पंसारी पंचायत : जिसने लोगों की ज़िंदगी बदल दी

गांव के विकास में पंचायत की महत्वपूर्ण भूमिका होती है, लेकिन अक्सर यह देखा जाता है कि पंचायतें अपनी भूमिका का निर्वहन सही तरीक़े से नहीं करती हैं, जिसके कारण लोगों के मन में यह धारणा घर कर गई है कि पंचायत के स्तर पर कुछ नहीं किया जा सकता है.

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साठ साल का युवा

यह विचार कि भारत में संसदीय लोकतंत्र होगा और यह साठ वर्षों तक चलेगा तथा उसके बाद और ज़्यादा मज़बूत होता जाएगा, न केवल विंस्टन चर्चिल, बल्कि विश्व के कई देशों के नेताओं को हैरान कर सकता है. मुझे याद है कि पहले मेरे कुछ संबंधी यह तर्क देते थे कि भारत की ज़रूरत राजतंत्र है. यहां तक कि 1857 के विद्रोह का आधार भी मुग़ल शासन को फिर से स्थापित करना था, लेकिन भारत एक लोकतंत्र बना.

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मनरेगा का हिसाब-किताब कैसे लें

नरेगा अब मनरेगा ज़रूर हो गई, लेकिन भ्रष्टाचार अभी भी ख़त्म नहीं हुआ. इस योजना के तहत देश के करोड़ों लोगों को रोज़गार दिया जा रहा है. गांव के ग़रीबों-मजदूरों के लिए यह योजना एक तरह से संजीवनी का काम कर रही है. सरकार हर साल लगभग 40 हज़ार करोड़ रुपये ख़र्च कर रही है, लेकिन देश के कमोबेश सभी हिस्सों से यह ख़बर आती रहती है कि कहीं फर्जी मस्टर रोल बना दिया गया तो कहीं मृत आदमी के नाम पर सरपंच-ठेकेदारों ने पैसा उठा लिया.

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बेवल पंचायतः ईमानदारी की कीमत चुकाता एक सरपंच

संजय ब्रह्मचारी उर्फ संजय स्वामी की आंखों में एक सपना था. वह सपना था, गांधी जी के सपनों को साकार करने का. दिल्ली एवं मुंबई में हमारी सरकार, लेकिन हमारे गांव में हम ही सरकार यानी हमारा गांव हमारी सरकार. 13 सितंबर, 2010 की रात हरियाणा के महेंद्रगढ़ ज़िले की बेवल पंचायत में इस सपने को साकार करने की एक शुरुआत हुई थी, जब संजय स्वामी ने ग्रामसभा की खुली बैठक में सरपंच पद का प्रभार काफी मशक्कत के बाद संभाला था.

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अपनी पंचायत का लेखा-जोखा मांगें

स्वराज, लोक स्वराज या गांधी का हिंद स्वराज आख़िर क्या है? गांधी जी का सपना था कि देश का विकास पंचायती राज संस्था के ज़रिए हो. पंचायती राज को इतना मज़बूत बनाया जाए कि लोग ख़ुद अपना विकास कर सकें. आगे चलकर स्थानीय शासन को ब़ढावा देने के नाम पर त्रिस्तरीय पंचायती व्यवस्था लागू भी की गई.

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सामरदा पंचायत : मानव विकास की जीती-जागती मिसाल

बीकानेर ज़िले की खाजूवाला पंचायत समिति की सामरदा पंचायत के कार्यालय एवं परिसर को देखकर ही अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि यह उन चुनिंदा पंचायतों में से एक है, जो स्वशासन का सपना साकार करने के लिए प्रयासरत हैं. राजीव गांधी भारत निर्माण भवन, सरपंच कार्यालय, कंप्यूटर रूम, दीवारों पर चस्पां विभिन्न सूचनाएं और लोगों का आवागमन इस बात की पुष्टि करता है कि इस पंचायत का नेतृत्व कोई जागरूक एवं कुशल नेता कर रहा है.

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पंचायती राज व्यवस्था में सुधार की ज़रूरत

देश की बदक़िस्मती कहिए या व्यवस्था की खामी कि किसी भी उद्देश्य को हासिल करने से पहले ही उसमें भ्रष्टाचार के घुन पनपने लगते हैं. चाहे वह खेल के आयोजन का मामला हो, स्वास्थ्य, सीमा की रक्षा करने वाले सैनिकों या गोदामों में अनाज सड़ने का मसला हो, कोई विभाग या क्षेत्र नहीं बचा है, जहां भ्रष्टाचार हावी न हो.

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बिहार में पंचायती राज नहीं, मुखियाराज है

एक समय सरपंच ग्राम पंचायत का सबसे महत्वपूर्ण पद माना जाता था, लेकिन बिहार में इस पद की अहमियत कम होने लगी है. लगभग ढाई दशक बाद बिहार में वर्ष 2001 में पंचायत के चुनाव हुए तो लोगों को लगा कि ग्राम स्वराज का जो सपना महात्मा गांधी और लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने देखा था, वह साकार होने वाला है.

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खाप

उत्तर भारत में खाप पंचायतों की मनमानी और उनके तुगलकी फैसले जल्द ही रुपहले पर्दे पर भी नज़र आएंगे. खाप नाम से एक फिल्म सितंबर महीने तक रिलीज होने वाली है. फिल्म का निर्देशन कर रहे हैं अजय सिन्हा. पिछले एक साल से लगातार खाप पंचायतों के तुगलकी फरमान सुर्खियों में थे.

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जम्‍मू-कश्‍मीरः पंचायत चुनाव ने उम्‍मीद जगाई

हाल में जम्मू-कश्मीर में संपन्न हुए पंचायत चुनाव से राज्य में एक नई बयार देखने को मिली. बड़ी तादाद में घरों से निकल कर लोगों ने मतदान करके न स़िर्फ लोकतंत्र में अपनी आस्था व्यक्त की, बल्कि चुनाव बहिष्कार करने वालों को स्पष्ट संकेत भी दे दिया.

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मधु चौहान बहाल

उच्च न्यायालय ने देहरादून ज़िला पंचायत अध्यक्ष पद पर मधु चौहान को बहाल करके प्रदेश सरकार को एक करारा झटका दिया. मालूम हो कि बीती 18 फरवरी को आठ निराधार आरोपों के आधार पर श्रीमती चौहान को बर्खास्त करते हुए राज्य सरकार ने मामले की जांच मंडलायुक्त को सौंप दी थी. मंडलायुक्त ने भी अपनी रिपोर्ट में उन पर लगे तीन आरोपों को सच बताया था.

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पंचायत चुनावः निवेश के अड्डे बने चुनाव

झारखंड में 32 वर्षों से लंबित पंचायत चुनाव अंतत: संपन्न हो गए. अब केंद्र सरकार से पंचायतों को मिलने वाली राशि मिलने का रास्ता सा़फ हो गया. चुनाव न होने के कारण झारखंड इससे वंचित रह रहा था. ग्रामीण इलाकों के लोग अब खुद योजनाएं बनाएंगे और उन्हें अमली जामा पहनाएंगे.

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लिट्टी-चोखा और मुर्गा-दारू का दौर शुरू

अक्सर ज़िले में होने वाले त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव को लेकर सरगर्मी बढ़ती जा रही है. विभिन्न पदों के दावेदार अपनी रणनीति को अंजाम देने के लिए कई तरह के हथकंडे भी आज़मा रहे हैं. बेशक़ इस बार चुनाव में प्रत्याशियों की भारी भीड़ होगी, क्योकि पंचायत में होने वाली अकूत कमाई ने दर्जनों लोगों को चुनाव लड़ने की भूख जगाई है.

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चुनावी ताना-बाना बुनना शुरू

जैसे-जैसे विधानसभा चुनाव एवं राज्य में नई सरकार के गठन की चर्चा पुरानी पड़ती जा रही है, वैसे-वैसे आगामी पंचायत चुनाव की सरगर्मी ग्रामीण क्षेत्रों में रेस पकड़ने लगी है. विभिन्न पदों के संभावित उम्मीदवार मतदाताओं का हालचाल पूछते देखे जा रहे हैं.

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मुसलमान मुख्‍यधारा में आ रहे हैं…

महात्मा गांधी और जयप्रकाश नारायण की इंकलाबी ज़मीन बिहार में जनता ने बड़े ही ऐतिहासिक फैसले किए हैं. विधानसभा चुनाव 2010 का फैसला भी इन्हीं में से एक था, जिसने विश्व की निगाहें बिहार की ओर कर दी है.

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राजनीति है, रिश्तों का क्या

उत्तर प्रदेश के पंचायत चुनाव में दोस्ती की नई बुनियाद पड़ चुकी है. इस दोस्ताने में बसपा फायदे में है तो कांग्रेस हाथ मलती नज़र आ रही है. यह संबंध बसपा के स्वामी प्रसाद मौर्या और कांग्रेस की राजकुमारी रत्ना सिंह के बीच क़ायम हुआ है.

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पंचायत चुनावः बसपा जीती लोकतंत्र हारा

जिला पंचायत चुनाव के बाद उत्तर प्रदेश में ब्लॉक प्रमुखों के जो चुनाव हुए, उनमें यह साबित हुआ कि सत्ताधारी पार्टी अगर चाहे तो किसी भी हद तक जाकर और किसी भी स्तर तक उतर कर ग्रासरूट तक अपना नेटवर्क स्थापित कर सकती है. बहुजन समाज पार्टी ने उत्तर प्रदेश में यही किया.

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पंचायत की भूमि और पट्टे की जानकारी

ग्रामीण भारत के लिए मुख्य संसाधन भूमि है. ऐसे में ग्राम पंचायत की ज़मीन का का़फी महत्व है. ग्राम पंचायत की ज़मीन अक्सर कई कामों के लिए पट्टे पर दी जाती है. जैसे भूमिहीनों को आवास के लिए, कृषि, खनन या वनीकरण के लिए.

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साल भर में ही टूट गई सड़क

एक तऱफ सरकार चाहती है कि राज्य का हर गांव पक्की सड़कों के माध्यम से ज़िला मुख्यालय से जुड़ जाए, लेकिन दूसरी तरफ उनके ही कुछ अधिकारी लूट खसोट में लिप्त दिख रहे हैं. मामला रोहतास ज़िले में ग्रामीण कार्य विभाग कार्य प्रमंडल, सासाराम द्वारा मुख्य मंत्री ग्राम सड़क योजना अंतर्गत बनाए गए सेमरा मध्य विद्यालय से पिपरी होते हुए कठडिहरी पथ में हुए अनियमितता की है.

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छपराः पंचायत चुनाव की सरगर्मी बढ़ी

पिछले महीने समाप्त हुए विधान सभा चुनाव की चर्चाएं अभी पूरी तरह थमी भी नहीं हैं कि अप्रैल-मई में होने वाले पंचायत चुनाव को लेकर गांव-गंवई की राजनीति परवान चढ़ने लगी है. पंचायत चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवार सक्रिय हो गए हैं.

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अपना गढ़ भी नहीं बचा सकी सपा

हाल ही में हुए पंचायत चुनाव में सपा को अपने ही ग़ढ में अपनों से ही शिकस्त मिली है. जहां पूर्व चुनावों में पार्टी ने तीन फीसदी से अधिक सीटों पर ज़िला पंचायत अध्यक्ष का परचम लहराया था. वहीं अब पार्टी थोड़ी सी सीटों पर काबिज़ होकर रह गई है.

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पंचायत के खर्च का हिसाब मांगे

गांधी जी का सपना था कि देश का विकास पंचायती राज संस्था के ज़रिए हो. पंचायती राज को इतना मज़बूत बनाया जाए कि लोग ख़ुद अपना विकास कर सकें. आगे चल कर स्थानीय शासन को ब़ढावा देने के नाम पर त्री-स्तरीय पंचायती व्यवस्था लागू भी की गई.

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जनप्रतिनिधियों की उपेक्षा का दंशा

महान दार्शनिक उदयनाचार्य की जन्मस्थली करियन को आज पंचायत का दर्जा मिल चुका है, लेकिन पंचायतीराज के दस वर्षों के कार्यकाल में उदयनाचार्य जैसे विश्व प्रसिद्ध चिंतक एवं दार्शनिक के लिए कोई विशेष कार्य नहीं किया गया. स्थानीय जनप्रतिनिधि की तो और बात है बिहार के चार मुख्यमंत्रियों ने उदयनाचार्य की जन्मस्थली को पर्यटन स्थल का दर्जा दिलाने की घोषणा की थी जो आज तक वास्तविकता में नहीं बदल सकी. पंचायत में ग्रामीण सड़कें, बिजली, नलकूप, स्वास्थ्य एवं शिक्षा की बदहाली पंचायतवासियों को मुंह चिढ़ाती है.

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गोपालपुरा: सामूहिक निर्णय प्रक्रिया से बदली तस्वीर

राज्य कभी नहीं चाहता कि समाज एकजुट, मज़बूत और आर्थिक रूप से संपन्न हो. वह हमेशा चाहता है कि समाज बंटा रहे, टूटा रहे, इस पर आश्रित रहे और गुलाम मानसिकता में जीना सीख ले. यहां तक कि गुलामी के दिनों में भी समाज के मामलों में राज्य का इतना हस्तक्षेप नहीं था, जितना स्वतंत्रता के बाद लोकतांत्रिक भारत में बढ़ता चला गया.

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पारस की बंध गई पोटली

खगड़िया ज़िले के बेहद पिछड़े विधानसभा क्षेत्र अलौली में अंतत: 33 वर्षों के बाद लोजपा प्रदेश अध्यक्ष पशुपति कुमार पारस की पोटली बंध ही गई. लोजपा सुप्रीमो रामविलास पासवान के अनुज पारस ने कभी सोचा भी नहीं होगा कि जनता उन्हें सिर आंखों पर बिठाने के बजाए ज़मीन पर पटक देगी. दरअसल हार से बचने के लिए उन्होंने अपने चहेते रामचंद्रा सदा को जदयू का टिकट यह सोचकर दिलवाया था कि उन्हें मुसहर समाज के तीन-तीन प्रत्याशियों के खड़े रहने से जीतने में मदद मिलेगी. हुआ उल्टा. महादलित समाज के लोगों ने एकजुट होकर उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया.

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खुद को मसीहा समझते हैं जन प्रतिनिधि

असम में विधायकों के निवास पर ग्रामीणों की भीड़ सहज ही देखी जा सकती है. पार्टी के कैडर प्रत्येक आगंतुक की व़फादारी की जांच करते हैं, फिर उसके आवेदन को आगे बढ़ाने की स़िफारिश करते हैं. यह ग्रामीण असम का चिर परिचित मंजर है.

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अमर सिंह का सियासी सफर

पंचायत चुनाव खत्म होने के बाद बहुजन समाज पार्टी और समाजवादी पार्टी में ज़ुबानी जंग छिड़ी है. दोनों ही दल दावा कर रहे हैं कि चुनाव में उनके समर्थक सबसे अधिक संख्या में जीते हैं. अब असलियत क्या है, यह तो इन पार्टियों के नेता ही जानें.

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