे हैं मिथिला के कई रहस्य

मिथिला के कई अनसुलझे प्राचीन रहस्य आज भी उन पांडुलिपियों में छिपे हुए हैं, जो अभी भी शिक्षण संस्थाओं के

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देर से मिले न्याय का कोई अर्थ नहीं

जस्टिस डिलेड, जस्टिस डिनाइड, यानी देर से मिले न्याय का कोई अर्थ नहीं रह जाता. प्रस्तावित सिटीजन चार्टर बिल के

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प्रधानमंत्री के नाम अन्ना की चिट्ठी

सेवा में,

श्रीमान् डॉ. मनमोहन सिंह जी,

प्रधानमंत्री, भारत सरकार, नई दिल्ली.

विषय : गैंगरेप-मानवता को कलंकित करने वाली शर्मनाक घटना घटी और देश की जनता का आक्रोश सड़कों पर उतर आया. ऐसे हालात में आम जनता का क्या दोष है?

महोदय,

गैंगरेप की घटना से देशवासियों की गर्दन शर्म से झुक गई.

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राजनीतिक दलों का रवैया गुस्सा दिलाता है

महाभारत शायद आज की सबसे बड़ी वास्तविकता है. इस महाभारत की तैयारी अलग-अलग स्थलों पर अलग तरह से होती है और लड़ाई भी अलग से लड़ी जाती है, लेकिन 2013 और 2014 का महाभारत कैसे लड़ा जाएगा, इसका अंदाज़ा कुछ-कुछ लगाया जा सकता है, क्योंकि सत्ता में जो बैठे हुए लोग हैं या जो सत्ता के आसपास के लोग हैं, वे धीरे-धीरे इस बात के संकेत दे रहे हैं कि वे किन हथियारों से लड़ना चाहते हैं.

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एक नहीं, देश को कई केजरीवाल चाहिए

साधारण पोशाक में किसी आम आदमी की तरह दुबला-पतला नज़र आने वाला शख्स, जो बगल से गुजर जाए तो शायद उस पर किसी की नज़र भी न पड़े, आज देश के करोड़ों लोगों की नज़रों में एक आशा बनकर उभरा है. तीखी बोली, तीखे तर्क और ज़िद्दी होने का एहसास दिलाने वाला शख्स अरविंद केजरीवाल आज घर-घर में एक चर्चा का विषय बन बैठा है. अरविंद केजरीवाल की कई अच्छाइयां हैं तो कुछ बुराइयां भी हैं. उनकी अच्छाइयों और बुराइयों का विश्लेषण किया जा सकता है, लेकिन इस बात पर दो राय नहीं है कि देश में आज भ्रष्टाचार के खिला़फ जो माहौल बना है, उसमें अरविंद केजरीवाल का बड़ा योगदान है.

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सेवानिवृत्‍त लेफ्टिनेंट कमांडर बेनीवाल : नियमों के जाल में उलझी पेंशन

तमाम सर्वे बताते हैं कि आज के युवा सेना में नौकरी करने की बजाय अन्य कोई पेशा अपनाना चाहते हैं. ऐसा नहीं है कि सेना की नौकरी के आकर्षण में कोई कमी आई हो या फिर वहां मिलने वाली सुविधाओं में कोई कटौती की गई हो, बावजूद इसके विभिन्न वजहों से सेना में नए अधिकारियों की कमी दिख रही है. उन्हीं वजहों में से एक है पेंशन का मामला. सेना में पेंशन विसंगतियों को लेकर संभवत: पहली बार कोई रिटायर्ड नौसेना अधिकारी सार्वजनिक रूप से सामने आया है. आखिर क्या है पूरी कहानी, पढ़िए चौथी दुनिया की इस एक्सक्लूसिव रिपोर्ट में….

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बड़ी कठिन है न्‍याय की डगर

सब मानते हैं कि देर से मिला इंसा़फ भी नाइंसा़फी के बराबर होता है. इसके बावजूद हमारे देश में म़ुकदमे कई पीढि़यों तक चलते हैं. हालत यह है कि लोग अपने दादा और परदादा के म़ुकदमे अब तक झेल रहे हैं. इंसान खत्म हो जाता है, लेकिन म़ुकदमा बरक़रार रहता है. इसकी वजह से बेगुनाह लोग अपनी ज़िंदगी जेल की सला़खों के पीछे गुज़ार देते हैं. कई बार पूरी ज़िंदगी क़ैद में बिताने या मौत के बाद फैसला आता है कि वह व्यक्ति बेक़सूर है.

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सच का सिपाही मारा गया

सच जीतता ज़रूर है, लेकिन कई बार इसकी क़ीमत जान देकर चुकानी पड़ती है. सत्येंद्र दुबे, मंजूनाथ, यशवंत सोणावने एवं नरेंद्र सिंह जैसे सरकारी अधिकारियों की हत्याएं उदाहरण भर हैं. इस फेहरिस्त में एक और नाम जुड़ गया है इंजीनियर संदीप सिंह का. संदीप एचसीसी (हिंदुस्तान कंस्ट्रक्शन कंपनी) में हो रहे घोटाले को उजागर करना चाहते थे.

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श्रमिकों की जिंदगी से खिलवाड़

मध्य प्रदेश का कटनी ज़िला भारत के भौगोलिक केंद्र में स्थित होने के कारण बेशक़ीमती खनिज संपदा के प्रचुर भंडारण सहित जल संपदा की दृष्टि से महत्वपूर्ण है. यही वजह है कि स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया लिमिटेड (सेल) द्वारा अपने इस्पात उद्योगों हेतु आवश्यक गुणवत्ता पूर्ण कच्चे माल के तौर पर इस्तेमाल किए जाने वाले चूना पत्थर (लाईम स्टोन) की खदानें यहां के ग्राम कुटेश्वर में स्थापित की गई थीं.

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न्याय याचना के ज्वलंत सवाल

भारतीय साहित्यकार संघ के अध्यक्ष डॉ. वेद व्यथित का खंड काव्य न्याय याचना एक अनुपम कृति है. जैसा नाम से ही ज़ाहिर है कि इसमें न्याय पर सवाल उठाए गए हैं. वह कहते हैं, यह ठीक है कि जानबूझ कर किया गया अपराध अनजाने में हुए अपराध से कहीं भयावह है, लेकिन लापरवाही में किया गया अपराध भी कम भयावह नहीं है. ज़रूर कहीं उसके अवचेतन में व्यवस्था और अनुशासन की अवहेलना है. ठीक है, गंधर्व ने जानबूझ कर ऋषि की अंजलि में नहीं थूका, लेकिन क्या कहीं भी थूक देना उचित है?

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निराशा पैदा करने वाला फैसला

सुप्रीम कोर्ट के फैसले का सभी सम्मान करेंगे. आखिर यह भारत के सुप्रीम कोर्ट का फैसला है, लेकिन इस फैसले से उन लोगों को निराशा हुई, जो ईमानदारी में यक़ीन रखते हैं. देश का सुप्रीम कोर्ट यह कहता है कि हमें ईमानदारी और इंटीग्रिटी से कोई मतलब नहीं है तो फिर सवाल खड़ा होता है कि क्या देश ईमानदारी छोड़ दे, क्या इस देश में उन्हीं लोगों की सुनी जाएगी, जो भ्रष्ट या बेईमान हैं?

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सुरेश पांडा अतिरिक्त सचिव बने

1981 बैच के आईएएस अधिकारी सुरेश चंद्र पांडा को गृह मंत्रालय में अतिरिक्त सचिव एवं एफए बनाया गया है. वह विश्वपति त्रिवेदी की जगह लेंगे, जिन्हें खनिज मंत्रालय में सचिव बनाया गया है.

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अररिया जिले का भजनपुर गांवः दबंगई का अंतहीन सिलसिला

यह भजनपुर गांव है. बिहार के राजनीतिक एवं भौगोलिक नक्शे के अनुसार एक ऐसा गांव, जो ज़िला अररिया के अनुमंडलीय नगर फारबिसगंज से मात्र दो किलोमीटर दूर उत्तर में स्थित है, लेकिन सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक रूप से इतना पिछड़ा है कि वहां आज तक न्याय और विकास जैसे राजनीतिक नारे की आवाज़ तक नहीं पहुंच सकी.

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महाराष्‍ट्रः हर्षवर्द्धन को हाईकोर्ट की फटकार

मुंबई हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति एस सी धर्माधिकारी ने सहकारिता मंत्री हर्षवर्धन पाटिल के होश उड़ा दिए हैं. स़िर्फ हर्षवर्धन पाटिल ही ऐसे मंत्री नही हैं. अगर आप मंत्रियों के वातानुकूलित कक्ष के पास से गुजरें तो आपको हर जगह एक जैसा अनुभव होगा. अधिकतर मंत्री विलासी प्रवृत्ति के होते हैं. उनकी इस प्रवृत्ति से आम आदमी अचंभित और हैरान-परेशान होता है, परंतु सत्ताधीशों को इस संदर्भ में कोई अफसोस नहीं होता.

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सांप्रदायिक दंगा निरोधक विधेयकः मौजूदा कानून कहीं से कमतर नहीं

भारतीय दंड संहिता की विभिन्न धाराओं के बावजूद देश में टाडा जैसे क़ानून लागू हुए, मगर अपराध फैलते ही रहे. परिणाम यह हुआ कि जनता की मांग के मद्देनज़र न्याय की प्राप्ति के लिए 2005 और 2009 में विभिन्न स़िफारिशों एवं संशोधनों पर आधारित नया विधेयक प्रस्तुत किया गया. अब 2011 में पुराने क़ानूनों में संशोधन करके नया बिल पेश कर दिया गया है.

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इलाहाबाद हाइकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट का फैसला किसानों के हौसले बुलंद

सार्वजनिक विकास के नाम पर किसानों की ज़मीन हथियाने के सरकारी मंसूबों पर पानी फिरता नज़र आ रहा है. इलाहबाद हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट से ग्रेटर नोएडा के किसानों की ज़मीन के बारे में जो फैसले आए हैं, वे इंसाफ़ के इतिहास में मील का पत्थर साबित होने की ताक़त रखते हैं.

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थल सेनाध्यक्ष के खिलाफ सरकार की साजिश

भारतीय सेना पर लिखने से हमेशा बचा जाता रहा है, क्योंकि सेना ही है जो देश की रक्षा दुश्मनों से करती है, पर पिछले कुछ सालों में सेना में भ्रष्टाचार बढ़ा है. अक्सर खाने के सामान की शिकायतें आती हैं कि वहां घटिया राशन सप्लाई हुआ है. लोग पकड़े भी जाते हैं, सज़ाएं भी होती हैं. सेना में खरीद फरोख्त में लंबा कमीशन चलता है, जिसके अब कई उदाहरण सामने आ चुके हैं. ज़्यादातर मामलों के पीछे राजनेताओं का छुपा हाथ दिखाई दिया है.

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सांप्रदायिक दंगे रोकने के लिए कानून नहीं, इंसाफ की जरुरत

भारत दुनिया का एक मज़बूत लोकतांत्रिक धर्मनिरपेक्ष देश है, जिसने सभी महत्वपूर्ण धर्मों के मानने वालों को अपने यहां शरण दी. यही वजह है कि अंतरराष्ट्रीय धार्मिक और आध्यात्मिक रहनुमाओं ने इस सरज़मीं को अपना आशियाना बनाया और पूरा जीवन मानवता के कल्याण, शांति और भाईचारे के लिए अर्पित कर दिया.

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राष्ट्रीय सुरक्षा प्रबंधन के मायने

राष्ट्रीय सुरक्षा एक ऐसा शब्द है, जिसका इस्तेमाल आजकल आम तौर पर किया जाता है. प्राय: यह शत्रु देश के आक्रमण से सुरक्षा से संबंधित होता है अथवा उन हथियारबंद आतंकवादियों से सुरक्षा से, जो राष्ट्र के प्रभुत्व को चुनौती देते हैं या राष्ट्रीय एकता-अखंडता को नुक़सान पहुंचाते हैं, लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा का अभिप्राय केवल इसी से नहीं है, बल्कि इसे और अधिक वृहद अर्थों में समझने की आवश्यकता है.

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दंगा मुक्त भारत की ओर

विभाजन के बाद भारत में पहला सांप्रदायिक दंगा 1961 में जबलपुर में हुआ, तबसे दंगों का सिलसिला अनवरत जारी है. 1980 के दशक में सांप्रदायिक हिंसा में ज़बरदस्त बढ़ोत्तरी हुई. विभिन्न समुदायों के बीच शांति एवं सौहार्द स्थापित करने की राह में सांप्रदायिक दंगे बहुत बड़ा रोड़ा बन गए हैं.

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फायरबिसगंज गोली कांडः नेता सिर्फ जख्‍म कुरेदते हैं, मरहम नहीं देते

फारबिसगंज के भजनपुर में अजीब बेचैनी बिखरी पड़ी है. पुलिसिया ख़ौ़फ के साये में यहां सांस लेते लोगों की ज़ुबान बंद है, पर पटना और दिल्ली से आए नेता उनके मुंह में उंगली डाल उनसे बुलवाने की रोजाना कोशिश करते हैं. अपने अजीज़ों को खोने वाले लोगों की आंखें न्याय की आस में रोज खुलती है और रोज बंद होती है, पर इंतज़ार ख़त्म नहीं हो रहा है.

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मेवात किसान आंदोलनः जज्‍बा वही रास्‍ता नया

दरअसल, इस व़क्त देश के विभिन्न हिस्सों में ज़मीन बचाने को लेकर जो किसान आंदोलन चल रहे हैं, उसी की क़डी में एक और नाम मेवात के किसानों का भी जु़ड गया है. हरियाणा सरकार ने इंडस्ट्रियल मॉडल टाउनशिप (रोजका) बनाने के नाम पर मेवात के किसानों से 1600 एक़ड ज़मीन का अधिग्रहण किया है, लेकिन किसानों का मानना है कि उन्हें अपेक्षाकृत बहुत ही कम मुआवज़ा दिया जा रहा है.

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लाइन में खडा़ किया गोली मारी और लाशें बहा दीं

अगर न्याय में देरी का मतलब न्याय से वंचित होना है तो यह कह सकते हैं कि मेरठ के मुसलमानों के साथ अन्याय हुआ है. मई 1987 में हुआ मेरठ का दंगा पच्चीसवें साल में आ चुका है. इस दंगे की सबसे दर्दनाक दास्तां मलियाना गांव और हाशिमपुरा में लिखी गई. खाकी वर्दी वालों का जुर्म हिटलर की नाजी आर्मी की याद दिलाता है.

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दंगों के इतिहास में हाशिमपुरा-मलियाना

भारतीय राजनीति में भ्रष्ट और पाक-साफ़ में फर्क़ नहीं है. भारत के नेताओं में मूढ़ और दूरदर्शी का फर्क़ नहीं है. भारत की सरकारों में सुशासक और कुशासक का भी फर्क़ नहीं है. फर्क़ स़िर्फ एक है और यही फर्क़ प्राथमिक है और पार्टियों को परिभाषित करता है. भाजपा सांप्रदायिक है, संघ सांप्रदायिक है और कांग्रेस, बहुजन समाज और पिछड़ी जातियों की पार्टियां और वामपंथी पार्टियां ग़ैर सांप्रदायिक.

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सुप्रीम कोर्ट में बदलाव ज़रूरी है

इस विषय के बारे में लिखने में एक अलग रोमांच है, इसलिए मैं बहुत सी ऐसी बातें यहां लिख सकता हूं, जो कि मैं उच्चतम न्यायालय में जजों के सामने बहस करते समय नहीं बोल सकता. जब बात होती है कि भारतीय न्यायपालिका के साथ क्या परेशानियां हैं तो हमें जवाब में हां या न कहना पड़ता है, लेकिन मेरा जवाब हां भी है और न भी. मैं उच्चतम न्यायालय में वर्ष 1979 से हूं.

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सोने का नहीं, जागते रहने का व़क्त है

भारत की राजनीति में संभवत: सुप्रीम कोर्ट के दख़ल से कई आश्चर्यजनक चीज़ें हो रही हैं. पहले ए राजा का जेल जाना, बाद में सुरेश कलमाडी का और फिर कनिमोझी की जेलयात्रा संकेत देती है कि कई और लोग भी इस राह के संभावित राही हैं. पर यह क्यों सुप्रीम कोर्ट के दख़ल के बाद हो रहा है?

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क्या सचमुच न्याय हुआ?

क्या रावण के साथ न्याय हुआ था? उसने तो राम से अपनी बहन सूर्पनखा की नाक काटने का बदला लेना चाहा था और इसलिए सीता को अगवा किया. क्या यह कारण इतना बड़ा था कि लंका नगरी को ही तबाह कर दिया जाए और उसके साथ-साथ सैकड़ों लोगों को भी मार डाला जाए और मार डाला जाए रावण के सारे बेटों को और फिर उसे भी?

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हर समस्या का निस्तारण न्यायालय में संभव नहीं

भारत में जैसे ही कोई मुद्दा उठता है, लोग उसे ज्वलंत की संज्ञा प्रदान कर देते हैं. भारतीय न्याय व्यवस्था क्या है, इस बात पर आराम से बैठकर धैर्यपूर्वक चर्चा होनी चाहिए. मैं लोगों और खासकर न्यायाधीशों से कहना चाहता हूं कि भारतीय न्यायपालिका किसी भी ऐसी बीमारी से ग्रस्त नहीं है, जिसे लाइलाज कहा जा सकता है.

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