दैनिक भास्कर के ग्रुप एडिटर : प्रसिद्ध पत्रकार कल्पेश याग्निक की ‘हत्या’!, रिलायंस के फिल्म डिस्ट्रीब्यूशन हेड आदित्य चौकसे, सलोनी और साज़िश

दैनिक भास्कर के ग्रुप एडिटर कल्पेश याग्निक की आत्महत्या दरअसल सोची-समझी हत्या है, जिसकी योजना सालों पहले बनी थी. सलोनी

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जड़ों की खोज का अनूठा प्रयास

अपनी जड़ों की खोज में निकली एक नवजवान गुयानीज़-अमेरिकी महिला पत्रकार गायत्रा बहादुर की साधारण और व्यक्तिगत भारत यात्रा एक

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कालजयी रचनाकार फ्योदोर दोस्तोयेवस्की…

मशहूर रूसी लेखक फ्योदोर दोस्तोयेवस्की की गिनती शेक्सपियर, दांते, गेटे और टॉलस्टॉय जैसे महान लेखकों के साथ होती है. फ्योदोर

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ईमानदार पत्रकार, दलाल पत्रकार

पत्रकारिता प्रतिस्पर्धा का पेशा है. प्रतिस्पर्धा रिपोर्ट, स्टोरी और स्कूप के क्षेत्र में होती है. प्रतिस्पर्धा निर्भीकता में होती है,

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जॉली एलएलबी- क़ानून व्यवस्था पर कटाक्ष

फिल्म जॉली एलएलबी भारतीय न्याय व्यवस्था पर एक व्यंग है. इस फिल्म को पत्रकार से फिल्म निर्देशक बने सुभाष कपूर

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राजनीतिक दलों का रवैया गुस्सा दिलाता है

महाभारत शायद आज की सबसे बड़ी वास्तविकता है. इस महाभारत की तैयारी अलग-अलग स्थलों पर अलग तरह से होती है और लड़ाई भी अलग से लड़ी जाती है, लेकिन 2013 और 2014 का महाभारत कैसे लड़ा जाएगा, इसका अंदाज़ा कुछ-कुछ लगाया जा सकता है, क्योंकि सत्ता में जो बैठे हुए लोग हैं या जो सत्ता के आसपास के लोग हैं, वे धीरे-धीरे इस बात के संकेत दे रहे हैं कि वे किन हथियारों से लड़ना चाहते हैं.

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इंडियन एक्‍सप्रेस की पत्रकारिता- 2

अगर कोई अ़खबार या संपादक किसी के ड्राइंगरूम में ताकने-झांकने लग जाए और गलत एवं काल्पनिक कहानियां प्रकाशित करना शुरू कर दे तो ऐसी पत्रकारिता को कायरतापूर्ण पत्रकारिता ही कहेंगे. हाल में इंडियन एक्सप्रेस ने एक स्टोरी प्रकाशित की थी, जिसका शीर्षक था, सीक्रेट लोकेशन. यह इस अ़खबार में प्रकाशित होने वाले नियमित कॉलम डेल्ही कॉन्फिडेंशियल का एक हिस्सा थी.

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हम तो ख़ुद अपने हाथों बेइज़्ज़त हो गए

जी न्यूज़ नेटवर्क के दो संपादक पुलिस द्वारा गिरफ्तार कर लिए गए. इस गिरफ्तारी को लेकर ज़ी न्यूज़ ने एक प्रेस कांफ्रेंस की. अगर वे प्रेस कांफ्रेंस न करते तो शायद ज़्यादा अच्छा रहता. इस प्रेस कांफ्रेंस के दो मुख्य बिंदु रहे. पहला यह कि जब अदालत में केस चल रहा है तो संपादकों को क्यों गिरफ्तार किया गया और दूसरा यह कि पुलिस ने धारा 385 क्यों लगाई, उसे 384 लगानी चाहिए थी. नवीन जिंदल देश के उन 500 लोगों में आते हैं, जिनके लिए सरकार, विपक्षी दल और पूरी संसद काम कर रही है.

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भविष्य के भ्रष्टाचारियों के कुतर्क

बहुत चीजें पहली बार हो रही हैं. पूरा राजनीतिक तंत्र भ्रष्टाचार के समर्थन में खड़ा दिखाई दे रहा है. पहले भ्रष्टाचार का नाम लेते थे, तो लोग अपने आगे भ्रष्टाचारी का तमगा लगते देख भयभीत होते हुए दिखाई देते थे, पर अब ऐसा नहीं हो रहा है. भ्रष्टाचार के ख़िला़फ जो भी बोलता है, उसे अजूबे की तरह देखा जाता है. राजनीतिक व्यवस्था से जुड़े हुए लोग चाहते हैं कि यह आवाज़ या इस तरह की आवाज़ें न निकलें और जो निकालते भी हैं, उनके असफल होने की कामना राजनीतिक दल करते हैं और राजनीतिक दल से जुड़े हुए लोग इसका उपाय बताते हैं कि भ्रष्टाचार के खिला़फ आवाज़ उठाने वाले लोग कैसे असफल होंगे.

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यह पत्रकारिता का अपमान है

मीडिया को उन तर्कों का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए, जिन तर्कों का इस्तेमाल अपराधी करते हैं. अगर तुमने बुरा किया तो मैं भी बुरा करूंगा. मैंने बुरा इसलिए किया, क्योंकि मैं इसकी तह में जाना चाहता था. यह पत्रकारिता नहीं है और अफसोस की बात यह है कि जितना ओछापन भारत की राजनीति में आ गया है, उतना ही ओछापन पत्रकारिता में आ गया है, लेकिन कुछ पेशे ऐसे हैं, जिनका ओछापन पूरे समाज को भुगतना पड़ता है. अगर न्यायाधीश ओछापन करें तो उससे देश की बुनियाद हिलती है.

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फर्रुख़ाबाद को बदनाम मत कीजिए

मैं अभी तक पसोपेश में था कि सलमान खुर्शीद के खिला़फ कुछ लिखना चाहिए या नहीं. मेरे लिखे को सलमान खुर्शीद या सलमान खुर्शीद की जहनियत वाले कुछ और लोग उसके सही अर्थ में शायद नहीं लें. इसलिए भी लिखने से मैं बचता था कि मेरा और सलमान खुर्शीद का एक अजीब रिश्ता है. फर्रुख़ाबाद में हम दोनों पहली बार लोकसभा के चुनाव में आमने-सामने थे और चुनाव में सलमान खुर्शीद की हार और मेरी जीत हुई थी.

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एक अफसर का खुलासाः ऐसे लूटा जाता है जनता का पैसा

महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री एवं शरद पवार के भतीजे अजीत पवार ने अपने पद से इस्ती़फा दे दिया है. हालांकि उनके इस्ती़फे के बाद राज्य में सियासी भूचाल पैदा हो गया है. अजीत पवार पर आरोप है कि जल संसाधन मंत्री के रूप में उन्होंने लगभग 38 सिंचाई परियोजनाओं को अवैध तरीक़े से म़ंजूरी दी और उसके बजट को मनमाने ढंग से बढ़ाया. इस बीच सीएजी ने महाराष्ट्र में सिंचाई घोटाले की जांच शुरू कर दी है.

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पत्रकार जिन्होंने लोकतंत्र की हत्या की

पत्रकारिता की संवैधानिक मान्यता नहीं है, लेकिन हमारे देश के लोग पत्रकारिता से जुड़े लोगों पर संसद, नौकरशाही और न्यायपालिका से जुड़े लोगों से ज़्यादा भरोसा करते हैं. हमारे देश के लोग आज भी अ़खबारों और टेलीविजन की खबरों पर धार्मिक ग्रंथों के शब्दों की तरह विश्वास करते हैं.

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भारतीय मीडिया संकट के दौर से गुज़र रहा है

दुनिया के अन्य देशों की तरह भारत में भी पत्रकारिता साल दर साल परिवर्तित हुई है. अगर हम 1947 में देश को मिली आज़ादी के बाद पिछले 65 सालों की बात करें तो पत्रकारिता के क्षेत्र में बड़े परिवर्तन हुए हैं. 1995 के मध्य में सेटेलाइट टीवी हमारे देश में आया. उसके बाद से 24 घंटे चलाए जाने वाले समाचार चैनलों ने अपना एक ब्रांड बनाया है, जिसमें एक ही समाचार बार-बार दिखाया जाता है.

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महिला पत्रकार भारतीय मीडिया से ग़ायब हैं

पिछले कुछ वर्षों ख़ासकर नब्बे के दशक के बाद हिंदुस्तान का एक तबक़ा यह मानने लगा कि देश की आत्मा अब दिल्ली और राज्यों की राजधानियों में ही बसने लगी है. उनका मानना है कि महानगरों में महिलाओं को पुरुषों की तरह शिक्षा और रोज़गार के समान अवसर मिल रहे हैं.

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कांग्रेस अन्ना से डर गई है

महाराष्ट्र दौरे पर निकले अन्ना हजारे की यात्रा जब नागपुर पहुंची तो उनके क़ा़फिले पर नागपुर के चिटणिस पार्क में कुछ युवाओं ने पत्थरबाज़ी की. ये युवा युवक कांग्रेस के सदस्य थे. हालांकि इस घटना में किसी को कोई नुक़सान नहीं हुआ, लेकिन यह घटना बताती है कि अन्ना हजारे के महाराष्ट्र दौरे को लेकर कांग्रेस में किस हद तक बेचैनी ब़ढी हुई है.

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हमारे सांसदों को इतनी इज़्ज़त क्यों चाहिए

बीते एक मई को द डेली मेल के एक पत्रकार क्वेनटीन लेट्‌स ने ब्रिटिश हाउस ऑफ कॉमंस के स्पीकर के बारे में एक टिप्पणी की. उन्होंने स्पीकर बेरकाऊ की तुलना एक कार्टून करेक्टर मटले से की, जो हमेशा कंफ्यूज्ड रहता था, जिसके कारण वह कभी सफल नहीं हो पाता था. इसी तरह कुछ साल पहले मैथ्यू पेरिस ने द टाइम्स में पार्लियामेंट्री स्केच नामक कॉलम शुरू किया था.

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हिंदी पत्रकारिता अपनी जिम्मेदारी समझे

यह महीना हलचल का महीना रहा है. मुझसे बहुत सारे लोगों ने सवाल पूछे, बहुत सारे लोगों ने जानकारियां लीं. लेकिन जिस जानकारी भरे सवाल ने मुझे थो़डा परेशान किया, वह सवाल पत्रकारिता के एक विद्यार्थी ने किया. उसने मुझसे पूछा कि क्या अंग्रेजी और हिंदी पत्रकारिता अलग-अलग हैं. मैंने पहले उससे प्रश्न किया कि आप यह सवाल क्यों पूछ रहे हैं.

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युवा भ्रष्‍टाचार को लेकर चिंतित हैं

देश का इतिहास इस तथ्य का साक्षी है कि युवा वर्ग हमेशा से अपने हक़ के लिए ल़डता रहा है. संचार के इस युग में भी युवाओं में इस लक्षण को देखा जा रहा है. दुनिया एक प्लेटफॉर्म तक सीमित होकर रह गई है, जहां से सूचनाओं का संचार व्यापक स्तर पर हो रहा है.

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भारतीय सेना को बदनाम करने की साजिश का पर्दाफाश

बीते चार अप्रैल को इंडियन एक्सप्रेस के फ्रंट पेज पर पूरे पन्ने की रिपोर्ट छपी, जिसमें देश को बताया गया कि 16 जनवरी को भारतीय सेना ने विद्रोह करने की तैयारी कर ली थी. इस रिपोर्ट से लगा कि भारतीय सेना देश में लोकतांत्रिक व्यवस्था को समाप्त कर फौजी तानाशाही लाना चाहती है. इस रिपोर्ट ने सारे देश में न केवल हलचल पैदा की, बल्कि सेना को लेकर शंका का वातावरण भी पैदा कर दिया. सभी चैनलों पर यह खबर चलने लगी, लेकिन तीन घंटे बीतते-बीतते सा़फ हो गया कि यह रिपोर्ट झूठी है, बकवास है, किसी खास नापाक इरादे से छापी गई है और इसे छपवाने के पीछे एक बड़ा गैंग है, जो हिंदुस्तान में लोकतंत्र को पसंद नहीं करता.

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काटजू का जादुई यथार्थवाद

पिछले दिनों दिल्ली के इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में वरिष्ठ पत्रकारों एवं संपादकों का जमावड़ा हुआ, मौक़ा था पत्रकार शैलेश और डॉ. ब्रजमोहन की वाणी प्रकाशन से प्रकाशित किताब स्मार्ट रिपोर्टर के विमोचन का. किताब का औपचारिक विमोचन प्रेस परिषद के अध्यक्ष एवं सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश मार्कण्डेय काटजू के साथ-साथ एन के सिंह, आशुतोष, कमर वहीद नकवी एवं शशि शेखर ने किया.

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पत्रकार की नज़र में आंदोलन

काफी लंबे समय के बाद भारतीय समाज में एक ऐसा आंदोलन देखने को मिला, जिसके समर्थन में जनता स्वत:स्फूर्त तरीक़े से सामने आई. जनता के समर्थन से होने वाले इस आंदोलन ने सरकार की नींद उड़ा दी. अगर हम भारतीय राजनीतिक परिदृश्य पर नज़र डालते हैं तो जय प्रकाश नारायण की संपूर्ण क्रांति के आंदोलन के बाद यह पहला बड़ा आंदोलन था, जिसे देशव्यापी जनसमर्थन मिला.

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शैलेंद्र दुबे हंसमुख और मिलनसार व्यक्ति थे

शैलेंद्र दुबे जिस उम्र में थे, वह उम्र जाने की नहीं होती. वह बहुत हंसमुख, मिलनसार और ठोस ख्याल के व्यक्ति थे. उन्होंने बहुत ही सादगीपूर्ण जीवन जिया और सादगी के ही रास्ते ईश्वर के पास चले गए. उनकी मित्र मंडली में जिन लोगों की संख्या बहुत ज़्यादा थी, वे पत्रकार थे.

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क्या छत्तीसग़ढ में लोकतंत्र नहीं है

दिल्ली के उन नेताओं को धन्यवाद देना चाहिए, जो पत्रकारिता जगत का नेतृत्व करते हैं. इनके लिए सारा देश दिल्ली है. अगर दिल्ली में किसी अख़बार के साथ कुछ ग़लत हो तो इनके लिए बहुत बड़ा सवाल बन जाता है. अगर किसी पत्रकार के साथ कुछ हो तो और भी बड़ा सवाल बन जाता है.

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