जजों की नियुक्ति सरकार का विशेषाधिकार है

केद्र सरकार द्वारा गोपाल सुब्रह्मण्यम को सुप्रीम कोर्ट का न्यायाधीश न नियुक्त करने के निर्णय ने एक बार फिर से

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जॉली एलएलबी- क़ानून व्यवस्था पर कटाक्ष

फिल्म जॉली एलएलबी भारतीय न्याय व्यवस्था पर एक व्यंग है. इस फिल्म को पत्रकार से फिल्म निर्देशक बने सुभाष कपूर

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बड़ी कठिन है न्‍याय की डगर

सब मानते हैं कि देर से मिला इंसा़फ भी नाइंसा़फी के बराबर होता है. इसके बावजूद हमारे देश में म़ुकदमे कई पीढि़यों तक चलते हैं. हालत यह है कि लोग अपने दादा और परदादा के म़ुकदमे अब तक झेल रहे हैं. इंसान खत्म हो जाता है, लेकिन म़ुकदमा बरक़रार रहता है. इसकी वजह से बेगुनाह लोग अपनी ज़िंदगी जेल की सला़खों के पीछे गुज़ार देते हैं. कई बार पूरी ज़िंदगी क़ैद में बिताने या मौत के बाद फैसला आता है कि वह व्यक्ति बेक़सूर है.

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सपने सच नहीं होते, काटजू साहब

इन दिनों मीडिया में प्रेस काउंसिल के अध्यक्ष और दुनिया के प्रकांडतम विद्वानों में से एक, सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड न्यायाधीश जस्टिस मार्केंडेय काटजू के विवादास्पद बयानों पर बहस चल रही है. काटजू ने अपने बयानों में न्यूज़ चैनलों को निहायत ही ग़ैर ज़िम्मेदार और समाज को बांटने वाला क़रार देकर विवाद को जन्म दिया.

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जस्टिस काटजू की बातों पर हंगामा क्यों

आखिर जस्टिस काटजू ने ऐसा क्या कह दिया कि दिल्ली में तू़फान खड़ा हो गया. इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के जितने महान सरदार हैं, वे सब तन कर खड़े हो गए, जैसे लगा कि उनका बलात्कार होने वाला है और उन्हें अपनी इज्ज़त की रक्षा करनी है.

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दिल्ली हाईकोर्ट की अनोखी पहल

हमारे देश की विभिन्न अदालतों में लंबित मुक़दमों के शीघ्र निपटारे को लेकर न्यायविदों की तऱफ से समय-समय पर चिंता जताई जाती रही है. यहां तक कि पिछले दिनों सभी राज्यों के मुख्यमंत्रियों और हाईकोर्ट के न्यायाधीशों के एक सम्मेलन में ख़ुद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भी मुक़दमों के निस्तारण में लगने वाले लंबे समय पर चिंता जताई थी. एक तऱफ अदालतों में मुक़दमों की सुनवाई धीमी रफ़्तार से आगे चल रही है, वहीं दूसरी तऱफ नए मुक़दमों का अंबार लगता चला जा रहा है, जिसके चलते अदालतों पर काम का बोझ बढ़ता जा रहा है. ऐसा नहीं है कि सरकार इस समस्या से निबटने के लिए कोई कोशिश नहीं कर रही है. कोशिशें हो रही हैं, लेकिन समस्या के विकराल रूप को देखते हुए वे काफी कम हैं. लंबित मुक़दमों को तेजी से निपटाने की दिशा में ऐसी ही एक अच्छी कोशिश अभी हाल में दिल्ली हाईकोर्ट ने की.

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कैसे कैसे जज

जज कोर्ट की कुर्सी, मेजें, पंखे, कूलर, बल्ब सब बेचकर खा गए…एक दो जज नहीं, बल्कि जजों की पूरी टोली, जिन्होंने मामूली कर्मचारियों के पीएफ एकाउंट से जालसाज़ी कर निकाले गए करोड़ों रुपयों से अपने घरों के लिए सामान खरीदा, एसी-कूलर लगवाए, टैक्सियों पर पैसे फूंके, बच्चों की फीस भरवाई, हवाई जहाज के टिकट कटवाए और तमाम अय्याशियां कीं, घर के लिए सब्जियां तक खरीदवाईं… इसके अलावा कोर्ट की खरीदारी के नाम पर भी करोड़ों रुपये खा गए.

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किस जज ने कितना लूटा

घोटालेबाज़ कर्मचारियों को संरक्षण देने और उन्हें बचाने में ग़ाज़ियाबाद के तत्कालीन ज़िला जज आर एस चौबे का नाम सबसे अव्वल है. न्यायाधीश स्तर के ऊंचे अधिकारी और घोटाला करने वाले सामान्य स्तर के कर्मचारी आशुतोष अस्थाना की मिलीभगत के तमाम काग़ज़ी प्रमाण पुलिस को भी मिले और सीबीआई को भी.

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दोस्तों ने जॉर्ज को बचाने की अपील की

जॉर्ज फर्नांडिस. एक ऐसा नाम, जो ग़रीब मज़दूरों, दलितों, समाज के पिछड़े वर्ग के लोगों, मानवाधिकारों और हर तरह के अन्याय के खिला़फ संघर्ष में पिछले क़रीब तीन दशकों से हमेशा सबसे आगे रहा, आज खुद अपनी ज़िंदगी के लिए संघर्ष को मजबूर है. अथवा यूं कहें कि ज़िंदगी नहीं, जॉर्ज अपनी मौत के लिए संघर्ष कर रहे हैं.

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महिलाओं को समान दर्जा समाज की हक़ीक़त नहीं

आज हर कोई भारतीय समाज में महिलाओं को समानता की बात करता है, लेकिन जो बातें की जा रही हैं या जिस बात की वकालत की जा रही है, हक़ीक़त उससे का़फी अलग है. पुरुष प्रधान भारतीय समाज में सामाजिक-आर्थिक प्रतिबंधों के चलते महिलाएं हाशिए पर हैं.

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सर्वोच्च न्यायालय का विभाजन : एक खतरनाक खेल

कानून मंत्रालय द्वारा भारत के सर्वोच्च न्यायालय को संवैधानिक खंड और अपीलीय खंड में बांटने के मुद्दे का बारीक़ी से परीक्षण किए जाने की ख़बर है. यह विधि आयोग की अनुशंसाओं पर आधारित है. विधि आयोग ने सर्वोच्च न्यायालय को विभाजित करने और संविधान संबंधी मामलों एवं इससे जुड़े दूसरे मसलों को देखने के लिए दिल्ली में एक संवैधानिक पीठ और चार अलग-अलग जगहों पर अभिशून्य पीठ स्थापित करने की अनुशंसा की है.

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